राणी पदमावती री गौरव गाथा

चित्तौड़ दुर्ग री बात चल्यां,
मन भारत माता मोदीजै।
पदमण रो पावन प्रेम पढ्यां,
हर हिंदुस्तानी गरबीजै।

वा रतन सिंह री रजपूती,
वा साख सपूती पदमण री।
गौरा-बादळ रो साम-धरम,
वा सीख सदीनै भलपण री।

उणनैं किम राख रळण देवां,
किम साख सनातन मिटबा द्यां।
(किम) मिथ्या सपनां रै जाळां में,
पदमण रो प्रेम सिमटबा द्यां।

खिलजी खलनायक कामी खळ,
छळ-बळ कर दांव चलायो हो।
पदमण नै पावण हित पापी,
सन्धी रो जाळ बिछायो हो।

राणा सूं बोल्यो बस एकर,
पदमण सूं परतख मिलबा री।
फौजां सब पाछी फिर ज्यासी,
नीं और शर्त है कीं म्हारी।

आ शर्त नहीं मंजूर हुवै,
नटियो वो गोरो हठधारी।
छेवट बस झलक आरसी में,
देखण री राणा स्वीकारी।

इण पर भी गोरो अड़ बैठ्यो,
बादळ बब्बर ज्यूं क्रोधायो।
राणा जद बरज्या, रूठ चल्या,
खिलजी रो मनड़ो हरखायो।

वो कुटळाई रो कोथळियो,
छळ-बळ रा पासा जाणै हो।
राणा रै घर री रीतां नैं,
पापी हद भांत पिछाणै हो।

राणो खिलजी रै संग चाल,
पूग्यो जद पोळ पुगावण नैं।
भारत रो धरम रखावण नैं,
अर शिष्टाचार निभावण नैं।

निलजां नैं मौको मिलतां ई
राणा नै पकड्यो, कैद कियो।
राणी री डोळी ल्यावण रो,
खिलजी संदेसो भेज दियो।

लांबी का’णी रो के लिखणो,
बस बात पतै री बतळाऊं।
राणी रै सतवट बैवण री,
वा सार कहाणी समझाऊं।

रीतां-नीतां पर मरबाळा,
सुभटां री सोच निराळी ही।
अनवी वां आण निभावण हित,
मरबा री टेम न टाळी ही।

राणा सूं रूठ्यै गोरै नैं,
राणी पदमण जद साद दियो।
मेवाड़ी माण बचावण रो,
नाहर झट बीड़ो झाल लियो।

गोरै-बादळ रच व्यूह कह्यो,
महाराणी महलां आवै है ।
संग लेय सात सौ वा सखियां,
खिलजी सूं मिलबा जावै है।

सजी सात सौ पालकियां,
इक मांय वीर भट अभिमानी।
इक इक नैं च्यार कहार उठा,
चाल्या यवनां रै दर कांनी।

म्हाराणी रै महाडोळ में,
बादळ बैठ्यो कुसळ लोहार।
छीणी और हथोड़ी साथै
तीखी दो लीनी तलवार।

राणा री बेड़ी कटतां ही,
झट साथ समूचो सरसायो।
सेनापति जफर समझग्यो सब,
सेखी नैं भातो अब आयो।

खलबल सी मचगी खिलजी रै,
चमकी समसीरां बण चंडी।
रजपूती राखी रणवीरां,
मरजाद सदीनी वां मंडी।

जवनां री ल्हासां रण बिछगी,
खप्पर भर काळी पी धापी।
मुंडमाळ रुद्र रै गळ मंडी,
जवनां री काया हद कांपी।

जिंदां नीं गढ़ नैं जाण दियो,
डकरेळ निडरपण सूं डटिया।
गोरा, बादळ अर रत्नसिंह सब,
मातभोम हित मर मिटिया।

रजपूत रह्या जद रणखेतां,
राण्यां खुद आण निभाई ही।
पदमण संग गढ़ री पदमणियां,
जौहर री ज्वाळ समाई ही।

माथा झड़ग्या तो धड़ लड़िया,
पड़िया नीं पिसणा सूं सौरा।
छतराण्यां जौहर कर जीती,
कोनी अै कूड़ा कथ कोरा।

इण पर जे फिल्म बणाणी है,
तो काम कल्पना नीं आवै।
सदियां री संचित थाती नैं,
कुण आज कहो जो फिल्मावै।

ओळावा लेकर सपनां रा,
अतृप्त कामना पूरोला।
नेकी नैं नंगो नाच नचा,
मरजादा जमीं में बूरोला।

इतिहास कदै ई नीं भूलै,
अंजस री व्हाली वातां नैं।
सुख रा दिन राखै याद सदा,
रस रँग भरी जस रातां नैं।

दुःख आफत री घड़ियां दौरी,
घातां-प्रतिघातां मन छीजै।
सहयोग समै पर साझणियां,
दुःख दाझणियां नीं बिसरीजै।

इतिहास आसरो अनुभव रो,
इतिहास ग्यान री कूँजी है।
ओ सीख सबब है भूलां रो,
इतिहास असल री पूँजी है।

जिण कौम तणो इतिहास मरै,
वा कौम मरै, मर मिटज्यावै।
इण भोम परै उण कौम तणो,
खुर-खोज पछै नीं बच पावै।

अबकाळै आफत आई है,
भारत री रूड़ी रीतां पर।
प्रण-पाळण री परतीतां पर,
गरबीलै जौहर गीतां पर।

मर कर जो अमर हुया जग में,
निज स्वाभिमान रै बळ माथै।
वां शौर्य-सपूतां री गाथा,
इण टेम लड़ै है छळ साथै।

छळ भी अपणा सँग अपणा रो,
दूजां नै देवां दोष कियां।
पण सहण करण री सीमा है,
अब जियां कियां बेहोश जियां।

~~डाॅ. गजादान चारण “शक्तिसुत”

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