कवि सम्मान सारु आपरै गांव रो तांबा पत्र अडाणै राखणिया रायमल रतनू

कवि रो सम्मान किणी उदार पुरुष खातर कितरो महताऊ होवै आ बात आज रे समय मे समझणी आंझी है क्यूं अबै नी तो दिलां मे उदारता है नी कविता री कूंत।

मध्यकाल़ मे रतनू रायमलजी होया। बधाऊड़ा (उण बगत रे जैसलमेर मे) मे रतनू मयारामजी रै शंकरदानजी होया जिणां नै बीकूंकोर रा ठाकुर जैतसी भाटी हरल़ायां गांव दियो। इणां री वंश परंपरा मे महेशदासजी होया जिणां रे अभैरामजी होया। अभैरामजी नै महाराजा अजीतसिंह घोड़ारण (नागौर) दियो। कोई आ ई कैवे कै घोड़ारण महेशदासजी नै मिली। अभैरामजी रै च्यार बेटा हा जिणां मे रायमलजी सबसूं छोटा हा।

उणां दिनां लगोलग काल़ पड़ता रैता सो लोगां कनै आजीविका रा साधन साव कमती ही हा। ऐड़ै भयंकर काल़ री बगत मे कोई नामचीन मोतीसर/रावल कवि आपरै लवाजमै साथै घोड़ारण आयो। आयर आपरो डेरो दिरावण सारु गांव वाल़ां नै कैयो। रायमलजी रै आपरे दूजै भाइयां सूं मेल़ कीं कम ई हो सो दूजै भाइयां कैयो कै म्हांरै बडेर री कोटड़ी रायमलजी रे कनै है सो आप डेरो उठै करावो। रायमलजी उण बगत घरै नी हा पण कवि कोटड़ी मे रुकग्यो। रायमलजी रे साव नादारगी ही पण ठकराणी ज्यूं त्यूं तंख राखण नै सराजाम कियो अर कवि री आवभगत मे कोई कमी नी आवण दी।

जद रायमलजी आया अर सारी हकिकत सुणर चिंता मे पड़ग्या। क्यूं कवि नै विदा करती बगत सीख (भेंट) दैणी अति आवश्यक ही। पछै सीख ई बडेर री हैसियत वाल़ी होणी चाहीजै। दिन दिन तो वां कविवर कनै बंतल़ करी अर रात रा आपरै गांव रो तांबा पत्र लेय पाखती रे गांव ऊंठवाल़ियै रे ठाकुर सुजाणसिंहजी कनै गया अर आपरी सारी बात विगतवार बताय एक नामी घोड़ो देवण री अरज करतां कैयो कै बदल़ै मे घोड़ारण रो तांबापत्र राख लिरावो। ठाकुर साहब कैयो कै “आप सूं तांबा पत्र लेय म्है कठै राखूलो। आप आ बात कैय म्हारे माथै पाप चाढ रैया हो। आप तो संदेश करा देता तोई म्है घोड़ो पूगतो कर देतो। कनै ऊभै हाजरियै नै कैयो जा दोनूं घोड़ा खोल ला अर रायमलजी नै गांव तक पूगार आ।” रायमलजी कैयो ठाकुर साहब दो घोड़ा नी म्हनै तो फगत एक घोड़ो चाहीजै। ” ठाकुर सा कैयो “हुकम आप ई तो म्हांरै माथै रा मोड़ हो सो एक आपरै सवारी सारु”। रायमलजी हाजरियै रे साथै दो घोड़ा लेय पाछा रातोरात आयग्या। प्रभात री बगत कोटड़ी मे रैयाण जची। सीख री बगत दूजा भाई वाट जोवै हा कै देखां रायमल कांई देवैलो। कवि कैयो कै रायमलजी सीख दिरावो हमै हूं आपरे बीजै भाइयां री कोटड़ी जावूंला। रायमलजी आपरे बेटै नै हेलो कर र कैयो जा घोड़ो खोल ला अर कविवर नै इनायत कर। बेटो घोड़ो लाय कवि नै भेंट कियो। भाइयां कनै रायमलजी री प्रशंसा टाल़ कीं चारो ई नीं हो। उण कवि एक दूहो कैयो जिण सूं रायमलजी आज ई अमर है :-

घोडारण घोड़ाह रतनू बगसै रायमल
जाचक कर जोड़ाह आवै सो पावै अपल

रायमलजी अर ऊठवाल़िया ठाकुर साहब नै नमन।

जे किणी नै ऊठवाल़िया ठाकुर साहब रो नाम ध्यान मे होवै तो जरूर बतावजो

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