ॠगवेदोक्त देवीसुक्तम् का भावानुवाद

( मेहाई सतसई – अनुक्रमणिका )

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रहस कहण ॠगवेद रा, देवी सुक्तम राज।
आखर दीजो अम्बिका, मेहाई महराज।।३५२
सिर पर जिण धरियो ससी, सिंह सवारी साज।
मुख मणिमरकत कांतिमय, मेहाई महराज।।३५३
चौभुज चंडी चक्र धनु, शंख बाण धरिया ज।
तरण तारणी त्रंबका, मेहाई महराज।।३५४
बाजूबंध धर दुय भुजां, कंकण मांहि करां ज।
हीरक गळ बिच हारलो, मेहाई महराज।।३५५
राजत आई आप रे, पायल मांहि पगां ज।
कटि धर किंकण कनक री, मेहाई महराज।।३५६
कुंडळ कंकण रतन जुत, कान धरे रिधु राज।
दुरगा देशाणे स्वयं, मेहाई महराज।।३५७
आई श्रीमुख सूं वदी, मन सूं खुद रिधु राज।
कहूं सुणौ कविराज मैं, मेहाई महराज।।३५८
स्वयं सच्चिदानंद मय, व्यापक वपु वपु मांझ।
देवी मैं देशाणपत, मेहाई महराज।।३५९
रूद्र वसू आदित्य अर, सृष्टि देव गण म्हां ज।
मित्र वरुण धारण करण, मेहाई महराज।।३६०
अगन, पुरंदर अश्विनीसुत, धारणी शिवा ज।
धर जांगळ री म्है धजा, मेहाई महराज।।३६१
सत्रव सब संहारणी, व्योम विचरणी म्हां ज।
सोम-धरा शशि री प्रभा, मेहाई महराज।।३६२
परजापत, पूखा, भगा, धारण हुं वड धा ज।
हूं आवड वपु अंबिका, मेहाई महराज।।३६३
सरस सोमरस समपता, जजमानां रे काज।
हवि फल दात्री हवन री, मेहाई महराज।।३६४
विध्या जस वैभव प्रदा, जायी कुळ किनिया ज।
मन रँग थळ मैं  हूँ बसूँ, मेहाई महराज।।३६५
अखिल अवनि अधिराजिनी, सेवक सारण काज।
म्है अन धन दायी उमा, मेहाई महराज।।३६६
परब्रह्म परब्रह्मणी, संयुक्ता शिव राज।
देव करे म्हों दंडवत, मेहाई महराज।।३६७
प्रपंचिनी मन भाव घण, घट घट हूं रिधु राज।
म्हूं विलसत वरदायिनी, मेहाई महराज।।३६८
सब जन मौ कज जीमतां, जिमण करुं रिधु राज।
म्है भोक्ता आवड सकत, मेहाई महराज।।३६९
द्रष्टा इण दुनियाण री, आंख्यां हुं रिधु राज।
दग लखमय देशाणपत, मेहाई महराज।।३७०
श्वास जगत संचालिका, श्वास उछासण राज।
जीवन-जग, जगदंबिका, मेहाई महराज।।३७१
कान सांभळै म्हो थकां, करती हूं सब काज।
सचर अचर संचालिनी, मेहाई महराज।।३७२
जिण जन नीं जांणी म्हनैं, उण री दीन दशा ज।
सुण बहुश्रुत उपदेश म्है, मेहाई महराज।।३७३
सेवित सुर नर नाग मुनि, ब्रह्म तत्व रिधु राज।
अद्भुत आनंदा उमा, मेहाई महराज।।३७४
बाल न को बांको करै, करूं बली हूं ता ज।
रिछपाळक जिण री रहूं, मेहाई महराज।।३७५
मेधा सगती जुत ॠखि, करूं बिरंची वा ज।
जिण सिर हथ दूं म्है सदा, मेहाई महराज।।३७६
ब्रह्म-दोख- आसुर -भखा, रूद्र चढावण ज्या ज।
प्रत्यंचा बण पार्वती, मेहाई महराज।।३७७
सरण वत्सला सांभवी, शत्रुघ्नी रिधु राज।
अंतरजामी आवडा, मेहाई महराज।।३७८
व्यापक वसुधा व्योम वळ, बादळ बीजळ गाज।
अगम अगोचर तत्वमय, मेहाई महराज।।३७९
जगत पिता आकास री, जननी हुं रिधु राज।
जोगण धर जांगळ धरा, मेहाई महराज।।३८०
वपु विराट विष्णुमयी, सरजण करणी मां ज।
अखिल अवनि अवलंब हूँ, मेहाई महराज।।३८१
महोदधि म्हारै थकी, जळ मँह लय रिधु राज।
जगजननी देशाणपत, मेहाई महराज।।३८२
भुवन सकल विलसत भवा, व्यापक वपु रिधु राज।
सचर अचर मैं हिज बसूं, मेहाई महराज।।३८३
सिर परसे म्हौ सुरग नें, ऐडी वड हुं धा ज।
पग सूं अडूं पताळ म्है, मेहाई महराज।।३८४
कारण जगती री कथी, किनियाणी रिधु राज।
बिन कहियां वायू -गता, मेहाई महराज।।३८५
निज मन निस दिन हूं चलूं, खं अर धरा परां ज।
महिमामय हुं पाण निज, मेहाई महराज।।३८६
सकल वांगमय मौ स्तवन, सकल सबद रिधु रा ज।
स्वयं सगत हुं शारदा, मेहाई महराज।।३८७
धरा अमंगल घ्वंसिणी, शरणागत शरणा ज।
करणी मंगल कारिणी, मेहाई महराज।।३८८
देखूं जित देशाणपत, जीव चराचर मांझ।
वपु वपु बसणी व्यापका, मेहाई महराज।।३८९
“आखर मन रा आखजे, मत राखे मन मांझ।”
नरपत ने औ नित कहै, मेहाई महराज।।३९०
बीज मंत्र पण आप हो, हिरण मंत्र पण मां ज।
यंत्र तंत्र अधिदेवता, मेहाई महराज।।३९१

~~नरपत आसिया “वैतालिक”

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