ॠगवेदोक्त रात्रिसुक्तम भावानुवाद

( मेहाई सतसई – अनुक्रमणिका )

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रात्रि सुक्त ॠगवेद रा, आखर माडूं आज।
शुभ उकती मां समपजो, मेहाई महराज।।३९९
व्यापक वपु वसुधा तथा, जीव चराचर मांझ।
रात राजराजेस्वरी, मेहाई महराज।।४००
ईहग मन आलोकिणी, धारण सकळ धरा ज।
जथा करम फलदायिनी, मेहाई महराज।।४०१
अमरबेल रे जिम अमर, छाई बिरछ घटा ज।
रात राजराजेस्वरी, मेहाई महराज।।४०२
आलोकै मन आंगणौ, किरणमयी जग राज।
तम अग्यानम तोडणी, मेहाई महराज।।४०३
प्रगटावै प्राची प्रभा, वडी बहन ऊषा ज।
तिमिर अविद्या तोडणी, मेहाई महराज।।४०४
सरव सुखकरा शर्वरी, पोढूं तौ पडतां ज।
निज धर मांय नचिंत हुय, मेहाई महराज।।४०५
विहग उडंता व्योम रा, सारां पडता सांझ।
नीड राज निरभय रहै, मेहाई महराज।।४०६
रात राज रळियावणी, थारी लोवड मांझ।
जग जन निरभय पोढिया, मेहाई महराज।।४०७
सुरभि तुरग माणस सकळ, विहग पथिक अर बाज।
रात मात बण अंक ले, मेहाई महराज।।४०८
थारै खोळै पोढिया, रात रूप रिधु राज।
दिल में मां करजो दया, मेहाई महराज।।४०९
हटा दुर्गुणां री घटा, प्रगटा विभा छटा ज।
काम क्रोध मम काटिजे, मेहाई महराज।।४१०
ऊषा हटा अग्यान ने, कलिमल दल रिधु राज।
छटा बिखेर’र छंद लय, मेहाई महराज।।४११
दीजो वित देशाणपत, भगत भीड मां भाज।
उर अंधारो मेटिये, मेहाई महराज।।४१२
कामदुधा सम शर्वरी, करूं तवन हुं राज।
वरद हाथ वरदा रखै, मेहाई महराज।।४१३
परम वोम परमातमा, री जाया तूं मां ज।
मन रो मैल मिटावजे, मेहाई महराज।।४१४
म्हारी अरजी मानजो, रात रूप रिधु राज।
करो ग्रहण मम अर्चना, मेहाई महराज।।४१५

~~नरपत आसिया “वैतालिक”

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