रूपग गोगादेजी रो – आढा पहाड़ खान

।।छंद – मोतीदाम।।
वडवार उदार संसार वषाण।
जोधार जूंझार दातार सुजाण।
दला थंभ वीरम तेज दराज।
साजै दिन राजै ऐ सूर समाज।।

भड़ा दरगाह हलहल भाल।
तले ऐ बाज वड़ा तेजाल।
सत्रा जड़ाढण सूर सधीर।
नरसुर चाढण बै पख नीर।।

सधूवड़ वीरमदे सुभियाण।
तणो सलखेस तपै तुड़ ताण।
गाहै धर हैर षेड़ गिरंद।
नड़ै भड़ अनड षाग नरिंद।।

दीयै लष सांसण कुंजर दान।
सुृषत्रिय चित सो इन्द्र समान।
करै थह बैठोय सूर सकाज।
गोढो गुर सिंह ज्यूही अग्राज।।

षेड़े चाहे वंस उपावण षार।
जोइया ऐ आयाय भीच जैवार।
दलै धर गूजर लोड़ दुगाम।
महैवैय कीधोय आण मुकाम।।

दगो कर छोड़ेय साह इबार।
चोरे लष कोड़ जमोर चियार।
अमोलख ऊजळ गात असाध।
सालोतर घोड़ी ऐ एक समाध।।

इती मैहमद तणी ले आथ।
रोदा सिर निसरियो अधरात।
प्रथीपत सामल ताम पुकार।
मनछिय तैड़व राज मंझार।।

दिसा जगमाल षत्री दइवाण।
मंडै मिसलत लिखे फरमान।
वेगावेग मैलीय दोय वजीर।
वेगड़ैह कोप कियो नरवीर।।

दलारोय मेलेह सीस दुझाल।
जाणू जद मूझ हितू जगमाल।
सुणै गल हाल जगा सुभियाण।
जोइलारै डेरैय जोध जवान।।

विच त्रियै आदर दाष नमैष।
आपे दोय तेग अने अस अेक।
इषै अस सुद्रब तेग अपाल।
मालावत लोभ धरै जगमाल।।

वड़ा परधानाय बूझिय बात।
घड़ी देयपाल दला सिर घात।
प्रमेसुर अंक तणै परमाण।
मंडे धर छाडाय वेध मंडाण।।

वेसासैय . दाषेय कोल वचन्न।
मारु राव द्रोह धरै विच मन्न।
जगै द्रब लोड़ण जैत जियार।
ताता खग वावाय कीध तैयार।।

आई नह आव तणै उपगार।
जोइयाय लाधोय चूक जैवार।
इषै मन सोच अरोड़ अपार।
हुवो लषवेरो ए कोस हजार।।

आई तोय गत अलष अदेस।
दोषी नजदीक दुरंतर देस।
पुणै इम षान सबै परवार।
हमैय कुण आहै रषणहार।।

विच त्रदाषै सोच वराम।
तठै इक रावत बोलियो ताम।
उबारण रंकाए चित उदार।
वसै ओय वीरम जूह विडार।।

मारु सलषावत भाय. मौड़।
ठावौ ओय बैठोय ठाविय ठौड़।
रिमां पड़गाह षत्री रठ राण।
तपै भड़ वीरम ऊचीय ताण।।

उठै था मेलुय जेथ अपाल।
जठै नह गंज सकै जग माल।
विचत्रिय सांभल वैण विचार।
त्यारी कर जीण षड़े तोवषार।।

जोइयांय कूच किलो विण जाण।
उतारोय कीध दरगह आण।
दलो मिल वीरम हूत दूबाह।
आपै कर जोड़ समाध अथाह।।

हुवो जद धूहड़ जूह विडार।
धजाय बंध सरणाया साधार।
पुणै इम वीरमदेव पुंचाळ।
अठै था षान करै कुण आळ।।

जितै मो सीस षवां पर जाण।
इतै कुण गंज सकै तो आण।
प्रथीपत तैड़ वड़ा परधान।
सोलंषीय माधोय पाथ समान।।

दुसासण डाभी दुरजणसाल।
कानां जग माल सुणी किरणाल।
धुणै खग धूहड़ लाग ध्री लाग।
उडै पड़ जाण षंडी वन आग।।

त्रह त्रह वाहर वाज त्रमाल।
पमंगा ए पीठ मंडै पषराळ।
ओपे सिव जेहा ए गात अथाह।
सूरा भड़ भीड़ैय टोप सनाह।।

भुजा डंड सावळ तोलेय भूप।
रकेबांय पांव दिया जम रूप।
दला कर आरंभ भींच दूझाळ।
मालावत साल कियो जग माल।।

षेड़ेचो ए छात षड़ै कर षीज।
भिड़ेवाय काकाय हूंत भतीज।
मिले पंथ सालळ षैंग मरद्द।
गमागम उमट घोर गरद।।

निहंसेय राग सिंधू नीयसाण।
वळोवळ छायाय रंभ विवाण।
पुगा अस षेड़ेय भिच वेभीत।
जगाथह वीरम री जग जीत।।
~~आढा पहाड़ खान
टंकण-डॉ लक्ष्मणसिंह गोगादेव गड़ा

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