सैनांणी

परमादरणीय मनोहरसिंह जी राठौड़ रो एक जीवंत चित्र

।।छप्पय।।
छत्राण्यां इण छिति, गुमर रची जग्ग गाथा।
सुणियां अंजस सरब, माण में झुकज्या माथा।
आंण थरप इण अवन, ध्यांन सुजस दिसी धारी।
ज्यांरी कीरत जोय, साची जपै संसारी।
इल़ नांम अमर अजतक अहो, रसा अरक लग रैवसी।
बैवसी बात वसुधा परै, कवी सदाई कैवसी।।1

हथल़ेवो जिण हाथ, छतो जोड्यो छत्राणी।
सुख-दुख एको समज, पीव रो रखियो पाणी।
बल़ां वीरता बेख, नाक अरियांण नमाई।
च्यार पखां जल़ चाढ, कीरती अवन कमाई।
सुरलोग गई रख सुजस नै, इल़ वरतै अजलग अठै।
जगत री ख्यात फिर जोयलो, को समवड़ दूजी कठै?2

बजियो रण रो बंब, चित्त चूंडाहर चल़ियो।
निरखण धण रो नूर, वलम दिस डोढी वल़ियो।
जाण्यो हाडी जदै, नाह मन नाय नत्रीठो।
रूप ऊपरै रीझ, डगर डगमगतो दीठो।
आवतो कुजस लखियो अँतस, हाडी जस मग हेरियो।
अणबीह मरण करजै अवस, फट कह मुख यूं फेरियो।।3

चूंडावत यूं चव्यो, मरण डर लेस न मानूं।
भूल न लूं रणभोम, कायरां समवड़ कानूं।
प्यारी धण सूं प्रेम, छतो नह जको छिपावूं।
सैनाणी इण सकज, प्रीत सूं हाथां पावूं।
चित विचल़ रतन चूंडाहरो, मुणतो अगरां-मगर सूं।
पेखियो वांम सूरो प्रचँड, डगमगतो रण डगर सूं।।4

सहजै कँवरी सहल, सँभी हाडी सतधारी।
मंगल़ थाल़ मँगाय, वसू वड बात विचारी।
जस उबरै जग जोय, विमल़ वाचै कव वातां।
खरी रचूं इक ख्यात, जाय नहीं जुग्ग जातां।
हिव समै सोच हाडाहरी, काम जगत इण विध कियो।
निज सीस काट धव नै निजर, कर दोयां सांपै दियो।।5

प्रिथमी पंगी प्रीत, चरित फिर ऊजल़ चावो।
रजवट ऊजल़ रीत, थप्यो जसनांमो ठावो।
निरभै ऊजल़ नीत, साहित जिणरो भल साखी।
दे माथो महियांण, रसा थिर बातां राखी।
प्रशंसा जगत सारो पुणै, निसचै गल्लां नाज री।
इणांरै त्याग अवनी अमिट, सोभा सरव समाज री।।6

उण वरियां अवनाड़, सीस सैनांणी धारी।
प्यारी वाल़ी प्रीत, भई अरियां पर भारी।
जम री लेय जमात, तांण तरवारां ताती।
दल़ ओरँग रो दाट, खटी सीसोदै ख्याती।।
मेवाड़ मुगट जस मंडियो, राज लियो जस राजसी।
मरट री बात बहसी मही, वीर चूंडाहर बाजसी।।7

कर निज माथो काट, प्रीत परमांण पठायो।
रूप रंग नै राग, वांम धरती विसरायो।
जस ही जीवण जोय, पढी छत्रांणी पाटी।
निकल़ंक राख्यो नांम, खंड-नव कीरत खाटी।
जिण दियो जनम जग जोयलै, महिमा पसरी मातरी।
कुण होड बता दुनियण करी, जाहर में इण जातरी?8

बहिया रण बजराग, राग सिंधू रणकारां।
कर काठी केकाण, धरा जुड़िया असधारां।
निडर जिकां घर नार, लेस रण बीह न लाती।
साच अरक री साख, मरण घर मंगल़ मनाती।
उवां रो सुजस प्रिथमी अमर, सुमर सदा कव कैवसी।
सुध भाव जगत सुणसी सदा, वायु सौरम बैवसी।।9

~~कवि गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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