*समय को पहचानो*

हे मित्र! समय को पहचानो
बस इतना सा कहना मानो
आलस से यारी मत करना
ज्यादा होंशियारी मत करना।

ये क्षण में सबको छलता है
पल पल में रूप बदलता है।
ये टाले से नहीं टलता है
अपनी ही गति से चलता है।

जो जाग रहा या सोता है
ये सुलभ सभी को होता है
पहचान गया सो पार गया
अनभिज्ञ निमिष में हार गया।

कबहू न प्रतीक्षा करता है
ये नहीं किसी से डरता है
ये वक्त जगत का राजा है
चहुँ ओर इसी का बाजा है।

ये समय सभी का होता है
पर सिर्फ अभी का होता है
ये आज अभी इस क्षण का है
ये पक्का अपने प्रण का है।

जो पल को पकड़ न पाएगा
वो कल पक्का पछताएगा
ये ‘बेक-लॉग’ नहीं भरता है
ना ‘तुष्ट’ किसी को करता है।

ये नहीं किसी का नाती है
बस कद्रदान का साथी है
इससे जो आँख चुराता है
वो खा ठोकर गिर जाता है।

जो इससे कदम मिलाता है
बस सफल वही हो पाता है
ये पल में आँख मिलाता है
ये पल में आँख चुराता है।

कब किसका साथ निभाता है
कब किसकी अकड़ मिटाता है
(ये) आते जाते दिख जाता है
पर रोक कोई ना पाता है।

ये थोड़े दिन नाराज रहे
तो नित्य नवेले राज कहे
किस किस से कैसा नाता है
पक्की पहचान करता है।

यह समय आज जो तेरा है
सो फीसदी कल वो मेरा है
ये भले बुरे की बात नहीं
है अपनी कुछ औकात नहीं।

ये अजब परीक्षा लेता है
ये प्रश्न विलक्षण देता है
सारे ही प्रश्न अन्यारे हैं
पर उत्तर सबके न्यारे हैं।

अब तक का अनुभव कहता है
यह एक समान न रहता है
इसलिए सही समझाता हूं
अपना अनुभव बतलाता हूं।

ये घोर निराशा ये रोना
ये अहंकार के वश होना
ये अपने दोष छिपाना भी
औरों को सबक सिखाना भी

जिस समय फैसला आता है
सब धरा यहीं रह जाता है
जो धैर्य-धर्म अपनाता है
बस वही विजयश्री पता है।

~~डॉ. गजादान चारण ‘शक्तिसुत’

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *