संकरिया सूंडाल़

चारण कवियां रै सारू महाराजा मानसिंहजी सटीक ई कैयो है कै ‘स्वामीभक्त सत्यवक्ता रू वचनसिद्ध’ अर्थात साम धरम पाल़ण में चारण सिरोमणी होया। राजस्थानी संस्कृति में साम धरम सबसूं सिरै धरम मानियो गयो है। देवकरणजी बारठ रै शब्दां में-

किरता अपणै हाथ सूं, तोलै सबै करम्म।
सौ सुक्रत इक पाल़णै, एको साम धरम्म।।

ऐड़ो ई एक स्वामीभक्ति रो किस्सो है जुढिया रा लाल़स शंकरजी रो। शंकरजी लाल़स, लाल़स लूणैजी री वंश परंपरा में गोदोजी लाल़स सपूत अर तेजाजी रा पोता हा। जुढियो मा सैणी रो सुथान। जिण विषय में ओ दुहो चावो-

तखत दोनूं तड़ोबड़ै, जुढियो नै जोधाण।
बठै राजावां बैठणो, (अठै) सैणी तणो सुथान।।

लाल़स शंकरजी, महावीर कल्ला रायमलोत रै मर्जीदानां में सींवाणै रैवै। महावीर कल्लो अडर, साहसी अर स्वाभिमानी राजपूत हो। जिणरै विषय में महाकवि पृथ्वीराजजी राठौड़ लिखियो है-कल्लो भल्लो रजपूत कहीतो!!

जद वि.सं.1643 में अकबर रै कानी कल्लै नै सर करण खातर मोटो राजा उदयसिंह आपरी सेना लेय आयो। पृथ्वीराजजी रै शब्दां में-

ऊदो राव दुरंग उथाल़ै।
रायमलोत दुरंग रुखाल़ै।।

उण बगत कल्लै राठौड़ जिण अदम्य साहस सूं अकबरी सेना रो मुकाबलो कियो जिण माथै डिंगल़ घणै लिख अंजस महसूस कियो। उण बगत सिंवाणै किले री पोल़ रा रुखाल़ा शंकरजी लाल़स हा। उदयस़िंह खप रैयो पण गढ भिल़ नीं सकियो। पोल़ खोलावण रा जतन किया पण शंकरजी लाल़स रै आगे पार नीं पड़ी। छेवट गढ दरवाजा हाथियां री सूंडां सूं तोड़ावण रो विचार कर मदछकिया हाथी पोल़ साम्हीं छोडिया गया पण सामधरमी सूरमै शंकर आपरी तरवार सूं उण हाथियां री सूंडां जिण बहादुरी अर चंचल़ता सूं बाढी उणसूं उदयसिंह अर उणरा आदमी शंकर माथै खार घणो ई खाधो पण पार नीं पड़ी।

छेवट वीलिया/पोलिया नाई नामक देशद्रोही रै दिये भेद सूं गढ भिल़ियो। कल्लोजी अर उणां रा आदमी केशरिया करर जूझर काम आया। गढ माथै उदयसिंह री आण फिरी। शंकरजी नै चारण होवण रै नातै दूजी कोई सजा नीं देयर उदयसिंह हाथोहाथ देशनिकाल़ो दे दियो।

उण जुद्ध में शंकरजी री बताई बहादुरी री प्रशंसा करतां किणी कवि लिखियो है कै-

संकरिया सूंडाल़, हाथाल़ी तेजलहरा।
लाल़स व्रन लंकाल़, गढपत आगे गोदवत।।

(हे गोदा रा सपूत शंकर! गढपत(राजा) रै आगे रैयर तैं थारी तरवार रो पाण बताय, हाथी नैं रोक र सिंघ रूपि चारण होवण री बात साची करदी।।

~~गिरधर दान रतनू “दासोड़ी”

 

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