सांस्कृतिक-झरोखा – डा. आई दान सिंह भाटी

मैं चानण खिड़िया बोर ग्राम मारवाड़ निवासी आपके सामने कुछ बातें रखना चाहता हूँ। यों तो इतिहास राजपूतों और चारणों के सम्बन्धों से भरा पड़ा है पर मैंने जो देखा और किया वैसा विरलों ने ही देखा होगा, किया होगा। मैं जिस बोर ग्राम में जन्मा, उसे छोड़कर मेरे पिता लुम्बटजी पाघड़ी ग्राम में आ बसे। यह ग्राम सूराचंद ठिकाने का था और सूराचन्द के ठाकुर मेरी कविताओं पर रीझ गये थे। मैं पिताजी के साथ यहीं रहने लगा। पर यह तो मेरी यात्रा का प्रारम्भ था।

मेरा जन्म बोर ग्राम में हुआ था और वह विक्रम की चौदहवीं सदी का अंतिम दशक था। उस समय जयंतियाँ मनाने का रिवाज थोड़े ही था, बस पुत्र जन्म पर “बधावा” (जन्मोत्सव-जिसमें सभी सम्बन्धी शादी-ब्याह की तरह इकट्ठे होकर खुशियाँ, रंगरळियाँ करते थे) होता था, फिर जन्म दिन का कोई अर्थ शादी-सगपण के लिए होता था, बस। पिताजी बताते थे कि तुम्हारे जन्म के साल जमाना अच्छा हुआ था, मतीरे बहुत हुए थे। तब एक ज्योतिषी ने बताया था कि यह लड़का इस गाँव में रहने वाला नहीं है। पिताजी को इस भविष्यवाणी से न ख़ुशी थी और न ही दुःख। उन्हें तो मतीरे बहुत पसंद थे, सो वे पुत्र जन्म की ख़ुशी में मतीरों में रम गये थे। पिताजी बताते थे कि तीन काळ के बाद जमाना आया था और लोग तुम्हारे जन्म को शुभ मानते थे।

पन्द्रह-सोलह की उम्र से मैं कविता करने लगा था। मैंने उस काल के मारवाड़ के ख्यातिप्राप्त चारण-कवि हूँफकरण जो लोक में हूंफाजी के नाम से ख्यात थे, उनकी कवितायेँ सुनी थी और वे मुझे न केवल प्रिय लगते थे, बल्कि उनकी कविता की ताकत से भी में प्रभावित था। लोक में ख्यात था कि उन्होंने जैसलमेर के तत्कालीन रावल भाटी दुर्जनसाल जो दूदा के नाम से ख्यात थे, उनके कटे हुए माथे को कविता की ताकत से बुलवाया था। मैं भी अपनी कविता को साध रहा था और अपने मन में यह हूंस रखता था कि मुझे भी कोई दूदाजी जैसा गुणग्राही मिले। और मुझे गुणग्राहक मिला भी, पर उस गुणग्राहक का भाग्य रावल दूदाजी जैसा नहीं था। यही कारण है कि मैं सारी भौतिक उपलब्धियों के बीच असंतुष्ट रहा। मुझे भौतिक संसार नहीं, मेरे शब्द-संसार से प्रेम था और उसे समझने वाले कम थे। धन तो पिताजी घोड़ों के व्यापार से खूब कमाते थे और कोई कमी भी नहीं थी धन की। मेरे सूराचंद आने के पीछे भी यही कारण था। वहां के ठाकुर शब्द-प्रेमी थे और मेरी कविताएँ वहां तक श्रुति के माध्यम से पहुँच चुकी थी। पर पाघड़ी ग्राम मेरे भाग्य में कम ही लिखा था, बस चार-पांच बरस। मेरी कविता के शब्द मेवाड़ के महाराणा मोकल तक पहुँच चुके थे और मेवाड़ पहुँच कर मैंने अपने शब्द की महत्ता स्थापित की। महाराणा मेवाड़ ने मुझे “चूम्बरौ” और “गुलछरौ” ग्राम सासण देकर मुझे सम्मान प्रदान किया था।

पर भाग्य में जो लिखा होता है, वही तो घटता है। मारवाड़ मुझसे छूटा जरूर था, पर मन में तो वह बसता ही था। विधि की विडंबना देखिये कि मेवाड़ी-राज गृह-कलह का शिकार हुआ और मंडोर अधिपति राव रणमल को चित्तौड़गढ़ आना पड़ा। उन्होंने महिपा पंवार और चाचा-मेरा से बदला लेकर चित्तौड़ को निष्कंटक भी किया, किन्तु इससे उनका प्रभुत्व मेवाड़ में बढ़ा और मेवाड़ी अपने को आहत अनुभव करने लगे। मैं मारवाड़ से था और मेरा लगाव राव रणमल से होना स्वाभाविक था। मैंने रावजी को मेवाड़ की बदलती परिस्थितियों से आगाह भी किया था, पर रावजी ने इसे मेरा अपने प्रति केवल आत्मीय भाव ही माना। फिर भी मैंने उन्हें राजकुमारों को सुरक्षित स्थानों पर रहने की हिदायत दी थी। मुझे इस बात की सदैव ख़ुशी रही कि मेरी हिदायत से ही राजकुमार जोधा और दूसरे मारवाड़ के लोग सुरक्षित बच निकले। पर मैं राव रणमल को नहीं बचा सका, इसका सदैव दुःख भी रहा है। मैं ही जानता हूँ रावजी ने चित्तौड़ के लिए कितना किया था, पर जब संशय का कीड़ा मन में घुस जाता है तब सारी बातें बेकार हो जाती है। मेवाड़ियों ने वही किया जो उनकी योजना थी।

पर मैंने भी तब तय कर लिया था, कि मुझे क्या करना है ? मैंने रावजी की वीरता के दोहे और छंद रचे। मुझे पता था कि इससे मेवाड़ी नाराज होंगे, पर मुझे तो शब्द से प्रेम था। मैंने रावजी पर गीत रचा, जिसमें उनके अंतिम समय के चमत्कारिक रूप का वर्णन था, उन्होंने सोते हुए कतार निकाल कर आक्रामकों का सामना किया था –

अपूरब बात सांभळी अेही, रिम चूके म्रित दिन रयण।
सूते तैहिज काढ़ी सुजड़ी, जागत काढै घणा जण।।

मैंने रावजी की वीरता के दोहे भी रचे थे, जिसमें मेवाड़ियों को “गुण-चोर” भी कहा था-

कमधज जुतै कियाइ, चीतौड़ै गुण चोरिया।
मेळ तणा मंत्र थाइ, राणा उकटीयौ रयण।।

पर जो होना वह हो चुका था। मेरी चिन्ता रावजी के सम्मानजनक ढंग से दाह-क्रिया करने की थी। मैंने तय कर लिया था कि भले ही मेरी मेवाड़ी जागीरें जब्त हो जाय, भले ही मुझे प्राण गंवानें पड़ें, पर रावजी का सम्मानित ढंग से दाह-संस्कार करूंगा। और वह मैंने किया भी। मुझे अनेक प्रकार से हतोत्साहित किया गया, अनेक प्रलोभन दिए गए, पर में अविचलित रहा। मारवाड़ मेरी रगों में था और मुझे मारवाड़ के गौरव की रक्षा करनी थी। मैं यह किसी लोभ-लाभ के लिए नहीं कर रहा था। यह मेरा मानवीय दायित्व था और मेरी मातृभूमि का मुझे हक अदा करना था।
समय भी क्या क्या नहीं दिखाता है। जिस रावजी के नाम से “हिरण बांडे होते थे, उनकी देही के दाह-संस्कार के लिए कोई लकड़ी तक देने को तैयार नहीं था। राव रणमल का नाम अब मेवाड़ में खलनायक का पर्याय था। कुम्भाजी का कोप कौन अपने सिर लेता ? पर मैं इस संकट काल में अडिग रहा। अपने घर के दरवाजों की लकड़ियों से रावजी का दाह-संस्कार किया। मैंने न केवल यह सब किया अपितु उनकी अस्थियाँ हरिद्वार ले जाकर गंगाजी में विसर्जित की। मेरे इस काम से मारवाड़ का जन-जन मेरे ऊपर गर्व करने लगा और राठौड़ राज में मेरी प्रतिष्ठा बढ़ गई। लेकिन मैंने यह प्रतिष्ठा के लिए नहीं किया था, अपना कर्तव्य समझ कर किया था।

राव रणमल का जब वध किया जा रहा था, तब एक रावजी का स्वामिभक्त नक्कारची चिल्लाया था – “जोधा भाग सके तो भाग, थारौ रणमल मारियौ। ” इस समय का लोक में प्रचलित एक दोहा इस प्रकार है–

चूंडा अजमल आविया, मांडू हूँ धक आज।
जोधा रणमल मारिया, भाज सकै तो भाज।।

राजकुमार जोधा को चेताया तो नक्कारची ने था, पर इसे कविताबद्ध करने वाला मैं ही था। इस दोहे को लोग अशुद्ध करके पढने लगे हैं। हमारे जमाने में तुकें नहीं भिड़ाई जाती थी। लोग कविता की आत्मा को शब्दों में उतारते थे।

आज कल आप लोग दौड़ने को भागना कहते हो, इसलिए तुकें भिडाकर लोग कहते हैं –
…, मांडू हूँ धक आग।
…., भाग सकै तो भाग।।-
अब आप ही बताइए इस दोहे में आग का क्या अर्थ है? संस्कृत में “भाजना” क्रिया है, डिंगल सीधे तत्सम शब्दों को अपनाती थी। आज की बातें मैं नहीं जानता। ख़ैर …

रावजी की अस्थियाँ हरिद्वार में विसर्जित करने के बाद मेरा मन भी मेवाड़ से उचट गया था। पर मारवाड़-मंडोर पर मेवाड़ी सेना का कब्जा था। जोधाजी बिखा (संकट-काल) काट रहे थे। मैं अपनी उदासियों में खोया अपना बिखा काट रहा था। पर दिन पलटते देर नहीं लगती है। विक्रम संवत 1510 में राव जोधाजी ने मंडोर लिया। और मुझे भी मारवाड़ पुकारने लगा। राव जोधाजी का सन्देश मिलते ही मैंने बड़गड़ां बड़गड़ां अपना घोड़ा मारवाड़ की तरफ दौडाया। राव जोधाजी ने मेरे कामों के प्रति न केवल कृतज्ञता प्रकट की, अपितु मुझे बड़े भाई सा स्नेह दिया। उम्र में तो मैं बड़ा था ही, सौ बरस पार कर लिए थे मैंने। राव जोधाजी ने मुझे मारवाड़ परगने के खैरवा ठिकाने का भींवावाली जाजीवाल और सोजत परगने के गोधोळाव व बिन्ठोरो ग्राम सांसण (जागीर) देकर सम्मानित किया। पर मैं इस माया में लिप्त होकर अपने शब्द संसार से कट चुका था। बस मैंने रावजी के शौर्य के वर्णन के साथ ही अपने की न केवल इतिश्री कर ली, बल्कि “भीमोतों के सोरठे” लिख कर कलम को विराम दे दिया। भीमोत राव चूंडा के पुत्र भीम के वंशज हैं और इनमें वैरसल और बरजांग योद्धा हुए हैं, धीर, वीर और रजवट का निर्वाह करने वाले जबरदस्त योद्धा। शायद नियति को यही मंजूर था। मैं बोर गाँव से आज तक के सफर को देखता हूँ तो पाता हूँ कि मैं ऐश्वर्य के बीच अकेला खड़ा रहा हूँ।

इस बीच राव जोधाजी ने मुझे टोडा के सोलंकियों के पास से अपने पुरोहित दामा को लाने के लिए मुझे भेजा। यह मेरा सौभाग्य था और मैंने इसे पूरा किया। राव बीकाजी ने लाखपसाव देकर मेरा मान बढाया, पर मुझे लगता है, मुझे जो करना था, मैं उसका शतांश भी नहीं कर पाया हूँ। मेरा नाम तो कविता के कारण था, मैं सत्ता के जाल में क्यों फंस गया ? मैं शब्द-धर्मी चानण खिड़िया इस अपराध-बोध में सारी उम्र अंदर ही अंदर भुगता। आज अपनी पीड़ा प्रकट कर इस अपराध-बोध से मुक्त हो रहा हूँ।

(चानणजी की प्रसिद्धि का एक छप्पय)
चूक हुयौ चित्तौड़, राव रिड़मल माराणो।
दीनौ चानण दाग, राण कुम्भो रीसाणो।।
मती रहो मेवाड़, कोप मुख हुंतो कहियो।
सारै गया सराद, ताम कव टोडे रहियो।।
घरवाल जोड़ तेड़ावियो, प्रोहित दामो परटि्ठयो।
कर मोर नेग कवचंद ने, गोधेळाव समप्पियो।।

~~डा. आई दान सिंह भाटी

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