संतो! वरे भाव री हेली!

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संतो! वरे भाव री हेली!
तनडो भींज्यों मनडो भींज्यों, हरी हुई हिव वेली!

खल़कै खाल़ा, वहता व्हाल़ा, भरिया नद सरवरिया!
कोई उलीचै भर भर खोबा, डूबाणा केई तरिया!
बडी बडी झड़ लगी जोर री, नेवै धरो तपेली!
संतो वरे भाव री हेली!
तनडो भींज्यो मनडो भीज्यो हरी हुई हिव वेली!

गड़हड़ गड़हड़ बादल़ गाजै, चम चम बीज चमंकै।
छम छम छम छम पडतां छांटां, घूंघर जांण घमंकै।
नाचै मोरा, सुण अठ पोरां, हिव री सजी हवेली!
संतो वरे भाव री हेली!
तनडो भींज्यो मनडो भींज्यो हरी हुई हिव वेली!

विमल़ कमल़ दल़ बिगसण लागा, तरू नव पल्लव लागा।
कल़ी कोमल़ी खिली काव्य री, गीत गज़ल रे बागां।
सौरम छाई, जूही जाई, चंपक गेंद चमेली।
संतो ! वरे भाव री हेली!
तनडो भींज्यो मनडो भींज्यो, हरी हुई हिव वेली!

कविता-वसुधा इण झड़ झीली, तन छाई तरूणाई!
अलंकार रस उकती आभरण, सजै खडी सुखदाई!
नरपत निरखै, हरखे हरखे, नैणां भरे नवेली!
संतो वरे भाव री हेली!
तनडो भींज्यो, मनडो भींज्यो, हरी हुई हिव वेली!

~~©वैतालिक

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