सरस्वती वंदना

।।दोहा।।
कमल तंतु रो कंचुऔ, विमल देह पर धार।
रसन कमल बैठ ‘र रसा, रेलावौ रस धार।।१
कमल नयनि, आनन कमल, कमल देह विस्तार।
कमलासन हिय कमल बस, अंब करो उपकार।।२
मन रंग थल पर मावडी, किसलय कमल अपार।
आसन बैठ’र अंबिका, सुर री छेड सितार।।३
नटी !रसन आसन रहौ, वसन सेत बस धार।
लय री ललिता! छेडजे, सुरमय पछै सितार।।।४
पिंगल री पद पैजनी, कर धर डिंगल डाक।
रसन पटांगण रास रम, अनहद अंब अथाक।।५

।।छंद: हरिगीतिका/सारसी।।
शुभ स्वेत वसना, ललित रसना, दडिम-दसना, उज्जवला।
कलहंस करती, फरर फरती, तिमिर हरती, निर्मला।
सिर मुकुट सुंदर, हार गल वर, माल मनहर कर अति।
प्रिय पुस्तपाणि, वाक-वाणी, वीण पाणी, सरसती।।१

झल़ रूप जल़ हल़, तेज भल़ हल़, चंद्र निरमल़, शुभ स्वरा।
कमनीय कुंतल, स्वेत पाटल, चंप-डोलर मोगरा।
मुख मधुर हासी, भव्य भासी, रूप राशि, गुणवती।
प्रिय पुस्त पाणी, वाक वाणी, वीण पाणी, सरसती।।२

झण झांझ झणणण, तंत्री तणणण, खणणखणण, खंजरी।
भण भेरि भणणण, धरणि धणणण, छणण छणण, झांझरी।
रव गगन गणणण, हरत जन मन, बीण वृणणण, नित प्रति।
प्रिय पुस्त-पाणी, वाक-वाणी, वीणपाणी, सरसती।।३

कटि किंकणि रुण झुण, वलय कंकण, खणण खण खण, हाथ रा।
रमझोल़ रम रम, नुपुर छम छम, घुंघरु घम घम, मात रा।
गजमत्त गामा, वंदना मां, हियै हामां, पद रति।
प्रिय पुस्त-पाणी, वाक-वाणी, वीणपाणी, सरसती।।४

शुभ कान कुंडल, नाक नथ वल़, सेत निरमल, कांचल़ी।
जिण कोर ऊजल, हेम झल़ल़ल, भाल भल़ल़, बेंदुली।
चख नेह खल़ हल, वहै पल पल, मैल मन गल़, शुचिमति।
प्रिय पुस्त-पाणी, वाक-वाणी, वीणपाणी, सरसती।।५

शुभकमल आसनि, रसन वासिनि, ह्रदय शासनि, रीझियो।
विपदा विनासन, हंस वाहन, साम गायन, दीजियो।
सुर साज रांणी, कवित क्हाणी, राज-राणी, अरपती।
प्रिय पुस्त-पाणी, वाक-वाणी, वीणपाणी, सरसती।।६

वल़ विविध वातां, खरी ख्यातां, गीत गाथा, डींगल़ी।
शुभ रचण रासा, विविध भासा, रमों रासा, मन गल़ी।
त्रय ताप हारी, जाउं वारी, मात मारी, लधु मति।।
प्रिय पुस्त पाणी, वाक-वाणी, वीण पाणी, सरसती।।७

हे कमल नैणी, मधुर वेैणी, ज्ञान देणी, शारदा।
शुभ उकति दाता, बुधि प्रदाता, गिरा माता, आरदा।
घन तिमिर गंजण, तूं प्रभंजण, करत वंदन”नरपति”।
प्रिय पुस्त पाणी, वाक-वाणी, वीण पाणी, सरसति।।८

।।कलस छप्पय।।
विजया, नंदा, जया, शारदा श्यामा, भाषा।
विद्या, बाला, परा, धीषणा, रसना-वासा।
मेधा, दक्षा, क्षया, चारणी, कबरी, स्वाहा।
प्रभा, अपर्णा, उमा, केशी, गो, हे हंस वाहा।
गी, सिंदूर-तिलक प्रिया!, भवा!सांभवी, भैरवी।
नित नरपत भज नारायणी, वरदा!स्वरदा, यादवी।।१

।।दोहा।।
रसा !शारदा !भारती, गिरा वारिधि-ज्ञान।
मन तम घन मां मेटजै, नरपत शिशु नादान।।१
विमला थें वसू पर किया, मूरख नें विद्वान।
बाल़क नें पण बुध्धि दे, गिरा गुणों री खाण।।२

~~©नरपत आसिया “वैतालिक”

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