शरणागत सारू अगन रो वरण

आपांरै अठै कैताणो है कै ‘आप मरतां बाप किणीनै ई याद नीं आवै’। बात सही ई है पण अठै ऐड़ा लोग ई हुया है जिकै बाप अर बोल नै एक ई मानता अर आं माथै आंच आयां मर पूरा देता। बात झलगी तो झलगी!! पछै तो ‘तबलग सांस शरीर में, जबलग ऊंची ताण।’ जिकै ऊंची ताणै, उणांनै ईज जग जाणै। जिकै ऊंची नीं ताणै उवै आयां ज्यां ई उठ’र बुवा जावै। लारै ‘खुड़को हुवो न खोज’ री बात चालै। पण जिकै भाइयां नै सुख, सैणां नै अंजस अर आयै अवसर नै सिग चाढ’र पिता री मंशा नै पूरै, उवै ईज जगत में धनकार लेय’र जावै-

सुख भायां सैणां अंजस, आयां सिग अवसाण।
पितु मनसा पूरावियां, ज्यां जायां धन जाण।।

आपरै जनमणै नै जिकै धिन-धिन कर’र गया उणांमें एक चावो नाम है मा देमां रो।

बात आ है कै चारणां में बीठूजी री वंश परंपरा में केई नामी नखतधारी नर जनमियां, जिणांरो नाम आज ई लोकरसना माथै अखी है। बीठू धर्मोजी, बोहड़जी, नगराजजी आद नाम अंजसजोग।

इणी कवियां मांय सूं एक बोहड़जी बीठू, गांम साठीका(बीकानेर) रा मोटा कवेसर हुया। इणां री ज वंश परंपरा में धींधोजी हुया। धींधोजी री वंश परंपरा में रासोजी धींधा हुया जिणांनै खावड़ियां झिणकली(बाड़मेर) गांम दियो। कोई कैवै उदयसिंह खावड़िया ओ गांम दियो तो कोई कैवै रिड़मल खावड़िया ओ गांम दियो। पण कविवर रासोजी, खावड़ियां री दी जागीर में आय बसिया।

आं रासाजी री परंपरा में मेहाजी दूसलोत मोटा कवि हुया। जिणांरै विषय में आ ओल़ी घणी चावी है-

मेहो छंदे झूलणै मालो

आं मेहोजी नै 1598 वि. जोधपुर राव मालदेवजी खेड़ी गांम देय सम्मानित किया।

ई झिणकली गांम में आगै जायर महादानजी, भानोजी आद बीठू ठावका मिनख हुया जिकै आपरै मिनखाचार अर सपूताई रै पाण चोताल़ै चाव रह्या। आं रो जोपियोड़ो कड़ूंबो अर जाडा मिनख। कनै घणी जमी घणो वित्त।

भानोजी रो ब्याव घूहड़ां रा घूहड़ नारायणजी री बेटी देमां साथै हुयो। देमां सत-शील अर अपणास री आगार रै सागै ई चारणाचार री आखड़ी पाल़ण वाल़ी लुगाई।

उण दिनां जैसलमेर माथै महारावल़ अमरसिंहजी रो राज। अमरसिंहजी वीर, धीर अर गंभीर मिनख। मोटा दातार तो साथै ई राजपूती रा प्रतीक पुरूष। चारण कवेसरां रा माड में जठै-जठै ई द्रोही हा, उणांनै महारावल़जी दंडित किया। इण पेटे कविराजा बांकीदासजी लिखै-

वैरी वेहल वरण रा, दीठा जिण-जिण देस।
माड़ेचा तैं मेलिया, आभ धूंवा अमरेस।।

अमरसिंहजी माड रै टणकै रावल़ां में मानीजै। जिणांरै अपरबल़ री घणी बातां चावी। एक’र ऐ मलोमली गुड़ा राणा साहिबखांनजी रा जोड में चरता 140 घोड़ा घेर जैसलमेर ले आया। जाडा जिकै जूझार बाजै। पछै उण दिनां ऐड़ो काम कीरतिजोग मानीजतो-

कर घोड़ा रजपूत कर, देवण देसां दोस।
भावै जिणनै रैयत कर, भावै जिणनूं खोस।।

साहिबखांनजी गूड़ा रा जोगतै राणां में हरवल़। उणांरा घोड़ा उण दिनां घणा चावा हा। इण घोड़ां रै विषय में कानूंजी मोतीसर(माड़वा)लिखै-

घणमोला जेरै घोड़ा रै।
साखेता सोहड़ सजोड़ा रै।
दस देसां रमहर दबिया।
साहबिया बे साहबिया।।

साहिबखांनजी रो सुजस घणो पसर्योड़ो। मिनखाचार सूं मंडित अर रैयत रा रुखाल़ा मिनख। वीर तो साथै ई निडर। ऊंच कैणी अर सादी रैणी। इणांरी सादगी अर उदारता विषयक ओ दूहो घणो चावो है-

धोबी कनै धुवाय, केयक नर गाहड़ करै।
मेलै कपड़ां मांय, सुजस तिहारो साहिबा।।

ज्यूं ई हाको हुयो कै गुड़ै राणैजी रा घोड़ा किणी घसकाय लिया तो खल़बल़ी मचगी। राजपूतां रा घोड़ा कोई ले जावै अर उवै जीवता मूंछा पलारै! आ बात मरणजोग मानीजती। क्यूंकै आं रो मानणो हो कै-
खावै जिको रो खेतियो खावै! अर खेतिये रो खावै, उणरो खो जावै!!

साहिबखांनजी अजेज पागियां सूं पतो करायो तो ठाह लागो कै घोड़ा जैसल़मेर रावल़जी लेयग्या। वै पुखता हा सो वाहर चढ नीं सकिया जणै नोरो-थोरो कर’र आधा-पूणा घोड़ा लावण नै आपरा आदमी मेलिया-

जे धन दीसै जावतो,
आधो लीजै बांट।।

पण डाकण बेटा देवै कै लेवै? वाल़ी बात ही। भाटी मांगियां घोड़ा देता तो ले जावता ई क्यूं? सो वां राड़धरां नै धक्का-मुक्की कर’र पाछा काढ दिया। इण धक्का-मुक्की में साहिबखांनजी रै भाई…रो पोतियो पड़ग्यो।

उणांनै माड़ेचां री चोरी अर शीना जोरी अखरी पण बल़ बिनां बुद्ध बापड़ी हुवै! सो उणां माथै ऊपर धूंमालो(शोक का प्रतीक) बांध लियो कै इण धक्का-मुक्की रो बदल़ो लियां ई पाघ बांधसी।

उण दिनां साहिबखांनजी रो बेटो भाखरसिंह महाराजा अभयसिंह जी री हाजरी में जोधपुर गयोड़ो हो। राजाजी सूं सीख लेय पाछो गुड़ै आयो तो उणनै पूरी बात ठाह लागी कै किणगत माड़ेचां उणरा घोड़ा उचका लिया अर उणरै मिनखां रो अपमान कियो। वो रीस में भाभड़ाभूत हुय’र आपरै टाल़वै मिनखां साथै चढियो।

उणनै मारग में बावड़ मिलिया कै उणरी दो घोडियां हरसाणी रै भाटी फतैसिंह रै घरै बंध्योड़ी है। भाखरसिंह, हरसाणी रै पाखती डेरा देय भाटियां नै संदेशो पूगायो कै –
“म्हारी घोड़ियां अर चोर दोनूं म्हनै सूंपो!!”

भाटियां भाखरसिंह नै चीकणी-चौपड़ी बातां सूं राजी कर’र उठै धीजो दिरायो अर अठीनै फतैसिंह नै समाचार पूगाया कै-
“भाखरसिंह आय पूगो है। घोड़ियां तो ले जावैला ई साथै तनै ई बेआबरू पण करैला।”

जणै फतैसिंह पूछियो कै –
“तो म्हनै कांई करणो चाहीजै?”

जणै भाइयां कह्यो कै- “जितो बेगो अठै सूं निकल़ सकै उतो बेगो निकल़ अर जिती भां जाय सकै उतो आघेरो जा परो। ताकि दूध अर दूआरी दोनूं रैय जावै।”

फतैसिंह डरियोड़ो ऊभघड़ी निकल़ियो। राठौड़ां नै भाटियां रै रचियै इण तोतक रो ज्यूं ई ठाह पड़ियो, उणां उणी बखत पग देख’र फतैसिंह रै लारै घोड़ा खड़िया।

घोड़ां रा लारै बाजता पौड़ अर उडती खेह सूं बीहतै(डरतै) फतैसिंह सोचियो कै कठै ई बिचाल़ै पकड़जीग्यो तो बुरा हाल हुवैला। इण सूं तो आ ठीक रैसी कै पाखती आए गांम झिणकली में चारणां रै अठै सरण ले लूं। चारण मरिया ई शरणाई नीं सूंपै अर राठौड़ ई चारणां माथै घणो उजर नीं करैला अर जे करेला तो ई गिरै जाणै अर डाकोत जाणै। आपां बच जावांला। आ सोच’र उवो झिणकली पूगो। आगै उण देखियो कै चारणां री एक सहुआल़ी(लुगाई) आपरै बाड़ै में गायां दूवै ही। उण आव देखियो न को ताव। सीधो जाय गाय दूहण वाल़ी रै पगां पड़तां बोलियो कै –
“हूं फतो भाटी! थांरी शरण हूं। बचावो जणै तो आ घड़ी है।” आ कैय पूरी हकीकत बताई।

गाय दूहण वाल़ा भानोजी बीठू री जोड़ायत देमां हा।

उणां कह्यो –
“रे भला मिनख! गोधां रै खसणै सूं बूझां रो खोनास है! म्हैं गरीब आदमी, पोरियो(काम) करां अर पेट भरां। थां लांठां री राड़ नै कद पूगां? थारै घोड़ी चढण नै है, दो पाऊंडा आगीनै भर अर कोई राजपूत रै अठै जाय शरण ले।”

जणै फतेसिंह कह्यो-
“माऊ! राजपूत तो हूं ई हूं पण हणै नीं आगै जावण री आसंग अर नीं लड़ण री। जे बचावो तो आ वेला है। नींतर म्हारी भावी हुसी ज्यां हुसी।”

देमां नै माऊ! शब्द सुण’र दया आयगी अर उणां सोचियो कै जे इण घड़ी ई री ठौड़ म्हारो खुद रो डीकरो हुतो तो हूं कांई करती? उणनै आगो थोड़ो ई काढती! आ सोच’र देमां कह्यो कै-
“तूं करनी रा झाड़ जाण आय ई ग्यो तो निरभै हुय जा। कोई धंतरसिंह क्यूं नीं हुवै? पैला म्हांरै गात घाव घालसी अर पछै थारै। जा घोड़ियां गांम में बांध दे अर उतारै में बैठ। झांखल़ कर।”

फतैसिंह दोनूं घोड़ै महादानजी रै उठै बांध’र ठयैसर बैठग्यो।

भाखरसिंह रै पागी बतायो कै फतो झिणकली गांम में बड़ग्यो। आ सुण’र उण ई घोड़ा लारै धीबिया। आगै देमां माऊ आपरै बाड़ै में दूहारी करै हा। उणां देखियो कै घुड़सवार चढिया ई गांम री गल़ी में बड़ग्या! उणां हाकल करी –
“कुण हे रे करनी रा चोर? गांम चारणां रो है! थांमे इतरो ई लोतर नीं? भला राजपूत दीखो! राजपूत ई इयां थपी मरजाद री पाज लांगसी तो पछै कुण पाल़सी?”

आ सुण’र भाखरसिंह नै तमतमी आयगी। वो बोलियो –
“परिया मरै कनी मरजाद बतावण वाल़ी। थनै ठाह नीं है कै हूं कुण हूं?”

आ सुण’र देमां ठिमरता सूं बोली कै –
“मींडा आदमी तो भलै घर रो दीसै! इयां खावै ज्यूं कांई बोलै?”

आ सुणतां ई उणनै भल़ै रीस आयगी अर उवो बोल्यो-
“बोली मरै कनी। ग्यान बगारती। म्हनै बोलणो सीखावै! ”

आ सुण’र देमां कह्यो -“भाऊ म्हनै लागै कै तूं अठै मोत रै खांचियो आयो दीसै! थारै माथै मोत भमती निगै आवै।”

आ सुण’र भाखरसिंह बोल्यो –
“ऐड़ी सतवादी है जणै म्हारी मोत बतावै कनी?”

“जा थारी मोत छठै महीणै हुय जावैली।”
देमां कह्यो तो भाखरसिंह कह्यो –
“छानी(चुप) मरै कनी। परचा देवती। थनै ठाह है ई कै म्हैं राजपूत हूं! मोत सूं लड़तो बैवूं। छवू महीणां में किणी जुद्ध में काम आयग्यो तो लोग-बाग थारा वचन सिद्ध हुवणो मानलै ला। तूं ऐड़ी डफरायां सूं बीजां नै डरावजै, म्हनै नीं।”

आ सुण’र माऊ पाछो कह्यो –
“जा मूरख थारो तीजो अर म्हारो बारियो एक ई दिन हुसी!!”

“अरे जा! जा! थारै तो अजै ई माथै री एक लटी धोल़ी नीं हुई! तूं मोटयार माल है! कद मरै अर कद थारो परचो पतीजै?”

भाखरसिंह रीस में कैतै उण गाय रै तड़ी बाई जिणनै देमां दूवै ही। तड़ी लागतां ई गाय कूदी, जिण सूं चरवड़ी छूटगी, दूध ढुल़ग्यो।

ओ खिलको देखतां ई देमां नै रीस आयगी अर बोली –
“मूढ जिण जीभ सूं थूं म्हनै कटुवचन बोलियो है, वा सवारै सूरज ऊगतां पाण उण बखत झड़ जासी जिण बखत तूं पाणी पीवैला। तूं तड़फड़’र कोजी तरियां मरसी। चारण आपरो शरणाई ऐड़ी गादड़ धमक्यां सूं सूंपसी तो अरक आथूण नै ऊगसी। म्हैं फतै नै वचन दिया कै म्हारै जीवतां थारै हाथ घालसी उवो पैला म्हारै घालसी। म्हे ठैर्या चारण! म्हां कनै फोजबल़ तो है नीं। शरणाई नै बचावण सारू म्हे कै तो तागो करां कै जमर पण वचनहीण किणीपण सूरत में नीं हुवां।”

इतरो कैय पाखती ई झूंपड़ै रै लांपो लगाय देमां सूरज री साख में जमर चढी।

भंवरदानजी बीठू ‘मधुकर’ (झिणकली) लिखै-

जल़िये कर जम्मर गात गनीझर,
मात देमां जगतंब मुणै।
कड़की जिम इंदर मेघ सजाकर,
हाथल़ वज्जर कंस हणै।
पड़ियो मुरछाकर भाखर पाधर,
भैरव धोखर कंध भगी।
दल़ियो भल सब्बल़ मात देमां दल़,
प्रब्बल़ हाथल़ दैत पुगी।।

तो इण ओल्यां रो लेखक(गि.रतनू)लिखै-

विटल़ वाद बधियो वल़ै, मांग लीध उण मोत।
देमां कह्यो उण दूठ नै, बोल लियो मुख बोत।।
भास ऊगतां भाखरा, पड़ै जीब परभात।
तूं मरसी मूरख तरां, मुदै कह्यो मुख मात।।
(सगती सुजस माल़ा)

अगन री उठती अराड़ी झाल़ां सूं बाकी रा राजपूत डरग्या पण भाखरसिंह तो काल़ै लोही रो मिनख हो! नीं उण कनै दया ही अर नीं हया। पछै माथै मोत चकारा काढै ही।
उण साथलां नै कह्यो –
“मरी जकी गी! इयां डरियां राज कीकर संभैल़ा? डरो मत अर आंरै घरां मांय सूं धान काढ लावो, जिणसूं घोड़ां नै पावरो दां।”

जैड़ो धणी वैड़ा ई चाकर। साथला गया, जको किणसारां मांय सूं अन्न काढ लाय। उण बखत भाखरसिंह रै साथै एक उसमान नाम रो मुसल़माण ई हुतो। उणरी घोड़ी आगै ज्यूं ई भाखरसिंह रै आदम्यां अन्न मेलियो तो उण आपरी घोड़ी नै कह्यो-
“भटारी! ओ दाणो चारणां रो है! पछै रगत सूं रंग्योड़ो है! तनै म्हारी आण है जे होठ पुरपुराया तो!!”

वाह! रै घोड़ी वाह!! इण सारू ई इण पशु नै देवअंशी मानियो है। उण, उण दाणां कानी जोयो तक नीं। भंवरदानजी झिणकली लिखै-

चारण रो अन्न मत चरै, आण दीधी उसमान।
धिन घोड़ी तुझ धीरता, धर्यो नहीं मुख धान।।

इणी मिनखां मांय सूं एक मिनख भाखरसिंह नै आय कह्यो कै – महादानजी रै घरै थांरी घोड़ियां बंध्योड़ी है!!”
आ सुण’र उण कह्यो-
“तो पछै खोली क्यूं नीं?”

उण आदमी कह्यो – “हुकम उठै ऊभी एक चारण कन्या रै तेज आगै म्हारी आसंग ई नीं पड़ी!!”

“जा रे गैलसफा! एक रे तेज रो पल़को तो तैं हणै दीठो ईज हो! ले दूजोड़ी रो तेज देखलां।”

इतरी कैय वो महादानजी रै घरै गयो अर घोड़ियां खोलण लागो जितै महादानजी री बेटी लाछां हाकल़ करी-
“खूटोड़ा असली राजपूत है कै कमसल? राजपूत हुय’र चारणां री मरजाद नीं समझै! इयां ऐ घोडियां कीकर खोलण दूं ला?”

इतरी कैय लाछां, भाखरसिंह रै हाथ सूं वाग पकड़ी। भाखरसिंह रीस में भाभड़ाभूत हुयोड़ै लाछां रै हाथ झाटको बायो जको आधो हाथ आगो जाय खिरियो।

“जा खूटल तूं गुड़ै रा रूंख नीं देखेला अर नीं तनै मरिये नै उठै री भोमका(श्मशान) मिलेला”
इतरो कैय लाछां ई जमर री झाल़ा़ं सांपड़ी।

उणी बखत एक चिरल़ाट रै साथै भाखरसिंह उछल़’र पड़ियो। आंख्यां रा कोइया भमग्या। राफां फाटगी। शरीर टैंटीजग्यो।

बात खंचगी। आसै-पासै रा चारण ई भेल़ा हुया। इण राड़ में फतैसिंह भाटी री रक्षार्थ 14चारणां गल़ै कटारी खाय प्राणांत कियो।
इण लड़ाई में फतैसिंह भाटी ई काम आयो।

कविराजा बांकीदासजी आपरी ख्यात में लिखै-
“मोकल़सर रै धणी उदैराज खीमकरण अखैराजोत रै महाराज अभैसिंघजी री आग्या सूं कीटनोद रो धणी भाटी फतैसिंघ अमरावत मारियो गुड़ा रो राणो सूरजमल भाखरसी साहिबखानोत री मदत लेनै।”

ओ चकासो देख’र भाखरसिंह रा मिनख उणनै घोड़ै माथै बांध’र पड़ छूटा जको ‘डाबड़’ कनै जावतां सूरज ऊगो। भाखरसिंह नै कोई होश नीं हो। साथलां उण रा होठ भीजोया। जीभ रै पाणी लागतां ई उणरी जीभ साचाणी बारै आय पड़ी अर खुद ई घोड़ै सूं नीचो पड़’र मर पूरो हुयो-

मागणां सत देख कमध्धज मूरख,
चालण काज तुरी चड़ियो।
थड़ियो हय पीठ थकोय थरथ्थर,
पोर तीजो पथ में पड़ियो।
पड़गी झड़ कंठ जबान प्रभातिय,
प्राण तज्यो गल़ गाय पुगी।
दल़ियो भल सब्बल़ मात देमां दल़,
प्रब्बल़ हाथल़ दैत पुगी।।(देमां रा छंद-भं.म.झि.)

साथै वाल़ां जाय साहिबखांनजी नै पूरी हकीकत बताई। पूरी बात सुणतां उण सुक्षत्रिय कह्यो –
“ऐड़ै नीच रो म्हनै मूंडो मत बताजो। हरामखोर! चारण चूंथ’ र गुड़ै रै गुल़ी (दाग) लगाई। उणनै उठै ई दाग दे दो।”

पण आखिर हा तो बाप अर पछै भाखरसिंह वीर ई हुतो सो राणाजी रै मूंडो सूं निकल़ियो कै-
“अरे भाखरा तूं निकल़ियो तो माड़ नै चींथणनै हो पण हे वीर! तैं चारण चूंथ’र कोई जसजोग काम नीं कियो-

मारण गयो थौ माड़, चारण व्हैतां चूंथिया।
ऐ बातां अवनाड़, भली न की थे भाखरा।।
(साहिबखानजी गुड़ा)

शरणाई खातर आपरा प्राण त्यागण वाल़ी मा देमां आज ई अमर है-

झिणकली राय नावलाख रै झूलरां
दयाल़ी साख रख रल़ी देमां।
(गि.रतनू)

तो कपूत बेटे रो अंतिम वेला मूंडो नीं देखण वाल़ा साहिबखानजी ई लोकरसना माथै अमर रैसी।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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