🌺शिरोमणि दानी सांगो गौड🌺-अजय दान जी लखदान जी रोहडिया (मलावा)

वीरता में ज्यूं राजस्थान, रियौ है आगे प्रान्त अजोड।
त्यूहिं परसिध है जग सौराष्ट्र, शूरवीरों री धर सिरमोड।।१
जिको गांधी भी जलम्यो जेथ, कियो भारत नें जिण आजाद।
कहो किण रे मनडे रे मांय, नहीं है इण धरती री याद।।२
जठे कइ वेगा वीर जवान, मरण लग जिको न तजता माण।
पण्ड पर सह लेता सब पीड, पिरण पर दे देता पण प्राण।।३
कर सकै ज्यारी गिणती कूंण, भर्या जिण रे जस रा इतिहास।
आज लग उण पुरखां री याद, प्रेरणा रो देवे परकास।।४
उणीहिज धरती में हो हेक, गरबिलो राता करने गांम।
पनरवी सदी री आ हे बात, बडी सुखदायक अर अभिराम।।५
जठे हो राजपूत वर एक, जिनें सब कैता सांगो गोड।
गांव  रा बाछडिया गुणवंत, चराया करतो कर कर कोड।।६
अवस्था नहीं अधिक ही तोय, अधिक हो औ बाल़क धीमान्।
आपरा प्रण पाल़ण री रोज, रेवतौ चिंता मांय सुजाण।।७
गरीब घर रो हो तौ भी वोह, बण्यौ हो अपणे कुल़ री पाज।
उथपतौ नह जरणी रा बोल, कदी अर नह वैतो नाराज।।८
द्वारिका दरसण जातां वार, भगत कवि बारठ ईसरदास।
रह्या हा उण रे घर हिक रात, जगत है जिण रो सुजस उजास।।९
और वै उगडतै परभात, विदा होवण लागा जिणवार।
जोड कर की वीणती यूं गोड, कांई हूं कर न सक्यो सतकार।।१०
माफ कर दीजो मारा दोख, कहै सेवकडो वारंवार।
करूंला कंबल थांने भेट, पधारौ रातां फरती वार।।११
ऊन मैं अपणां हाथां कांत, कंबल बणवाई है अणमोल।
अधूरी है पण जिण री कोर, आप ले जाजो आतां कोल।।१२
वचन दे सांगा रो लख हेत, कवि जद आगे बढगौ जाय।
मन ही मन कर उण री तारीफ, मिलण बोलण री रीत सराय।।१३
गया जद कांइक दनडा बीत, एक दिन इसो वियो बरसात।
बह गयो सांगो पांणी साथ, नदी बिच आवतडो अवदात।।१४
डूबते सांगे दीनो साद, साथिडों कैजौ मां ने जाय।
निभाज्यो कीधा म्हारा कोल, कवि नें कंबल़ दीजो आय।।१५
सुण्यो जद माता औ संदेस, कल़पती करती.करूण पुकार।
“लियो हा म्हारौ विधना लूंट, सहारो जीवनरो संसार।।१६
कुटुंब में रह्यो न कोई जीव, अभागण रहगी हूं अब एक।
दैव !दुर्बल घातक धिक तोय, दया नँह थारै दिलडै नेक।।१७
डोकरी कुरजल ज्यूं कुरल़ाय, दूबल़ी व्हैगी दीन मलीन।
कमल़ ज्यूं बिनां रवि कुमल़ाय, बिना जल़ ज्यूं व्है आकल़ मीन।।१८
मास हिक व्हैतां पाछै फेर, द्वारका सूं घर आती वार।
मिलण री लेनै मन में मौज, बारहठ आयौ सांगा द्वार।।१९
पुकार्यो उण फिर हेलो पाड, घरै है या नी ठाकर गौड।
सुणंतां ओ श्रवणें आवाज, आ गई मांजी बारै दौड।।२०
देखतां ही व्हैगी पैचांण, वियो मनडा में मोद अपार।
जोवती ही हूं जिण री वाट, वटाऊ वो घर मिल़गो आर।।२१
“कठै गो थां कुल़दीपक आज, अठै नी दीसै वीर उदार।
कह्यो वा “आप करौ आराम, गयो है गीगो बार अबार”।।२२
करूंला जो हूं साची बात, करैला भोजन अतिथि नाय।
आहि हिरदा में अपणे सोच, विधुरा कहदी बात बणाय।।२३
रसोडा में उण तो झट जाय, बणाया व्यंजन विविध प्रकार।
आप रो दुख अंतर में दाब, आय फिर यूं बोली वा नार।।२४
“आप लो अब खाणौ आरोग, होयगी है जिमण री वार।”
“खाऊंला खाणो सांगा साथ” बारहठ यूं बोल्यो उणवार।।२५
कह्यो जद तीजी वार पुकार, दियो पण कवि नें उत्तर सोय।
“रह्यो नँह सांगो तो संसार”, दुख्यारी यूं कह दीन्यो रोय।।२६
दियो फिर सारौ हाल सुणाय, उणैं तो अपणें मुख सूं भाख।
शोक उर सागर उमड्यो आय, निसासा रोवै विधवा नांख।।२७
“आप रे दरसण री दिन रात, अधिक ही उणनें तो अवलेख।
हियै री रैगी हिव रे मांय, लिख्या इसडा ही विधणा लेख”।।२८
रोवती इण विध अबल़ा देख, कवि पण करूणा सागर मांय।
गिरातौ आँसूडां री धार, ग्यान सह भूलो गोता खाय।।२९
फेर कर परमेसर रो ध्यांन, एकदम वौ बोल्यौ यूं ऊठ।
“न डूबै सांगो जल़ रै मांय, आप नँह बोलो मुख सूं झूठ।।३०
करो क्यूं बिरथा करूणा लाय, थनें हूं सांची देऊं सुणाय।
कर गयो मारा सूं वा कोल, कियां विण पूरण कीकर जाय”।।३१
“जठै व्है जल़ थल़ नभ में गोड, सुणंतां ईसर री आवाज।
वेग आ वचन निभावण वीर, बुलावूं कंबल बगसण काज”।।३२
“कवि नें कंबल़ देवण वेल़, गयौ कां सांगा थूं संताय।
बेग आ वाछडियों रा वारु, गाय विण वाछडियां रंभाय”।।३३
“अधूरा सतपुरूषों रा कोल, कदी नँह रैता जग रै मांय।
बिलम जो करसी थूं इण वार, कहेला दुनिया थांनै कांय”।।३४
सांगलो वाछडियों रै संग, आयगो प्यारो उण ही वार।
कवि नें कीनी कंबल भेट, वियो अचरज सबनें जिंह वार।।३५
विचारो श्रोतागण!आ बात, बचन हिण वणों न कोई वीर।
बीरों ही विसवंभर दे साथ, वचन जो पाल़े निज नरवीर।।३६
अमर कर दियो कंबल़ी हेक, हुवै नँह किण सूं जिण री होड।
इल़ा पर इण सूं ही कहलाय, सिरोमणि दानी सांगो गोड।।३७

~~अजय दान जी लखदान जी रोहडिया मलावा कृत
(५०- ६० के दशक में उस जमानें मैं आकाशवाणी जोधपुर काव्य-पाठ के दौरान पढी कविता)

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