🌹शक्रादय स्तुति का भावानुवाद🌹

( मेहाई सतसई – अनुक्रमणिका )

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स्तुति शक्रादय री सरस, कविता कीरत राज।
मांड रह्यो सुण मावडी, मेहाई महराज।।५५२
अरिकुलभयदा अंबिका, क्रोधित नयणां मां ज।
जया रूप जोगण जबर, मेहाई महराज।।५५३
काळी कांठळ सम कहूं, सिर अध ससि जिण साज।
जया रूप माता जयो, मेहाई महराज।।५५४
कर मँह शंख कृपाण जिण, चक्र त्रशूळां साज।
जया रूप जोगण जबर, मेहाई महराज।।५५५
तूं भव तारण त्रंबका, सिंह सवारी साज।
तेजोमय तिहूलोक किय, मेहाई महराज।।५५६
महिखासुर मां मारियो, सह दळ बळ जद राज।
कियो इन्द्र सुर सह तवन, मेहाई महराज।।५५७
हरख विकम्पित हिव हुओ, सरवस देव समाज।
कियो तवन नत माथ सब, मेहाई महराज।।५५८
सकल देव गण री सगत, व्यापक वसुधा मांझ।
सुर मुनि वंदित अंबिका, मेहाई महराज।।५५९
नमन मात नारायणी, वड देवी वसुधा ज।
कल्यांणी तौ भगति जुत, मेहाई महराज।।५६०
बळ प्राक्रम बाखाणवा, शिव शेस’र ब्रह्माज।
समरथ नहँ ;वह मां स्वयं, मेहाई महराज।।५६१
पाळक पोखक पुहमि री, ध्वंसक अशुभ धरा ज।
चंडी चावी चारणी, मेहाई महराज।।५६२
पुनशाली घर बण शिवा, लखमी रहती राज।
वड अनपूरण बिरवडा, मेहाई महराज।।५६३
पापी रे घर प्रगटणी, रूप दाळदर राज!।
कुळ उणरो खयकारणी, मेहाई महराज।।५६४
अंतस जिण अणदाग सुध, बसि उण बुध्धि विराज।
कविता कल कल नादिनी, मेहाई महराज।।५६५
सतपुरूखां मन तूं श्रधा, लखी कुलीन लजा ज।
पाळक दुरगा पुहमि री, मेहाई महराज।।५६६
चंडीरूप -अचिंत तव, रिधु पराक्रम राज।
कव वरणन किम कर कथे, मेहाई महराज?।।५६७
आसुर हणिया अंबिका, गजब प्रवाडा ता ज।
जंग जबर लडणी जयो, मेहाई महराज।।५६८
उतपति कारण अवनि री, रज, सत, तम मैं राज!।
तो पण मां निरलेप तूं, मेहाई महराज।।५६९
थाह नहीं थारी लही, विस्नु, अज, शिवराज।
जगदाश्रय वड जोगणी, मेहाई महराज।।५७०
जगत-अंस तव जोगणी, परा प्रकृति राज।
आदि भूत अव्याकृता, मेहाई महराज।।५७१
स्वाहा ध्वनि सब हवन री, मंत्र नाद तूं मां ज।
सुरगण सब संतृप्तणी, “मेहाई महराज”।।५७२
तृप्ति पितर कारण परम, सब जन वदै “स्वधा” ज।
जगन फल प्रदा जोगणी, मेहाई महराज।।५७३
रटता रहता रैण दिन, जिण मन मुनिवरां ज।
महाव्रता मां मोक्षदा, “मेहाई महराज”।।५७४
दोख रहित, इन्द्रीयजित, मोख हेतु मुनिराज।
तत्वसार मां नें रटै, मेहाई महराज।।५७५
सकळ सबदमय तूं सगत, रसमय ॠगवेदां ज।
यजुरवेद रूपां नमन, मेहाई महराज।।५७६
मंजुल उद्गीथ मावडी, सामवेद सुर साज।
सरस राग संगीत लय, मेहाई महराज।।५७७
वेदत्रयी विश्वंभरी, ऐश्वर्याखट आ ज।
भवा, भवानी, भय हरा, मेहाई महराज।।५७८
जग री पालक जोगणी, कृसि रूप मां राज!।
निखिल पीड री नाशिनी, मेहाई महराज।।५७९
सकल सास्तर सार सम, मात रूप मेधा ज।
भव जळ तारण मां भवा, मेहाई महराज।।५८०
कैटभअरिकेसव ह्रदय, बण श्री रही बिराज।
निरासक्त नारायणी, मेहाई महराज।।५८१
चंद्रमौलि री चातुरी, सगती आप शिवा ज।
सरलमनां सुखरूप शुभ, मेहाई महराज।।५८२
मंदहास मुख पूर्ण ससि, हेम कांति वपु राज।
किम पण महिखे कोप किय, मेहाई महराज।।५८३
कियां वार थां पर करण, री सोची उण राज!।
अचरज हिव सब आज लग, मेहाई महराज।।५८४
देखै खल देसाणपत, जिम ससि नभ आभा ज।
भृकुटि ताण विकराळ ह्वी, मेहाई महराज।।५८५
क्रोधित जम जिम अंबिका, क्रूर नजर रिधु राज।
खल हणबा किनियाण किय, मेहाई महराज।।५८६
महिखासुर मरियौ न मां, तुरत कियां रिधुराज?।
वडो अचंभौ सब मनां, मेहाई महराज।।५८७
परमतत्व !रूपाप्रसन!, अभ्युदय-जग राज!।
क्रोध कियां कुळ कोटि खय, मेहाई महराज।।५८८
रोळी महिखासुर तणी, सेना दळ बळ राज।
मानी तद मैं मावडी, मेहाई महराज।।५८९
देस बिदेसां मैं तथा, सूंपै मान समाज।
देवी तूठां देत सब, मेहाई महराज।।५९०
तूठी जिण रे तूं सदा, जस वैभव उण रा ज।
सरस जगत मँह वह सुखी, मेहाई महराज।।५९१
धरम शिथिल नँह उण धणी, रीझै जिण पर राज।
कुशळ रखै सुत दार कुळ, मेहाई महराज।।५९२
कृपा करै किनियांण जद, सद करमी व्है वा ज।
त्रिभुवन वांछित फल प्रदा, मेहाई महराज।।५९३
सुरग जाय संसार वह, रटत रटत रिधु राज!।
देवी वड देशाणपत, मेहाई महराज।।५९४
दुःख भय हरे दरिद्रता, थां बिन कुण मम आज।
सरव जनां सुखकारणी, मेहाई महराज।।५९५
नाम लियां निरभय करै, चिंतन बुधिदा मां ज।
भयहारी मनभावनी, मेहाई महराज।।५९६
राखस हणिया मां रिधू, पापी सब जग रा ज।
जन जन नें कीधा सुखी, मेहाई महराज।।५९७
वध कीधा वसुधा तणां, राखस सब रिधु राज।
सुरग भेजबा सोच मन, मेहाई महराज।।५९८
दरस परस सूं कर भसम, खल विण सस्तर साज।
सरल मनां सुणजै सगत, मेहाई महराज।।५९९
आयुध सूं निज अंबिका, मार राखसां मां ज।
करण मोख उण रो चहै, मेहाई महराज।।६००
खाग आग तरशूळ लख, चख नँह फटी खलां ज।
व्है मुख ससि देखत रह्या, मेहाई महराज।।६०१
चरित आप रो चारणी, मन सुध करे खलां ज।
रूप अचिंतन अतुल तव, मेहाई महराज।।६०२
जिण सुर घणा डराविया, दहित तणा दळ राज।
बळ प्राक्रम सूं बाळती, मेहाई महराज।।६०३
परवाडा अणपार तव, वरदायी वड मां ज।
होड न जिण री हुय सके, मेहाई महराज।।६०४
सदा डरावै सत्रवां, रूप मनोहर मां ज।
गरल मना हिव री सरल, मेहाई महराज।।६०५
सदा डराणी सत्रवां, रूप अनुपम राज।
गरल मना हिव री सरल, मेहाई महराज।।६०६
सदा डारणी सत्रवां, रूप अनुपम राज।
देवी धर देशाणपत, मेहाई महराज।।६०७
सरल ह्रदय नित सज्जणां, गरल रूप खल आ ज।
विख अमरत भेळा रखै, मेहाई महराज।।६०८
तें राखण तिहुलोक मां, रोळ्या राखस राज।
भय भव हारी भैरवी, मेहाई महराज।।६०९
देवी हणिया दाणवां, सुरग भेजिया वा ज।
नमन नमन देशाणपत, मेहाई महराज।।६१०
खडग शूळ खड खड बजै, घंट घुनि घण गाज।
राख धनुस टंकार कर, मेहाई महराज।।६११
पूरब, दक्खण, पिछम वळ, उत्तर सकळ दिसा ज।
वाह सूळ भय भांगजे, मेहाई महराज।।६१२
रूप भयंकर सौम्य रह, विचरत वपु वसुधा ज।
रिछपाळक रहती रिधू, मेहाई महराज।।६१३
करपल्लव किरमाळ अर, शूळ गदादिक साज।
रक्ष रक्ष माता रिधू, मेहाई महराज।।६१४
पुहप गंध चंदण सहित, वंदन कर वरदा ज।
ऋखिवर जय जय जय किया, मेहाई महराज।।६१५
“मांग मांग” मुख सूं कह्यो, आणंद वदन उमा ज।
देवी दुरगा रूपिणी, मेहाई महराज।।६१६
देव मुळक सब बोलिया, सगती रूप शिवा ज।
म्होंरै मन किं पण नहीं, मेहाई महराज।।६१७
महिखासुर नें मारियो, जोगण जांगळ राज।
परसन रहियो प्रेम सूं, मेहाई महराज।।६१८
तवन करंता सगत तव, दरसन दीजो म्हां ज।
घणी खमा देशाणपत, मेहाई महराज।।६१९
सुत दारा परिवार सुभ, दीजो वित धन वाज।
तवन करै उणनें सदा, मेहाई महराज।।६२०
ऋखिवर मुख सूं यूं कह्यो, सुणजो राजन राज!।
वदे “तथास्तु” अलोप ह्वी, मेहाई महराज।।६२१

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