सिध्धकुंजिकास्तोत्रम् का भावानुवाद

( मेहाई सतसई – अनुक्रमणिका )

सिध्धकुंजिका सांतरी, करण सकळ शुभ काज।
गुरुचाबी गढवी तणी, मेहाई महराज।।२७२
चँडी जाप है चारणी, तारण भव जळ मां ज।
अवल नाम आणँद घण, मेहाई महराज।।२७३
कवच अरगला कीलकां, रो सब है मां राज।
रिधू राज राजेस्वरी, मेहाई महराज।।२७४
सुकत ध्यान अर न्यास सब, अरचन वंदन आ ज।
सरस नाम सुखरूप है, मेहाई महराज।।२७५
कथन नाम किनियांण रो, पाठ फळै दुरगा ज।
जपौ निरंतर जोगणी, मेहाई महराज।।२७६
मारण वश अर मोहनं, सब रा साचा राज।
डणकंती डाढाळ है, मेहाई महराज।।२७७
थंभण उच्चाटन तुही, रहस सकळ रिधू राज।
किनियाणी करुणाकरा, मेहाई महराज।।२७८
नमन नमन रुद्रांण नें, मधु मारण थूं मां ज।
अभयंकर अखिलेश्वरी, मेहाई महराज।।२७९
खल कैटभ खप्पर भखा, मारण मां महिखा ज।
आई आनंदा उमा, मेहाई महराज।।२८०
हणणी सुंभ निसुंभ खल, जागत जोगण मां ज।
मुंडमालिनी काळिका, मेहाई महराज।।२८१
ऐं ह्रीं क्लीं मंत्रात्मिका, अवनि पालिका आ ज।
काम रुपिणी कामदा, मेहाई महराज।।२८२
बीज रूप बीजांकुरी, नमन नमन माता ज।
सरजक, पाळक, सोखणी, मेहाई महराज।।२८३
चामुँड घाती चंड री, ऐंकारी वरदा ज।
अभयप्रदा विच्चै उमा, मेहाई महराज।।२८४
मंत्र रूपिणी मावडी, जंत्र रूप पण मां ज।
तंत्र रूप तूं त्रंबका, मेहाई महराज।।२८५
धां धीं धूं धूर्जटसखी, सगती रूप शिवा ज।
धरा ध्रुजाणं धावडी, मेहाई महराज।।२८६
वां वीं वूं वागीस्वरी, बीण वादिनी वा ज।
कविता री कमनीयता, मेहाई महराज।।२८७
क्रां क्रीं क्रूं तूं काळिका, रूढाशवा शिवा ज।
अवर नहीं अब कह सकूं, मेहाई महराज।।२८८
शां शीं शूं शुभ कारिणी, सारा सारै काज।
चारण री चिंतामणी, मेहाई महराज।।२८९
हूं हूं हूं हुंकारणी, तूं ही है त्रिपुरा ज।
जं जं जं जंभ् नादिनी, मेहाई महराज।।२९०
भ्रां भ्रीं भ्रूं तूं भद्रका, भैरवि रूप भवा ज।
भव भय भंजण भगवती, मेहाई महराज।।२९१
अं थूं अंबा रूप है, कं रूपा करुणा ज।
चं टं है थूं चंडिका, मेहाई महराज।।२९२
तं रूपा तूं तंत्र है, पं परिपूरण मां ज।
यं रूपा यशदायिनी, मेहाई महराज।।२९३
शं रूपा मां साम्भवी, विं सूं दस विद्या ज।
दुं रूपा दुरगा सदा, मेहाई महराज।।२९४
ऐं ऐश्वर्य अपावणी, वीं वरदाई मां ज।
हं रूपा हंसासनी, मेहाई महराज।।२९५
खं रूपा खयकारिणी, धिजाग्रणी वड धा ज।
तोड तोड मन तिमिर हर, मेहाई महराज।।२९६
सरळ ह्रदय री स्वामिनी, गरल रूप खल गाज।
मन रा कलिमल मेटणी, मेहाई महराज।।२९७
मन रा सब संसय मिटै, दिल जगमग दिवला ज।
अंतस आलोकित इहग, मेहाई महराज।।३९८
पां पीं पूं तूं पार्वती, पियूख वर्षिणी मां ज।
हरपुळ बरसै हेत कर, मेहाई महराज।।२९९
खां खीं खूं थूं खेचरी, रहो अगोचर राज।
काज भगत करता रहो, मेहाई महराज।।३००
सां सीं सूं सिध सुरसती, रटत नाम रिधु राज।
मंत्र सिध्ध म्हारा हुवै, मेहाई महराज।।३०१
टूमण कामण टोटका, मंत्र तंत्र सब मां ज।
वड थड म्हारै बीसहथ, मेहाई महराज।।३०२
नमो तंत्र नारायणी, मंत्र रूप पण मां ज।
यंत्र रूप आरासुरी, मेहाई महराज।।३०३

~~नरपत “वैतालिक” कृत मेहाई सतसई से

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