सिंझ्या वेळा री माताजी री स्तुति – कवि देवीदानजी खिडीया धामाय कच्छ

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॥दोहा॥
शीश मुकुट सोहत सदा, मुगता री गळमाल।
शुभ मति मों देवो सदा, देवी गिरा दयाल॥1॥

॥सवैया॥
संकट बेर जबे हियमै धरी, सेवत तोहि सदा सुर बाला।
मंद मति नर ओट ग्रहे तव, पंडित होत वही ततकाला।
बीन बजावन मोह नशावन पावन पिंड सुनो विधि बाला।
“देव” कवि शिर तौ पद नावत होहु सहाई मौ काव्य कृपाला॥1॥

संध्या समय देवी स्तुति:
सेवक साद संकट समय, बुडत करत पुकार।
सुनत साद आशापुरा, अवस उतारत पार॥1॥
जूड सलिल मंह जब ग्रस्यो, काट्यो दीन दयाल।
अवस त्योहिं जगदंबिका, जन काटत जंजाल॥2॥
सदा श्रेष्ठ संध्या समय, दरसे सुंदर दीप।
अगरु पुष्प धूपादि की, शोभा मात समीप॥3॥

॥छंद: मोतीदाम॥
बजे वर मंदिर मैं डफ डाक।
हुवे तित धूपन की धमछाक।
झनंकत झांझ मृदंग बजंत।
घणारव मंदिर घंट बजंत॥1॥
गजे घन आरतीकी घनघोर।
बजै बहु जोरसौ नौबत शोर।
जुरै तित जोगिनी जुथ्थ हजार।
रचे वर मंडल रास अपार॥2॥
करे मिल कालीय केकिलकार।
ठनंकत घुंघर की ठनकार।
चलाचल चंडीय जुथ्थ उछाह।
सजै शिणगार सबै शुभ चाह॥3॥
विधिविध घेरिय फेरिय बाल।
तडातड देवत ताल उताल।
लट्टकत झालर लाल ललाट।
जटे बहुरंगसूं नंग जगाट॥4॥
कथां कण कुंडल की छवि कान।
भलागिरि शृंग समीप दुभान।
लळक्कत हार ललितह लाल।
लसे ढिग जोतिय गोतिय माल॥5॥
छटा छवि छाजत श्री भुजबंध।
मनो जयकार त्रिलोक सनंध।
चळक्कत चूडीय चारु भुजान।
मनो रवि दोय प्रभा असमान॥6॥
रचे इण रीतसुं देविय रास।
कबै मृतलोक कबै किवळास।
वपु विकराळ वडावड कंध।
महामदमत्त महीष मदंध॥7॥
लियां वड खप्पर हाथ त्रशूळ।
वधे वड दाणव दैत समूळ।
धधक्क धधक्कत शोणित धार।
रचे रण यज्ञ करे किलकार॥8॥
कबे चढ केहरि ले करवाळ।
करं धज धार त्रिशूळ कराळ।
दमंकत दामणि की दुति हार।
चढे सुर काज वीशांभुज वार॥9॥
शकत्तिय कोप करे असुरांण।
कचक्कत कोल हटे हदमांण।
सुरां दुःख टारण कारण धीर।
विडारण दैत वडां भडवीर॥10॥
बचाय सु बाष्कल दास बिशेख।
हटाय महीख रखी जग टेक।
थंभ्यो रथ भांण तणो नभ राह।
कळा तुव देखण काज अथाह॥11॥
दाखे तुव दास जु देवीयदान।
देवांरीय देव दया दधि जांण।
जपे तव नाम निरंतर जाप।
मिटे जग किंकर के भव पाप॥12॥

॥छप्पय॥
कोउ गहत आधार, जबर जागीर हजारी।
कोउ गहत आधार, मंत्री कर तंत्र हजारी।
कोउ गहत आधार, महद महिपत मदमानी।
कोउ गहत आधार, शाह वसुवंत पिछानी।
कवि अवर देव आधार जग, सिंधु बिच लघु नाव है।
आनंद कंद जगदंब को, अचल एक आधार है।

~~कवि देवीदानजी खिडीया धामाय कच्छ
(प्रेषक: नरहरदानजी बाटी)

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