सोढै ऊमरकोट रै, सिर पड़ियां बाहीह !

किणी राजस्थानी कवि रो ओ दूहो कितरो सतोलो है कै-

हीरा नह निपजै अठै, नह मोती निपजंत।
सिर पड़ियां खग सामणा, इण धरती उपजंत।।

आजरै संदर्भ में ओ दूहो भलांई केवल एक गर्विली उक्ति लागती हुसी जिणरै माध्यम सूं कवि आपरी मातृभूमि री अंजसजोग बडाई करी है पण जिण कवियां इण भावां रै मार्फत परवर्ती पीढी नै प्रेरणा दी है तो कोई न कोई तो कारण रह्यो ई हुसी। सूर्यमल्लजी मीसण लिखै–

बिन माथै बाढै दल़ां, पोढै करज उतार।
तिण सूरां रो नाम ले, भड़ बांधै तरवार।।

तिण सूरां रो नाम ले अर्थात उण सूरमावां रै नाम में वीरता रा भाव संचरित हुवता हुसी। स्वतःस्फूर्त प्रेरणा उत्पन्न हुवती हुसी जणै ई तो कवि उण सूरां नै पैला चितारै। जद आपां अठै रै मध्यकाल़ीन इतियास री गर्विली गाथावां सुणां तो एक नीं एक सूं बधर एक उण वीरां रा नाम सुणण नै मिलै जिणां माथो पड़ियां तरवार चलाय इण राजस्थान रो माथो ऊंचो राखियो।

महराज राठौड़, महिराम राठौड़, पन्नराज भाटी, खेमाल़ भाटी, कल्ला रायमलोत, सलो(कुशलजी) रतनू, रुघनाथ बारठ, जोधा हठीदास जोगावत आद आद। इणी वीरां री कड़ी में एक बात सुणी जेगल़ा(बीकानेर) रै भाटियां री।

दिल्ली रै इस्लामिक दरबार में आ बात चाली कै राजपूत माथो कटियां जूझतो रैवै। जणै किणी कह्यो कै- “अठै राजपूत घणा ई बैठा है तुमार करलो।” सेवट बात बीकानेर रै डेरे पूगी। उठै एक गोगली राजपूत अर उणरै साथै उणरो पंद्रह-सोल़ै साल रो भतीजो ई भेल़ो। आ बात सुण’र उण गोगली कह्यो कै- “इणमें इजरज री कांई बात है? राजपूत है ! जणै तो आ बात उणरी मा रै दूध साथै उणरी तासीर में आई हैअर सिधश्री में ई खोट है जणै वो माथो बढियां कीकर लड़ैला? ओ म्हारै साथै टाबरियो है नीं! ओ ई माथो कटियां लड़ सकै।”

लोगां कह्यो कै थांरै इण भतीज नै त्यारी करावो। दरबार में उण किशोर रो माथो बाढ’र कौतुक देखण री त्यारी हुई तो अठीनै उण काकै ई आपरो माथो आ सोच’र बाढ लियो कै कांई ठाह भतीजो टाबर है! बिनां माथै लड़ीजै कै नीं लड़ीजै!!

दोनां वीरां त्राहि त्राहि मचादी। सेवट उण सूरां रो शरीर शांत हुयो। बीकानेर दरबार जेगल़ा रो पट्टो उण भाटियां रै नाम कर दियो। उण बखत किणी चारण कवेसर कह्यो–

सिर पड़ियां सूरा लड़ै, कायर आवै काम।
जुगां न जावै जेगल़ो, गोगलियां नै गांम।।

जद अहमदाबाद माथै जोधपुर महाराजा अभयसिंहजी गया। उणां री फौज में जोधै हठीदास जोगावत (खैरवा) ई इण लड़ाई में अदम्य साहस बताय’र वीरगत वरी। प्रत्यक्षदर्शी महाकवि वीरभाण रतनू, कविश्रेष्ठ बखताजी खिड़िया आद गौरव रै साथै लिखियो कै हठीदास माथो बढियां ई जूझतो रह्यो। जे वै किणी लोभ कै लालच में लिखता तो किणी बीजै मोटै सिरदार कै राजा रो लिख सकता पण नीं। उणां उणी रो ईज लिखियो जिको साचाणी बिनां माथै लड़ियो। वीरभाणजी ‘राजरूपक’ में लिखै-

जोधै हठमल जेम, करै कुण नेम करग्गै।
सिर पड़ियौ साझियौ, खैफ मिल़ हैफ खड़ग्गै।

आ ई बात उठै मौजूद बगताजी खिड़िया लिखै–

ग्रहे रूक लागियो, धणी वासतै धिगारां।
सिर तूटा समसेर, हठी देखियो हजारां।।

गोगल़ी भाटियां रै दांई ईज एक बात ऊमरकोट रै सोढै वीरम री सुणी। मध्यकाल़ री बात है। एक’र मुगल दरबार में बात चाली कै रजवट रा रुखाल़ा राजपूत रणांगण में सिर कटियां ई तरवार बावता रैवै। आ बात आज सुणण वाल़ै नै अवस अपरोगी लागती हुसी पण इतियास अर किंवदंतियां में ऐड़ा आख्यान भरिया पड़िया है। उणां मांय सूं ई एक किंवदंती है ऊमरकोट रै सोढै वीरम री बिनां माथै तरवार बावण री। हालांकि लोक में उण सोढे रो नाम कल्याणसिंह मिलै पण सोढां रै रावजी मुजब उण सोढै रो नाम वीरम हो। वीरम सोढो ऊमरकोट रै किणी राणै ऱो छोटो भाई हुयो हुसी। अमल रो मोटो बंधाणी। काम फगत ओ कै आमद रो हिंसाब राखणो अर पूछणो। नित रो सेर मावो। कई दिन तो धाको धिकियो पण एक दिन खंचाची राणैजी नैं कह्यो कै आपरो भाई राज नैं मोटो घाटो है। कमावै कीं नीं अर खावै नितरो सेर अमल। राणै, आपरै भाई नैं हाथ जोड़ दिया। वीरम(कल्याणसिंह) ऊमरकोट छोड दियो। कई रजवाड़ां में घूमियो पण घणा दिन कठै ई पार नीं पड़ी। घूमतो-घूमतो दिल्ली पूगियो। दिल्ली में उण दिनां पचास वाघेलै राजपूत रा घर। इणां रो सिरदार वाघो वाघेलो। उणनैं ठाह पड़ियो कै एक ऊमरकोट रो सोढो वीरम(कल्याणसिंह) अमल रै घाटै मारियो ठेठ धाट सूं दिल्ली आयग्यो, पण इतै मोटै बंधाणी नैं आपरै गल़ै कुण घातै!उण आपरै भाईयां नैं भेल़ा किया अर पूछियो कै

“थे हां भरो तो एक जोगै राजपूत नैं राखूं? पण वो अमल रो मोटो बंधाणी! थित रो सेर मावो! थे सगल़ा बारी-बारी सूं एक दिन रो खर्च पूरण री हां भरो तो हूं इणनैं राखूं?”

भाईयां कह्यो- “ऐड़ो कांई है उणमें ? क्यूं हाथी बांधो। धणियां व्हाला हुवै वै चोरां व्हाला हुवै। भाइयां रै अणमायो हुयो तो आपां जैड़ै घरधणियां सूं कीकर पार पड़सी?”

वाघो जोगतो राजपूत हो। उण कह्यो- “जिणरो सेर मावो है उणरी ताकत रो अंदाजो है! कणै ई मोकै माथै शान राखै जैड़ो राजपूत है। राखलो ! आपांनैं ऐड़ो अजरेल आदमी चाहीजै जिको अबखी पड़ियां आपरी आण राखसी।”

वीरम(कल्याणसिंह), वाघेलां रै रह्यो।

जोग सूं एक दिन मुगल दरबार में आ बात चाली कै मुसलमानां सूं हिंदू सिरै! ऐ माथो कटियां ई हेठा नीं पड़ै अपितु खाग बजावता रैवै अर उण जोधै री जोड़ायत उणरी वीरगति पछै उणरै साथै काठ चढै। बात बंतल़ सूं वाद में पड़गी। आखिर तय हुयो कै बीड़ो फेरियो जावै कै आज ई ऐड़ो कोई हिंदू है कांई? जिको सिर पड़ियां जूझै अर जोड़ायत सत करै। बीड़ो किणी नीं झालियो। फिरतो-फिरतो वाघेलां रै वास आयो पण वाघेलां सूं ई हिम्मत नीं हुई। उणां ई हाथ पाधरा कर दिया। वाघै वाघेलै कह्यो कै म्हां सूं पार नीं पड़ै। उठै बैठै वीरम (कल्याणसिंह) हाथ मसल़ निसासो भरियो। उणनै निसासो भरतां देख, वाघै पूछियो कै “सोढा राण कांई दुख? सो निसासो भरो!” सोढै कह्यो-“ठाकरां बीड़ो राजपूतां रै अठै सूं पाछो जावै ! अर सेर सूत बांधणिया आपां अजै जीवतां हां आ देख’र निसासो भरियो है हुकम!” “भुजां माथै इतो भरोसो है तो झालो क्यूं नीं बीड़ो!” वाघै कह्यो तो सोढै पाछो कह्यो कै- “बीड़ो झालणो तो म्हारै आंख वाल़ो फूस है हुकम! पण कंवारो हूं सो लारै सत कुण करै?” ऐ बातां वाघै री बेटी जिणरी ऊमर फगत 13-14 वर्ष ही, सुणै ही उण आपरी डावड़ी नैं मेल बाप नै कैवायो कै- “म्हारो हाथ सोढै रै हाथ में दिरावो जे सोढो बीड़ो झालै तो हूं लारै काठ चढूंली।” वाघै आपरी बेटी साठ साल रै सोढै नैं परणाय दी। एक दिन सोढो रंग रल़ी में रीझियो रह्यो पण दूजै दिन वाघेली कह्यो “हुकम बीड़ो झालियो उणरी त्यारी करावो। सास रो कोई विश्वास नीं। सास वटाऊ पावणो, आवण होय न होय। तो कुण जूझसी अर कुण काठ चढसी? सो आज करै सो अब्ब।”

सोढो वाघेलां रै साथै मुगल दरबार में पूगियो। सोढो रै मुकाबलो एकै साथै पचास इक्कां सूं हुयो। तरवारां री चौकड़ी पड़ी। घणां रा घणां वार। जोग सूं सोढै रो सिर कटियो। सिर कटतां ई देह चौगणै बेग सूं अरियां रो घाण करण लागी। च्यारां कानी हैकंप मचग्यो। सेवट किणीगत देह शांत हुई। लारै राजपूताणी आपरो वचन पूरो कियो। सोढै वीरम(कल्याणसिंह) री अदम्य वीरता रो ओ दूहो आज ई साखीधर है-

सोढै ऊमरकोट रै, सिर कटियां वाहीह।
जांणै आध वंटावियो, भिड़ दोनूं भाईह।।

सोढै ऊमरकोट रै, यों बाही अवयट्ट।
जांणै बेहूं भाइयां, आथ करी बे वट्ट।।
ऊमरकोट रै सोढै सिर कटियां पछै तरवार बाही जिणसूं अरियां री देहां बीचै सूं इणगत कटी जाणै दो भाईयां आपरो आधो-आधो बंट कियो हुवै।।

इणी सारू कवियां लिखियो है–

सोढा ऊमरकोट रा, सिर कटियां समसेर।
वाहै हणियां वैरहर, वांका भारथ वेर।।

शक्तिदानजी लाल़स (ढाढरवाल़ा)लिखै-

“वीरमे बिना सिर सांग वाई।”

तो किणी दूजै कवि ई इण घटना री साख भरतां लिखियो है-

वाह वाह कर बोलियो, धड़ हुंते सजाई,
सोढै ऊमरकोट रै, सिर तूटै वाई।
जिनके आद वड़ाई, लड़ते दोनों भाई,
हिंदू अब नहीं रक्खणा, कोई सिपाई।।

इण किंवदंती रै आधार माथै आधुनिक डिंगल़ कवि सुखदानजी मूल़ा(सींथल़) ई कीं दूहा लिखिया। सोढै री वरेण्य वीरता विषयक इणां लिखियो-

देखै देवी देवता, सिव सनकादिक सत्थ।
सोढै रो झगड़ो सुण्यो, रवि ठांभियो रत्थ।।

वाघैली रै साहस, सत अर कर्तव्यबोध नैं इंगित करतां ऐ लिखै-

परसंग रु बातां पड़ी, कड़ी वाघैली कान।
सोढै संग चंवरी चड़ी, अड़ी, घड़ी, खड़ी आन।।
सोढै रै संग में खड़ी, जुद्ध घड़ी जड़ी जान।
प्रीतम रै पासै लड़ी, मरण घड़ी बडी मान।।

भलांई ऐतिहासिक ग्रंथां में आ बात पढण में नीं आई हुसी पण मौखिक बात परंपरा में आ बात घणी चावी है।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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