सूरजदेव स्तुति

।।दूहा।।
किरणांपत थारी कल़ा, अवनी दिपै अनंत।
भल़हल़ ऊगै भोर रो, सुजस जपै घण संत।।

अन्न पाणी वायु अनल़, सत आ माटी सेव।
आंरै ऊपर एक तूं, दीपै सूरजदेव।।

की बीजां कीरत कथूं, दिल ना आवै दाय।
साचै सूरजदेव री, भाखूं कीरत भाय।।

दरस दिनंकर दुरस दिल, दुनी करै बिन देर।
ऊगां तो अवनी उमंग, हरस दिसा हर हेर।।

करुणाकर थारी किरण, परस मिटै सब पाप।
कारण इण ही मूढ कव, जपियो कायब जाप।।

।।छंद – मुकंदडंबरी।।
परभात री जोत दिपै परभाकर,
नित्य नवीन करै किरणां।
उतसाह उमंग सुचंग भरै उर,
तारण नाथ सदा तरुणा।
जगचक्ख अहो जगनायक जोगिय,
काज धरा करणो करुणा।
सुण गीध सलाम सदामद सूरज,
नाम ललाम रटो निरणा।।1

अखिये इल देव असंखन आरज,
एक न जोड़ दिपै इणरी।
जिणरी नहीं होड दुवो भुइ जोपत,
तीख सजै सत वो तिणरी।
जणणी किणरी जणियोज नकूं जग,
काछबनंद तुलै करणा।
सुण गीध सलाम सदामद सूरज,
नाम ललाम रटो निरणा।।2

सब देव सिरोमण दीपत सांप्रत,
ओपत भास अकाश अहो।
धिन दीसत नाथ दिनंकर धीरत,
कीरत ऊजल़ एक कहो।
वसु वीरत बात वल़ोवल़ बांचत,
टेक निजूं नित नीं टरणा।
सुण गीध सलाम सदामद सूरज,
नाम ललाम रटो निरणा।।3

मिटियो अँधियार भगी रजनी मुड़,
ऊजल़ वेस कियो अवनी।
सब आगल़ ऊठ सदन्न सजावण,
स्वच्छ करै धुन सूं सजनी।
सुज चेतन गेह सनेह सभागण,
काज सकोडड़ ऐ करणा।
सुण गीध सलाम सदामद सूरज,
नाम ललाम रटो निरणा।।4

महि मोर कल़ाव करै मन मुद्दित,
भोर सजोर डगां भरणा।
विकसै वनराय सुगंधक वारिय,
भंमर रीझ मथै भणणा।
झणणा झणकार बजै मढ झालर,
संत अनंतन ले सरणा।
सुण गीध सलाम सदामद सूरज,
नाम ललाम रटो निरणा।।5

तर वास तजै घर आश लियां तण,
जास उडै पँखधार जदै।
चहकै भर चांच करै चरचा हर,
केल़ समेल़ न ढील कदै।
उदियागर आय उजागर आगर,
देव सदैव दुखां दरणा।
सुण गीध सलाम सदामद सूरज,
नाम ललाम रटो निरणा।।6

डर चोर तसक्कर जोर मिटै डग,
साप बड़ै बिल भाग सही।
तन सिद्ध वभूत चढाय तरोतर,
वाम सरोवर माग बही।
सुरभी दल़ जंगल़ संचरिये सज,
ध्यान हरीयल़ में धरणा।
सुण गीध सलाम सदामद सूरज,
नाम ललाम रटो निरणा।।7

पढ छंद कविंद अनंद हुवै पुनि,
दंद रु फंद कटै दिल रा।
सुखकंद तणा जप जाप सदायक,
मान विचार दफै मल रा।
सपतास सवार विडारण संकट,
सार उचार लहो सरणा।
सुण गीध सलाम सदामद सूरज,
नाम ललाम रटो निरणा।।9

।।छप्पय।।
प्रथम ऊठ परभात, दरस सूरज रा दखिये।
नत हुय अवनी नाक, रसा ऊपर पद रखिये।
तोड़ै फंद तमाम, नाम जिणरो अघनासी।
उत्साह दियण उमंग, सकल़ जगती सुखराशी।
भल़हल़ै भास सारी भुयण, दल़ण तिमिर दिल दास रो।
गीधिया साच सुणजै गुणी, अरक तणो ले आसरो।।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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