श्री आवड़ माता द्वारा हाकरा दरियाव (नदी) का शोषण करना – डॉ. नरेन्द्र सिंह आढ़ा (झांकर)

वि.स.808 के चैत्र शुक्ल नवमी मंगलवार के दिन मामड़जी चारण के घर पर भगवती श्रीआवड़ माता ने अवतार लिया। एक बार अकाल के समय मामड़जी अपने कुटूम्बियों के साथ अपने पशुधन को लेकर सिंध चले गये। उस समय तक सिन्ध पर अरबी मुसलमानों का कब्जा हो चुका था। उन्होंने सिंध के हिन्दुओं को जबरदस्ती धर्मपरिवर्तन के लिए बाध्य करके बड़े पैमाने पर उन्हें इस्लाम स्वीकार करने को विवश कर दिया था। मामड़जी का परिवार सिंध के प्राचीन नानणगढ (सुल्तानपुर), जो बहावलपुर के 20 कोस उत्तर में आया हुआ था, के पास हाकरा दरियाव (नदी) के किनारे अपनी झोपड़ी (नेस) बनाकर रह रहा था। भगवती श्री आवड़ माता की सातों बहिन शक्ति की अवतार थी। ये सातों ही बहिनें बहुत रूपवान थी।

उस समय नानणगढ का शासक अदन सूमरा था उसने इस्लाम धर्म को स्वीकार कर लिया था। लुचिया नाम के नाई ने आवड़ादि सातों बहिनों के रूप सौन्दर्य की प्रंशसा अदन सूमरा के शहजादे नूरन के सामने की तो नूरन ने हठपूर्वक आवड़ादि बहिनों से विवाह करना चाहा तो मामड़जी चारण ने इस प्रस्ताव को निडरता पूर्वक ठुकरा दिया और कहा कि हम दोनों के धर्म व जाति अलग अलग हैं अतः हमारा तुम्हारे साथ सम्बन्ध कैसे हो सकता है? मुस्लिम शासक अदन सूमरा ने उनकी बातों को अनसुना करते हुए कहा कि यदि तुम खुशी खुशी अपनी लडकियों का विवाह शहजादे नूरन के साथ नहीं करते हो तो हम विवाह जोर जबरदस्ती कर लेगे।

मामड़जी की बात बादशाह अदन सूमरा द्वारा नहीं मानने पर स्वयं भगवती श्री आवड़ माता शेराव भाटी के साथ अदन सूमरा को समझाने के लिए उनकी सभा में गये। लेकिन अदन सूमरा ने उनकी बातों को नहीं माना तो भगवती श्री आवड़ माता ने भयंकर अट्ठाहास कर कहा कि तुम्हारे बुरे दिन आ गये हैं, हमारे साथ अन्याय करने का मतलब तुम्हारे कुल का नाश हो जाएगा। ये वचन कहकर श्री आवड़ माता शेराव भाटी के साथ अपने नेस (झोपड़ी) में आ गये। आवड़ माता ने आदेश दिया कि आज शाम को हम अपने मांड़ प्रदेश को प्रस्थान करेंगे। श्री आवड़ माता के साथ आये हुए लोगों के मन में शंका हुई कि माड़ प्रदेश के जाने वाले रास्ते के बीच विशाल हाकरा दरियाव बहता हैं उसको कैसे पार किया जायेगा ?

उधर बादशाह अदन सूमरा ने हाकरा दरियाव के नाविकों को बुलाकर मामड़जी चारण के कुटूम्बियों व उनके साथ आये हुए लोगों को दरियाव पार कराने की मनाही कर दी। साथ ही बादशाह ने उनको मांड़ प्रदेश भागने से रोकने हेतु हाकरा दरियाव पर कड़ा पहरा लगवा दिया। श्री आवड़ माता ने नानणगढ के दीवान कुशलशाह व उनकी लड़की कणती सहित उनके साथ आये माड़ प्रदेशवासियों को हाकरा दरियाव के किनारे एकत्रित किया और दरियाव से निवेदन किया कि हम घोर विपदा में है, हमें जाने के लिए रास्ता दो हम अपने धर्म की रक्षा हेतु अपने प्रदेश जाना चाहते हैं लेकिन हठी दरियाव हाकरा प्रचण्ड वेग से बहता रहा। इस पर श्री आवड़ माता ने कहा कि हमारे रास्ते में आगे रेगिस्तान (थार) है जहां हमें पीने के लिए पानी नहीं मिलेगा। अतः सभी लोग अपने अपने मटकों व बर्तनों को पानी से भर दो। श्री आवड़ माता ने अपनी बहिनों से कहा कि पेट भरके पानी पी लो फिर यहाँ पानी नहीं मिलेगा।

श्री आवड़ माता ने शेराव भाटी से तगड़िये भैंसे को काटकर भक्ष्य देने के लिए कहा। भाटी शेराव ने अपनी तलवार के प्रहार से भैंसे को काटकर भगवती श्री आवड़ माता को भक्ष्य दिया। श्री आवड़ माता ने भयंकर अट्ठाहास कर भैंसे का खून पीकर एक चल्लू पानी भरा तो नदी का जल स्तर कम होने लगा, इस प्रकार सातों ही बहिनों ने अपना चल्लू भरकर पानी को पिया तो हाकरा दरियाव में एक बूँद भी पानी नहीं रहा। इस चमत्कार के कारण भगवती श्री आवड़ माता का नाम पीनोतणी माता या महोदरी माता (विशाल पेट वाली) पड़ गया। हाकरा दरियाव का शोषण करके भगवती श्री आवड़ माता ने सभी सहयात्रियों को आश्चर्यचकित कर दिया। आज भी इस क्षेत्र में समुद्री जीव, सीप, शंख इत्यादि अवशेष के रूप में देखे जा सकते हैं।

 

भगवती श्री आवड़ माता द्वारा हाकरा दरियाव का शोषण करने का उल्लेख तवारीख जैसलमेर (लखमीचंद) के पृ.सं. 225-26, भगवती श्री आवड़ जी महाराज (ठा मूलसिंह भाटी) के पृ.सं. 24-25, श्री तनोट माता (डॉ अशोक गाड़ी) के पृ.सं. 30, रिपोर्ट मरदुमशुमारी राजमारवाड़ 1891 ई.(रायबहादुर मुंशी हरदयाल सिंह) पृ.सं. 348 व गजनी से जैसलमेर (हरिसिंह भाटी) के पृ.सं. 161-62 में आदि कई ग्रंथों में हुआ है। इस घटना का अप्रत्यक्ष रूप से उल्लेख जेम्स टाॅड कृत Annals and Aniquities of Rajasthan Vol 2(Edited Willam crooke) page no 1166, गौरी शंकर हीराचंद ओझा(बीकानेर राज्य का इतिहास 1) पृ.सं. 6 तथा सिंध की तवारीख में भी हुआ है। सर आॅरल स्टीन एवं अन्य पुरातत्वज्ञों के अन्वेषण के अनुसार भी दसवीं शताब्दी के लगभग हाकरा दरियाव सूख गया था।

मारवाड़ का इतिहास भाग 1 में विश्वेश्वर रेऊ ने लिखा है कि सतलज नदी की एक शाखा, जिसे हाकरा कहते थे, मरूप्रदेश में बहती थी। बाद में पश्चिम की ओर रूख बदल कर सिंध से जा मिली।

तवारीख जैसलमेर (लखमीचंद) के पृ.सं. 225-26 पर लिखा है कि “एक चारन मामडीया जमाना केत में दरियाव पार जहाँ असुर रहते थे जा रहा  7 बेटी आवड़ आदि जो सकती थी असुर की बदनीयत समझ चील हो कर बाप को साथ ले उड़ी सो दरियाव सोसन करके जेसलमेर से  7 कोस दक्षिण डूंगर पर आये।

इन ऐतिहासिक ग्रंथ के अलावा सैकडों कवियों ने भी अपनी साहित्यिक रचनाओं में भगवती श्री आवड़ माता द्वारा हाकरा दरियाव का शोषण करने का वर्णन किया है।

जेठमल चारण के अनुसार (श्री आवड़ चरित्र के पृ.सं. 90)

अगस्त मुनी ज्यों आईनाथ, काफी उण वारै।
सह बैनड़ भर चळ, संमध सोखारै।।
सायर ठहरै सोसीजतो, उत्तरयौ औसारै।
गिलगी भर भर अंजली, नहीं नीर लिगारै।।

मेहाजी के अनुसार (श्री आवड़ चरित्र के पृ.सं. 108)

साते विचार सार धार मीर मार मगीयुं।
करे ललक पात सार लार फोज लगीयुं।।
पीधो हजार कोस पार हाकमार हाकड़ो।
भंज्या निशुंभ -शुंभ भूप आप रूप आवड़ा।।

नंदजी बारहठ के अनुसार (श्री आवड़ चरित्र पृ.सं. 163)

संमद हाकड़ो कोप्यो मनमें गरब थयो गरणाय।
एक चळू भर पीधो अम्बा सूख थलाथल थाय।।

मानदान जी दीपपुरा के अनुसार (श्री आवड़ चरित्र के पृ.सं. 143)

मदंध सिन्ध देश में समंद नाम हाकड़ो।
हिलोल लेत पोळ की सलील छोळ छाकड़ो।।
समेट थेट थाह लेय पेट में मुवावड़ा।
नमो ज मात बीस हाथ पात पाळ आवड़ा।।

भगवती श्री आवड़ माता के भाई मेहरख के अनुसार (श्री आवड़ चरित्र के पृ.सं. 102)

आठ सौ कोस वहतो, उदध नह भीनो कर नखड़ो।
सोसीयो वेग आवड़ सगत हेक चळू भर हाकड़ो।।

इस प्रकार से उपर्युक्त ऐतिहासिक एवं साहित्यिक स्रोतों से भगवती श्री आवड़ माता द्वारा हाकरा दरियाव का शोषण करने की पुष्टि होती है।

खारोड़ा सिंध (हाल बाड़मेर) के देवीदानजी देथा व जयदेव जी सुथार के अनुसार भगवती श्री आवड़ माता आदि शक्तियाँ दरियाव हाकरा का शोषण करके अपने कुटूम्बियों सहित चील बनकर उड़ गये थे, ये उड़कर आधुनिक ऊमरकोट (प्राचीन नाम हमरोट कोट) के निकट खारोड़ा गाँव के 2 किमी दूर आकर आसमान से उतरे थे, इस कारण सिंध के इस क्षेत्र में भगवती आवड़ादि शक्तियों को आसमानियां माता व मानसरिया माता के नाम से जाना जाता है। इस स्थान पर भगवती श्री आवड़ादि सातों शक्तियों की पूजा की जाती है। इस मंदिर का खुला स्थान बना हुआ है। इस मंदिर के प्रति माहेश्वरी, माली, चारण, कुम्हार, राजपूत आदि सिंध की सभी जातियों के लोगों की अपार श्रद्धा हैं। इस मंदिर का पुजारी वर्तमान में केसरदान जी बारहठ हैं। यह गाँव देथा चारणों की जागीर का गाँव हैं। भगवती श्री आवड़ माता के इस स्थान पर वर्तमान में भी कई चमत्कार होते हैं लेकिन लेखन के अधिक विस्तार हो जाने के कारण हम उनके उल्लेख नहीं कर रहे हैं।

पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के ऊमरकोट के पास राणा की जागीर के निकट हाड़ वड स्थान पर भी भगवती श्री आवड़ माता का एक स्थान है। इस स्थान पर भगवती श्री आवड़ माता को धणियाणियां नाम से जाना जाता है। इस स्थान के बारे में देवीदानजी देथा बताते हैं कि यहाँ भगवती आवड़ादि शक्तियों ने एक ग्वाले से एक भैंसे का भक्ष्य लिया था तथा कुछ समय यहाँ पर वड़(बरगद) के पेड के नीचे विश्राम किया था। इस क्षेत्र में भगवती आवड़ादि शक्तियों का एक स्थान ओर है जो सात सतियों का स्थान कहलाता है। पाकिस्तान के सिंध प्रदेश व पंजाब क्षेत्र में आज भी श्री आवड़ माता के इस ऐतिहासिक चमत्कारों की घटनाओं की जनमानस में मान्यता हैं। मुझे मेरे पाकिस्तानी मित्रों के माध्यम से खारोड़ा के आसमानिया माता/मानसरिया माता (आवड़ माता) के मंदिर के व दरियाव हाकरा की एक शाखा के फोटो प्राप्त हुए हैं। आज भी सिंध प्रान्त में बसे हुए चारण प्रातः काल में सूमरा जाति के मुसलमानों का मुख दर्शन नहीं करते हैं। इस प्रकार भगवती श्री आवड़ादि शक्तियाँ हाकरा दरियाव का शोषण करके अपने कुटूम्बियों सहित मांड प्रदेश में आई। हाकरा दरियाव का शोषण करना भारतीय इतिहास की एक बहुत बड़ी चमत्कारी घटना थी इसी चमत्कार के कारण भगवती श्री आवड़ माता ने लोक देवियों व देवताओं में सर्वाधिक ख्याति प्राप्त की जिसके कारण भगवती आवड़ माता के चमत्कारों का प्रचार अफगानिस्तान, पाकिस्तान व सम्पूर्ण भारतवर्ष में हुआ।

~~डॉ. नरेन्द्र सिंह आढ़ा (झांकर)
इतिहास व्याख्याता राउमावि घरट सिरोही

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