🌹श्री ध्यान चिंतामणि घनश्यामाष्टक🌹

Brahmanand_Swami2

।।छंद चर्चरी।।
देखत बड भाग लाग, पोत सरस नवल पाग,
अंतर अनुराग जाग, छबि अथाग भारी।
अति विशाल तिलक भाल, निरखत जन हो निहाल,
उन्नत त्रय रेख जाल, काल व्याल हारी।
विलसत भुँह श्याम वंक, चिंतत उर जात शंक,
मृग मद भर बीच पंक, अंक भ्रमर ग्यानी।
जय जय घनश्याम श्याम, अंबुज द्रग क्रत उदाम,
सुंदर सुखधाम नाम, साँवरे गुमानी।।१

श्रोन कोण द्रग लकीर, तीक्षण जनु काम तीर,
नासा छबि दीप कीर, धीर ध्यान लावे।
कुंडल़ शुभ श्रवण कीन, नौतम कृति अति नवीन,
मनहु हेम जुगल मीन, चंद्र मिलन आवे।
गुण निधि कपोल गौर, चितवत चितलेत चोर,
ताके बिच छदनकोर जोर तिल निशानी।
जय जय घनश्याम शाम, अंबुज द्रग कृत उदाम,
सुंदर सुखधाम नाम, साँवरे गुमानी।।२

मंद मंद मुख हसंत, दारिम सम पंक्ति दंत,
समरत माहंत संत खंत चित्त करके।
लोभित चित अधर लाल, बिलसित बिद्रुम प्रवाल,
राजत अतिशय रसाल, ताल बंसीधर के।
अंबक फल चिबुक जान, कंबु सम कंठ मान,
धारत शिव आदि ध्यान, आन ऊर आनी।
जय जय घनश्याम शाम, अंबुज द्रग कृत उदाम,
सुंदर सुखधाम नाम, साँवरे गुमानी।।३

दीरघ अति दौर दंड, मोतिन भुजदंड मंड,
खलदल बल कर विखंड, अरि प्रचंड मारे।
हिय पर बन नवलहार, शोभित अति जलज सार,
देखत जन बार बार, अघ अपार टारे।
प्रौढ ऊंच उर प्रथूल, फहरै शुभ गंध फूल,
मनि भर नँग बर अमूल, दुलरी बखानी।
जय जय घनश्याम शाम, अंबुज द्रग कृत उदाम,
सुंदर सुखधाम नाम, साँवरे गुमानी।।४

उदर तंग अति अनूप, गुनवंत तिल शाम गूप,
नाभि मनु प्रेम कूप, रूप अजब राजे।
शोभित हद कटि प्रदेश, कांति नग जटित बेस,
चिंतित उर में मुनेश, अघ अशेष भ्राजे।
उरू अत्यंत रूपवान, गरुड पीठ शोभमान,
निज जन जेहि धरत ध्यान, प्रान प्रेष्ठ जानी।
जय जय घनश्याम शाम, अंबुज द्रग कृत उदाम,
सुंदर सुखधाम नाम, साँवरे गुमानी।।५

जानुं दो रूपवंत, लालित कर श्री अनंत,
समरत जेहि मुनि अनंत, अंत जन्म आवे।
जन मन प्रिय जुगल जंग, रोम अल्प अजब रंग,
चितवत चित चढत रंग, अति उमंग पावे।
गुल्फन छबि अधिक शोभ, स्थिति चल मन देत थोभ,
निरखत उर मिटत क्षोभ, लोभ आदि ग्लानी।
जय जय घनश्याम शाम, अंबुज द्रग कृत उदाम,
सुंदर सुखधाम नाम, साँवरे गुमानी।।६

चरन पृष्ठ चित हरात, तरु तमाल छबि लजात,
सुमिरत ततकाल आत, रात प्रात मन में।
जाकुं नित शेष गात, अजहु पुनि नहि अघात,
तुलसी जेहि थल रहात, पात मानु जलमें।
नख उतंग रंग लाल, शोभित मनु दीप माल,
राजत किधों चंद्र बाल, ख्याल करत ग्यानी।
जय जय घनश्याम शाम, अंबुज द्रग कृत उदाम,
सुंदर सुखधाम नाम, साँवरे गुमानी।।७

विलसित चरणारविंद, कोमल अति प्रेम कंद,
ध्यावत भव मिटत फंद, छंद स्तवन बोले।
प्रसरत जेहि पद प्रसंग, पुन्य भरित सरित गंग,
अघविनास परस अंग, हो उतंग डोले।
राजत महिं उर्ध्वरेख, वज्रादिक सहित पेख,
ब्रह्मानंद देख देख, लेखत कुरबानी।
जय जय घनश्याम शाम, अंबुज द्रग कृत उदाम,
सुंदर सुखधाम नाम, साँवरे गुमानी।।८

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