श्री डूंगरेचियां रौ छंद – मेहाजी वीठू

तेमडाराय

।।गाहा।।
आद सकत प्रणम्म अनेकूं।
अनि अवतार चिरत्त अनेकूं।
जांणै कवण तूझ गुण जेकूं।
विधि सपत मात रा वमेकूं।।1।।
जोगण चौसठ खेलत जांणी।
बारह खट कोड़ ब्रह्मांणी।
कोड़ छपन्न चामंड कहांणी।
कोड़ नवे मिळवे कतियांणी।।2।।
रंभा सात समांणी रंगे।
रचि सिंणगार अचंभम रंगे।
रांमत बावन वीरत रंगे।
तो रमिस्यै माड़ गिरव्वर रंगे।।3।।

।।छंद सारसी।।
रम्मवा रंगूं ऊभ अंगूं, वेस चंगूं वेवरं।
चूड़ा भळक्कूं चीर ढक्कूं, पै खळक्कूं नेवरं।
संभाय सारं चूड़ भारं, हेम झारं क्रंमये।
साते समांणी आप भांणी, माढरांणी रम्मये।।1।।

सोळै हरज्जं कळा सज्जं, निळै कज्जं न्रिम्मळं।
चैहर अखंडं मेळ मंडं, वैण डंडं विम्मळं।
सोहै झमाळं सिक्खराळं, उज्जवाळं अम्मये
साते समांणी आप भांणी, माढरांणी रम्मये।।2।।

कोमंड कस्सं तांण तस्सं, उरह वस्सं ओपियं
हीरे जड़तं ऊब भतं, जोतवंतं जोपियं।
हींडळे हारं नवै सारं, सिंणगार सम्मये।
साते समांणी आप भांणी, माढरांणी रम्मये।।3।।

बौह रूप बाळी मिळै ताळी, वीर चाळी केळियं।
हुंकार होडं खिलै कोडं, लूंब लोडं लोळियं।
लुळ धरा लग्गं पै करग्गं, निरत अग्गं नम्मये।
साते समांणी आप भांणी, माड़रांणी रम्मये।।4।।

औछाड़ एहं गवर गेहं, तास देहं सोहियं
कुंडळ रतन्नं कीध कन्नं, मुर भवन्नं मोहियं
वाधंत वैणं झंख रैणं, भ्रूह नैणं भ्रम्मये
साते समांणी आप भांणी, माढरांणी रम्मये।।5।।

झांझरा झणणै चीर चणणै, फिरत फणणै फेरियं।
भूगळी भणणै छंद छणणै, भ्रंम कणणै भेरियं।
चम्रंग चणणै वंस रणणै, गैण गणणै गम्मये।
साते समांणी आप भांणी, माढरांणी रम्मये।।6।।

धर पाय धम्मां कंम कम्मां, हम्म हम्मा हक्कयं।
वरसूळ वम्मा सम्म सम्मां, डम्म डम्मां डक्कयं।
गाजै गिरम्मां ढम्म ढम्मां, घम्म घम्मां घम्मये।
साते समांणी आप भांणी, माढरांणी रम्मये।।7।।

हा हंस हक्कं कवड़ तक्कं खड़ खड़क्कं दढ्ढियं।
कंधा कड़क्कं कूरमक्कं, भार जक्कं गढ्ढियं।
त्रेभू टळक्कं च्यार चक्कं, सिघ्र मक्कं धम्मये।
साते समांणी आप भांणी, माढरांणी रम्मये।।8।।

तारंग सिल्ला झिल्ल मिल्ला तांम छिल्ला तोहियं।
जुड़मेर जिल्ला पांण पिल्ला, हिल्ल मिल्ला होहियं।
कर करे ढिल्ला खिल्ल खिल्ला ताळ तिल्ला तम्मये।
साते समांणी आप भांणी, माढरांणी रम्मये।।9।।

आरती अम्मर ढुळै चम्मर मेघ डम्मर छत्रयं।
माळा हमल्लं कंठ झल्लं कळी फूलं नेत्रयं।
तो रूप तासं फूट वासं, अत उजासं अम्मये।
साते समांणी आप भांणी, माढरांणी रम्मये।।10।।

।।छप्पय।।
रमत सगत अत रूप, ओप सिंणगार अनेकां।
वणै रास विध विद्ध, वैण वैणां वम्मेकां।
जागै रिख जोगंद्र खिलै गुण गंध्रव खेळा।
मादळ भेर मृदंग, सुरां मिळ झूळ समेळा।
प्रवाड़ा पार कुण पांमवै, पर पेखणो प्रमाणियां।
प्रणमंत मेह परमेसरी, सपत मात सुररांणियां।।

~~मेहाजी वीठू

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संदर्भ:
प्रष्ट संख्या: 74
पुस्तक: मेहा वीठू काव्य-संचै
सम्पादन: गिरधर दान रतनू “दासोड़ी”
प्रकाशक: साहित्य अकादमी, दिल्ली (2017)

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