श्री जगदंबा मानसर तट रास विलास – कवि देवीदानजी (बाबिया कच्छ)

सेंग माताजीयां रा भेळा हुय रास रमण रा छंद।

deviyan

।।दूहो।।
एक समै जगमात जय, उर अति धरे उमंग।
निरत करत तट मानसर, राजत पट नवरंग।।1।।

।।छंद – रेणंकी।।
राजत पट सधर नीलंबर अंबर, धर नवसत शिणगार धरे।
फरर पर थंभ धजा वर फरकत, झरर झरर प्रतिबिंब झरे।
लळ लळ उर हार गुलाब ज लळकत, सिर पर गजरा कुसुम सजै।
परघट धर सधर मानसर उपर, सकत सकळ मिळ रास सजैं।।1।।

झांझर धुनि झणण झणण घण झणकत, गणणण घुघर पाय घुरै।
तणणणणण तंत र बाजत तंबुर, सणणण गावत मधुर सुरै।
थणणण थइ कार हुवत जब थैथतथैतत, गणण गणण जब धरण गजै।
परघट धर सधर मानसर उपर, सकत सकळ मिळ रास सजैं।।2।।

कट कट गय विकट अकट दुःख संकट, धिन कट बाजत तबल धुनि।
झट पट जग मात फिरत फरगट जित, सर तट सुर थट आय सुनि।
धिधिकट कट ध्रुकट ध्रुकट कट ध्रोंकट, बिकट उलट मरदंग बजै।
परघट धर सधर मानसर उपर, सकत सकळ मिळ रास सजैं।।3।।

झम झम कर झांझ बजहि बहु झम झम, कम कम कोरम पीठ कमं।
सम सम सम साम वेद वत संगीत, ठम ठम ठमकत मेघ ठमं।
घम घम घम घोर घुमड घन गरजत, धमम धमम धम भोम ध्रुजै।
परघट धर सधर मानसर उपर, सकत सकळ मिळ रास सजैं।।4।।

सुरसत रंग रचत सपत सुर साधत, गम न परत गत अगम अति।
परसत पद कमळ विमळ रज परसत, तरत नमत सब अमर पति।
चितवत नित जगत भगत चरणन चित, रमत जगत अति ललित रजै।
परघट धर सधर मानसर उपर, सकत सकळ मिळ रास सजैं।।5।।

बन ठन सुर नार करत तव वंदन, थन गन थन गन होत थनं।
धन धन धन रमण रच्योहि सोहि दिन धन, भन भन ज्यों नर नार भनं।
मन मन तन मगन भुवन त्रय निजमन, गान तान सुन गगन गजै।
परघट धर सधर मानसर उपर, सकत सकळ मिळ रास सजैं।।6।।

खळ खळ भुज चूड उजळ अति खळकत, कुंडळ प्रबळ प्रकाश करं।
झळळळ मुख नूर सूर सम झळहळ, भळहळ भळहळ तेज भरं।
लळळळ नंग जोति विमळ मणि लळकत, भृकुटी मंगळ मय भीड भजै।
परघट धर सधर मानसर उपर, सकत सकळ मिळ रास सजैं।।7।।

हसरस नव दरस परस पर हसबस, सरस संपूरण रास भयो।
बरसत सुर सुमन वदन जय बोलत, सब दिस हुलस हुलास छयो।
सेवत विधि इश शक्र हरि सेवत, “देवी दान” नूं दरस दिजै।
परघट धर सधर मानसर उपर, सकत सकळ मिळ रास सजैं।।8।।

।।छंद – छप्पय।।
रमत रास सुरराय, सरस शिणगार ही सज्जै।
गात गीत संगीत, बीन मरदंग धुनि बज्जै।
घुघर बाजत घमक, धमक पायन धर ध्रुज्जै।
झांझर अति झमकंत, भनक सुन संकट भज्जै।
जयकार संत सुर नर जपत, गगन बीच नौबत गजै।
कर जुगल जोरि “देवो” कहै, शकति रास इण विध सजै।।1।।

~~कवि देवीदानजी (बाबिया कच्छ)

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