श्री करनीजी ने दी #महराणगढ़ की नींव

भारतीय इतिहास का अध्ययन करते हैं तो कुछ मानसिक विकृतियां हमारे सामने परिलक्षित होती है। उनके कारण हमारे सामने द्वंद्वात्मक स्थिति यह रही कि हम सही और गलत के निर्णय तक पहुंच ही नहीं पाते हैं।

मुगलों और अंग्रेजों से पहले यहां जो इतिहास या ऐतिहासिक काव्य लिखे गए उनमें भारतीयता की गरिमा और गौरव रक्षित थे। निष्पक्ष रूप से उन इतिहासकारों व कवियों ने यहां के गौरवबोध को अक्षुण्ण रखा लेकिन मुगलों ने अपने मातहत कर्मचारियों से इतिहास लिखाया। उन्होंने भारत के गौरवशाली इतिहास को विकृत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

यही सिलसिला मुगलों के बाद अंग्रेजों ने चालू रखा। उन्होंने यहां के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक गौरव बिंदुओं को तहसनहस ही कर दिया। इन लोगों का ही अंधानुकरण हमारे देशी रियासतों के राजाओं ने अपना इतिहास लिखाते समय किया। उन्होंने उन छोटे-छोटे असंख्य वीरों के इतिहास को लिपिबद्ध नहीं करवाया जिन्होंने उनके कारण ही अपने प्राण न्योछावर किए थे।

इस मानसिकता का यहां ही पटाक्षेप नहीं हुआ। बल्कि इसके बादके इतिहासकारों की एक ऐसी स्वयंभू टीम तैयार हुई जिन्होंने, समकालीन काव्य, लोकसाहित्य, ख्यातों आदि संदर्भों को न केवल षड़यन्त्र के तहत नकारने का बीड़ा उठाया अपितु उसे तथ्यविहीन व सत्यता से परे ठहराकर उन लोगों के मन में संशयात्मक स्थिति बनाने में एक कदम तक सफल भी रहे, जिनके पूर्वजों के वे संदर्भ थे और जिनके पूर्वजों ने लिखे वो भी साप छंछूदर की स्थिति में आ गए।

यही नहीं ऐसे इतिहासकारों ने ऐतिहासिक व सांस्कृतिक संदर्भों को भी जनमानस की स्मृति से हटाने हेतु अपने इतिहास ग्रंथों में शामिल नहीं किया।

ऐसा ही एक सांस्कृतिक गौरव बिंदु है जोधपुर गढ़ की नींव करनीजी के हाथों निष्पादित होना।

डिंगल काव्य सहित कई जगह इस बात के संदर्भ मिलते हैं लेकिन आधुनिक इतिहासकारों में केवल किशोरसिंहजी बार्हस्पत्य को छोड़कर अन्य किसी ने इस महनीय बिंदु को उल्लेखित नहीं किया।

राव जोधाजी ने मंडोवर पर अपनी विजय पताका फहराकर महराणगढ़ की नींव दिराई। वर्तमान में जहां किला बना हुआ है, उस भाखर पर नाथ संप्रदाय के महान तपस्वी चिड़ियानाथजी का धूणा था और वे यहां तपस्या किया करते थे। कारीगरों ने जोधाजी को बताया कि-
“अगर नाथजी का धूणा बीच में से हटा दिया जाए तो गढ़ के नक्शे में बांकपन नहीं रहेगा।”

-“जोधाजी ने नाथजी से कहां कि आप यहां से धूणा हटालें ताकि मेरे किले में बांकपन न रहे।”

यह सुनकर नाथजी ने कहा कि-
“किला तो बांका ही श्रेष्ठ रहता है, सूधा (सरल) किस काम का ?”

लेकिन फिर भी जोधाजी माने नहीं तो नाथजी अपना धूणा अपनी चादर में लपेटकर उठ गए लेकिन जोधाजी को श्राप दिया कि इस भाखर से जो झरणा झर रहा है वो सूख जाएगा और तेरा कार्य संपूर्ण नहीं होगा।”

गढ़ बनना शुरु हुआ लेकिन संयोग ऐसा बना कि जितना कमठा दिन-दिन में होता था वो रात्रि में गिर जाता। सुबह कार्य शून्य से आरंभ करना पड़ता था ऐसे में लोगों ने रावजी को कहा कि नाथजी का श्राप फलिभूत हो रहा है, ऐसे में अब एक ही उपाय है कि देशनोक से करनीजी को निवेदन कर नींव हेतु बुलाया जाए।

जोधाजी ने अमराजी बारठ, दामाजी पुरोहित को देशनोक भेजा। इन्होंने रावजी की व्यथा बताकर जोधपुर चलने का आग्रह किया।

करनजी इनके साथ जोधपुर आई तथा अपने हाथ से जोधपुर के महराणगढ़ की नींव रखी। इस संदर्भ में ‘मारवाड़ रै परगनां री विगत’ भाग 1 में लिखा हुआ है कि-

“श्री जोधपुर रो किलो सं. 1515रा जेठ सुद 11 सनीवार राव जोधाजी नीम दीवी। श्री करनीजी पधार नै सो विगत-पहला तो चौबुरजो जीवरखो कोट करायो, चिड़िया-टूंक ऊपर।”

यही बात करनी चरित्र में इतिहासकार किशोरसिंहजी बार्हस्पत्य लिखते हैं-

“देशनोक से चलकर अमरा बारठ व पुरोहित के साथ मंडोवर पहुंची तब राव जोधा ने गांव चांपासनी तक पगमंडे बिछाकर उनका स्वागत किया और विक्रम संवत् 1515ज्येष्ठ सुदि 11 गुरुवार को उन्होंने उस पर्वत पर, जहां आजकल जोधपुर बसा हुआ है, अपने हाथों से किले की नींव रखी।”

यही बात राजस्थानी सांस्कृतिक इतिहास के मर्मज्ञ अध्येता ठाकुर नाहरसिंहजी अपनी फेसबुक वॉल पर 12/5/ 19 को लिखते हैं
“आज ही के दिन मां करणी जी ने जोधपुर पधार कर मेंहरानगढ की नींव निज हाथों से रख कर राव जोधा को आशीष बक्षी।”

इसका एक पुराना गीत इस प्रकार है-

विमल देह धारियौ सगत, जंगलधर बिराजै,
थान देसांण श्री हाथौं थाया,
उठै कवि भेजियौ, राव करवा अरज,
जोधपुर पधारो जोगमाया।।

आप कृपा रिङमल घर अंबे, यल मंडोवर आई,
जोगी घर मेटर जोधारौ, किलो दियौ कराई।

दीधी नींव देसाणपत, कीधी मदद किसेक,
जंगी गढ जोधांण री, (मां) टणकी राखी टेक।।

मध्यकालीन डिंगल काव्य में भी उक्त संदर्भ मिलते हैं। खेतसी बारठ मथाणिया अपने एक गीत में लिखते हैं-

विमल़ देह धारियां सगत जंगल़धर विराजै,
थांन देसांण श्रीहत्थां थाया।
उठै कव भेजिया राव करबा अरज,
जोधपुर पधारो जोगमाया।।
. . . . . . .
अवध पनरोतरै समत पनरै इल़ा,
बाघ चढणोतरै वेद वरनी।
गेह बड़ भाग किनियां तण गोतरै,
कल़ा साजोत रै रूप करनी।।

इन्हीं के समकालीन कवि चिमनजी रतनू चौपासणी भी अपने एक गीत में यही बात लिखते हैं–

पधारै मंडोवर जोधगढ परठवा,
वर दियो जोध नै तैण वारां।
झाड़ जगतंब रा गांम रहसी जितै,
थिर जितै अचल़ जोधांण थारा।।

यही बात करनी-रूपक के प्रणेता बखतावरजी मोतीसर सींथल लिखते हैं-

जंगल़ू पछै ज जोधपुर, इल़ पर राज अथाह।
बेटो नृप मुरधर बजै, पोतो जंगल पतसाह।।

इतना ही नहीं, दिग्गज डिंगल़ मनीषी कैल़ासदानजी उज्ज्वल भी अपने एक गीत में में उक्त बात को इस प्रकार लिखते हैं-

कायम अभय कियो मा करनी,
आदि सगत आवड़ अवतार।
दीनी सुपुल़ नींव दृढ देवी,
निर्भय बसो छांह नरनार।।

इन्हीं मनीषियों का अनुसरण करते हुए इन पंक्तियों के लेखक (गिरधरदान रतनू) अपनी कृति ‘सगती सुजस माल़ा’ में लिखा है-

थापण थिर गढ जोधपुर, वणियो जोध विचार।
चेजो चिड़ियानाथ तप, पड़ियो नाही पार।।
जद जोधै लीनी जरू, आय आपरी ओट।
थिर जोधै रै थापियो, करनी हाथां कोट।।
वीसहथी नै वीणती, पह जोड़ की पांण।
थिर नींवी री थापना, कर दीधी किनियांण।।
अरि दल़ण अखियात ओ, भेर तपै वँश-भांण।
जोध बसायो जगत में, जस जोगो जोधांण।।
मोरधव्ज चावो मुदै, महि हद पावण मांण।
गढां सिरोमण गाढधर, जग जोवो जोधांण।
अनम असंका ऊपना, जस डंका जग जांण।
बंकां राखी वीरता, जुड़ जोधां जोधाण।।

सारांश में कहने का तात्पर्य इतना ही कि सांस्कृतिक गौरव बिंदुओं को यथास्थिति में आज की युवा पीढ़ी को बिना पूर्वाग्रहों के बताई जाए ताकि इतिहास का सही मूल्यांकन तथा महनीय मनीषियों के अवदान को समझने में सरलता रहे।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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