श्री मोरवड़ा जुन्झार जी – कवि रामदान जी

।।श्री जुन्झार जी।।

सिरोही राजा सोखियो, दुश्मण लीधो देख।
जद्ध किधो महियों जबर तन मन दही न टेक।।

अहि भ्रख भूपत आदरयो, कीध भयंकर कोम।
केशर नृप उन्धी करी, सिरोही रे सोम।।

धरा ज कारण धीरतां जबरो वरियो जंग।
अमल लेहंता आपने रेणु महिया रंग।।

कान गया कवलास में, अपसरा वरीया अंग।
अमल लेहंता आपने रेणु महिया रंग।।

।।गीत।।
संवत उग्निस सौ सतुतरा सालमें, जबर नर अतंता समर जड़िया।
आवतां राज री फोज सिर उपरे, लखो धर सूरमा जुदध लडीया।।1
जीवतां जीव दही नहीं जीवका, विमाणों तणी हद वाट वहीया।
सिरोहीराज में सति और सूरमा, मोरवडा गोम ने जात महिया।।2
अवल में खेतजी धीरजी आखवुं, कोनजी मकनजी एम् कोप्या।
प्रेमजी अर मनरूप धर पोढ़ीया, रंग रण खेत विच पाँव रोप्या।।3
अचल अर जवो तो भजांबळ आपरे, हिन्दू री कवण सू होड़ होवे।
एतां नर गोळीयों तणे मुख आविया, राज में कूटोड़ा अवर रोवे।।4
जात अर मात तो जगां धर जीवसी, अमर रहे नहीं सजस जासी।
मुआं एतापण दीधी न भौमका, पाछला दीकरा चैन पासी।।5
लखे प्रदु का शेष कांई, रंग रणखेत विच पाँव रसिया।
ओपे विरमाळ डाल गळ अपसरा, विमोण बैठ सर्ग लोक वसिया।।6
संवत उग्निस सौ सतुतरा सालमें………………..
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चढ़े फौज आवी खड़े जगत जोणे सको, कियो तेसिल पर हकम काजा।
अजासुत आई नवलाख रे आंगमल, रे मन विचारी नह कोयं राजा।।7
मड़ाडे कटक आवे हुओ एक मन, राज रे हुकम री तीख राखी।
अरे मत जाओ कोई चारणों उपरें, भले भड भूपतें नकुं भाखी।।8
चडयो हाकम जके भल शोम्भले, मोरगढ़ साहेबें खबर मेली।
चेत खेता महिया फौज आवी चढ़े, बणे अंगरोष भड रहो बेली।।9
धमस घोडा पगां शेषचतर धुजियो, माह भड घोर तज ओम मचियो
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धरा कद वकारें मखोमख धीरतो, देयों उभे पगे किम दोणो।
केई चारण मुआं जमी रे कारणे, तेही मरवा तणों एही टोणो।।10
झली तलवार बन्दुक लाठी जदी, ओम सोमी भड़े झीक उड़े।
तीर लाग्यां थका न धारे कोन तद, कंपनी हटावी घाल कुड़े।।11
मको लड्तों थको वकारे माढूओ, पाँव रणखेत मत धरो पासा।
थरू प्रेमो कहे अमर नोम थाहे, सदा रा कंवर रा वचन सासा।।12
अंग टूटे जको धारे नहीं आपरा, रोष भरियां थका देय रीठो।
फौज कूटे भड़े लडे पासी फरी, देश देशो वसे नको दीठो।।13
मोड़बन्धो जवो वींद झुंझे मुओ, लड़न्तों झोक मनरूप लागे।
अणापर हिन्दूयें मरण किधो अमर, असो साको नह सुण्यो आगे।।14
कंवर चतरेस रा बढ़ती कळा, रमे असलेसर करे रटका।
घाव सके रमे होळी तणो गेरियो, बंदूकों आगे हुआ बटका।।15
जीवतों अला नोह दीधि जोरवर, खड़े वज्राग भड़े आग खेतां।
अंगवट बणो सोभा तणा आपरी, जग में अरक लग सजस जेता।।16
नवे भड़े गावो कूण जीव राख्यो नहीं, सनी सनी होय पड़ग्या शरीरा।
पोतरा भगा रा चढ़े विमोण पंथ, वणों ने वरेगी अपसरा सुर वीरा।।17
चढ़े फौज आवी खड़े जगत जोणे सको. . . .
~~रामदान जी

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