श्री राम वंदना


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।।दोहा।।
राम नाम सुखधाम जप, तन सरसिज जनु श्याम।
सीतावर! आराम-मन!, अद्भुत छबि अभिराम।।१
सुख के धाम श्री राम का नाम हे मन! जप ले, जिनका शरीर श्याम रंग के कमल के समान है! सीतावर श्री राम की अद्भुत और अतीव सुंदर छबि मन को आराम देने वाली है।

।।हरि गीतिका।।
सुखधाम!सरसिज-श्यामवपु!सिय वाम, जिन के सोहती।
गुणग्राम! मनविश्राम!ललित ललाम छबि मन मोहती।
निश्काम!शोभाऽराम, कष्ट तमाम पातक खंडनं।
श्री राम !कोटिक काम अति अभिराम रघुवर वंदनं।।१
सकल सुखों के धाम, श्याम रंग के कमल के समान शरीर वाले, जिनके दाहिनी और सीता जी शोभा पा रहे है। जो गुणों के ग्राम है, मन की विश्राम स्थली है, और जिनकी ललित और ललाम छबि मन को सदैव मोहित करती रहती है! जो समस्त कामनाओं से रहित है, शोभा और सौंदर्य के बगीचे समान है, और समस्त पाप और कष्ट का खंडन करने वाले है। ऐसे करोड़ों कामदेव के समान अतीव सुंदर रघुवर प्रभु श्री राम को वंदन है।

वरबाल दशरथलाल रावणकाल हे करुणाकरं।
वनमाल धर उर लाल श्याम तमाल सम तनु सुंदरं।
जगपाल!बाहु विशाल तिलक सुभाल कृत शुभ चंदनं।
श्री राम !कोटिक काम अति अभिराम रघुवर वंदनं।।२
दरशथ के चारों लाल में आप सबसे बडे है, जो रावण के काल है और करुणा करने वाले है! जो वक्ष स्थल पर लाल वन पुष्पों की माला धारण किए हुए है और जिनका शरीर श्यामल तमाल के समान सुंदर है!जगत के पालनहारे, विशाल बाहु प्रभु ने भाल पर चंदन का शुभ तिलक कर रखा है। ऐसे करोड़ों कामदेव के समान अतीव सुंदर रघुवर प्रभु श्री राम को वंदन है।

रघु नाथ !शरधनु हाथ!लक्षमण साथ बिच में जान की।
अवदात शुभ जलजात नैन लखात जय मुनिनाथ की।
जग तात!श्यामल गात!कौशल मात! असुर निकंदनं।
श्री राम!कोटिक काम !अति अभिराम रघुवर वंदनं।।३
धनुष और बाण लिए रघुनाथ जी लक्षमण के साथ बीच में जानकी के साथ है। जिनके नैन पवित्र और शुभ कमल के समान है ऐसे मुनिनाथ की जय हो। जिनकी माता कौशल्या है, और वे श्यामल शरीर है जगत के पिता है और असुरों का निकंदन करने वाले है। ऐसे करोड़ों कामदेव के समान अतीव सुंदर रघुवर प्रभु श्री राम को वंदन है।

साकार हरि अवतार नर तनु धार जय जगनायकं।
संहार दनुज अपार हर भुवि भार धर धनु सायकं।
मुनि नार कर उद्धार स्मृति श्रुतिसार रघुकुल नंदनं।
श्री राम !कोटिक काम!अति अभिराम!रघुवर वंदनं।।४
जो विष्णु के साकार स्वरूप और अवतार है और मनुष्य का शरीर धारण किए हुए है और जगत के नायक है। जिन्होंनें धनुष और बाण धारण करके। अपार दानवों का जिन्होने संहार करके धरती के भार को हर लिया है। जिन रघुकुल नंदन नें गौतम ऋषि की पत्नी का उद्धार किया है और जो श्रुति और स्मृति के सार रूप है ऐसे करोड़ों कामदेव के समान अतीव सुंदर रघुवर प्रभु श्री राम को वंदन है।

रघुनंद सुर मुनिवृंद जगदानंद त्रिभुवन तारकं।
अति चंड शर कोदंड वेग प्रचंड खल संहारकं।
हर द्वंद करुणाकंद! मन छलछंद दशरथ नंदनं।
श्री राम कोटिक काम अति अभिराम रघुवर वंदनं।।५
रघुनंद! देवताओं मुनियों और जगत को आनंद देनेवाले है, और त्रिभुवन के तारणहार है। जिन के धनुष के बाणों का प्रहार अति प्रचंड और घातक है और दुष्टों का संहारक है। दशरथ नंदन मन के छल छंद को आप हर लेने वाले करुणाकंद है। ऐसे करोड़ों कामदेव के समान अतीव सुंदर रघुवर प्रभु श्री राम को वंदन है।

स्मित मंद !अतिसुख कंद जनु मकरंद कौशल नायकं।
मुख चंद्र ! सप्तक मंद्र स्वर आनंद मुक्ति प्रदायकं।
पद वंद तव रघुनंद मनहर छंद ! रच जगमंडनं।
श्री राम कोटिक काम छबि अभिराम रघुवर वंदनं।।६
हे कौशल नायक! आपका स्मित मंद है, जो अतीव सुख का समूह है, मानों फूलों का रस है। आप के चंद्रमा के समान मुख से मंद्र सप्तक की तरह स्वर आनंद और मुक्ति सदैव प्रदान करता रहता है। इस मनहर छंद को रचकर हे जगमंडन! (जगत की शोभा) हे रघुनंदन आप के चरणों में वंदन है! करोड़ों कामदेव के समान अतीव सुंदर रघुवर प्रभु श्री राम को वंदन है।

रघुवीर!श्याम सरीर सरयू तीर जन मन मोहनं।।
रणधीर गौर गंभीर !लछमन वीर! सुंदर शोभनं।
मन धीर ! धर हर पीर हो न अधीर भज नर उत्तमं।
श्री राम कोटिक काम छबि अभिराम रघुवर वंदनं।।७
हे श्यामल शरीर रघुवीर आप सरयू तीर पर खड़े अयोध्या के जन जन के मन को मोह लेने वाले है। आप रणधीर हो, गौर ओर गंभीर भाई लक्षमण के साथ आप सुंदर शोभायमान हो रहे हो। रे मन धीरज धर इतना अधीर मत हो हर पीड़ा को हरने वाले नरोत्तम करोड़ों कामदेव के समान अतीव सुंदर रघुवर प्रभु श्री राम को वंदन कर।

अवधेश नृप आदेश सह लखणेश विचरत काननं।
मुनिवेश गुंफित केश अरि लंकेश हे सीता-धनं।
राकेश-मुख!सुर शेष ब्रह्म महेश पूजित जग जयम्।
श्री राम!कोटिक काम छबि अभिराम रघुवर वंदनं।।८
अवधेश राजा दशरथ के आदेश करने पर भाई लक्षमण के साथ जो वन में गुंफित केश मुनिवेश में विचरण करते है। रावण के दुश्मन और सीता के धन आप ही है!। हे चंद्रमा के समान मुख वाले आप देवताओं शेषनाग, ब्रह्मा, शंकर और जगत द्वारा पूजित हो आप की जय हो। करोड़ों कामदेव के समान अतीव सुंदर रघुवर प्रभु श्री राम को वंदन है।

।।कलश छप्पय।।
कोटिक लाजत काम, धर्म हित नरतनु धारी।
नर होता निष्काम, याद करते दनुजारी।
आश्रितजन आराम, विबुध उर व्योम विहारी।
सुखद रूप साकार, जात “नरपत” बलिहारी।
अद्भुत !अलौकिक!अपरिमित, चरित राम अवधेश के।
श्रुति शेष पार नहि पावही, सकल चरित करुणेश के।।
करोड़ों कामदेव जिनके सौंदर्य को देखकर लज्जित हो जाते है! धर्म हेतु जो नर रूप में अवतरित हुए। दैत्यों के अरि श्री राम का स्मरण मात्र ही मनुष्य को कामना रहित(निष्काम) कर देता है। जो आश्रित जनों के आराम है और विबुध लोगों के ह्रदय रूपी आकाश में विहार करने वाले है।जो सुख देने वाले साकार रूप है जिस पर नरपत बलिहारी जाता है!।अवधेश प्रभु श्री राम के चरित्र अद्भुत, अलौकिक और अपरिमित है!।जिस की थाह वेद, शेष नाग भी नहीं पा सकते ऐसे सकल चरित्र उस करुणेश श्री राम जी के है।

~~©नरपत आसिया “वैतालिक”

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