सुनो सपूत हिंद के

सुनो सपूत हिंद के! सुपुत्रियो सुनो ज़रा!
सुनो तुम्हें पुकारती, ये मादरे वसुंधरा!
मनु के आत्मजो सुनो! सुनो आदम के अंशजो!
गुरु-ग्रंथ पूजको सुनो! सुनो यीशु के वंशजो!
जिनेन्द्र जैनियो सुनो! प्रबुद्ध बुद्ध अर्चको!
सुनो सुकर्म साधको! विशुद्ध ज्ञान चर्चको!

अभी भी वक्त है सुनो! अरे कलम आराधको!
अरे ओ सिद्ध-साधको! कहो रे वेद पाठको!
ये जन्म जाति-वर्ण का, आधार था यहां कहां।
सदा-सदा से कर्म ही का राज है रहा यहां।
अरे ये भूमि है वही, जो मात से महान है।
कहा जो राम ने कभी, सो जानता जहान है।

जहां न स्नेह स्वर्ण का, जहां न चाह ताज की।
रखी सदा रवायतें, रखी न चाह राज की।
न ऊंच-नीच भेद था न छूत की बीमारियां।
न वाद का जुनून था न खौफ़ या खुमारियां।
न श्रेय लूटने की दौड़ थी न घात था कभी।
न प्रेय कुर्सियां रहीं न, लूट-पाट थी कभी।

आन पे बनी तो एक-एक जान आ जुटी
अखंडमंड स्वाभिमान बान पे मरी मिटी।
सुशान हिंद देश की न स्याह होन दी कभी।
हो रान हो कि रंक राह एक ही चले सभी।
स्वधर्म की सुपालना, स्वदेश की आराधना।
औदार्य का अनूप गान, शौर्य की सुसाधना।।

करो न आज मात से यों घात देशवासियो!
अरुणप्रभा को मत करो यों रात देशवासियो!
ईमान जो बचा नहीं तो मोल क्या है मान का?
जो भाव ही संदिग्ध है तो क्या करें सम्मान का?
प्रतीतिहीन प्रेम नेम नीतिहीन हो रहा।
सुकर्मवीर क्लान्त हो प्रमादनींद सो रहा।

जगो तुम्हें जगा रही है, राष्ट्र की रवायतें।
जगा रही ऋचाएं ओ जगा रही है आयतें।
माँ भारती की भावना सुपावना को जानिए।
बड़ा न देश से कोई युं दीन-धर्म मानिए।
उठो अनन्त जोश ले, दिगंत को दिखाय दो
सुपंथ पे चले चलो, कुपंथ को भुलाय दो।

~~डाॅ‐ गजादान चारण ‘शक्तिसुत’

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