स्वामी गणेशपुरी कृत सूर्यमल्ल स्तुति

महाकवि सूर्यमल्ल मीसण के पट्ट शिष्य स्वामी गणेशपुरी जी द्वारा वीर विनोद के मंगलाचरण में अपने गुरु को समर्पित स्तुति:

।।भाषा गुरु मिश्रण चारण सूर्यमल्ल स्तुति।।
।।मनोहर छंद।।
मित्र सनमान, सत्यवान, स्वर ज्ञान मध्य,
इक्क न समान, कहौं का सम करेरो में?।।
प्राकृत, पिसाची, सौरसेनि, अपभ्रंस पूर्न,
होसु हैं न, ह्वैं न हर हायन लौं हेरो मैं।।
देख्यो मुहि दीन विद्या दीन्ह त्यौं विवेक दीन्ह,
दिग्घ बर दीन्ह, घन आनंद को घेरो मैं।।
बारन बदन बर चारन बरन बीच,
तारन तरन रविमल्ल चर्न चेरो मैं।।
।।दोहा।।
सूर्यमल्ल के अट्ठ शिष, अट्ठ ग्रहन सम ओर।।
मैं सबहिन में मंदमति, जांनहु जिगनु जोर।।

सूर्यमल्ल मिश्रण द्वारा स्वामी गणेशपुरी जी को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार करने का घटनाक्रम भी बड़ा रोचक है।

गाँव चारणवास में जन्मे गणेशपुरी जी (1826 – 1946) का गृहस्थ नाम गुलाबदान पालावत था। छोटे से गाँव में शिक्षा प्राप्ति का कोई साधन नहीं होने से सारे किशोर अपने घर पर काम करते थे। गुलाबदान भी घर में पशुपालन का कार्य होने से गाय-भेंस चराने जाता था। संयोग से एक दिन जब यह किशोर जंगल से पशु चराकर वापस लौटते हुए अलमस्ती में एक भेंसे की पीठ पर सवार होकर गाँव की और आ रहा था कि गाँव में आये एक विद्वान मेहमान ने ताना मारा कि “ये क्या कवियों के कुल में पैदा होकर लाख-पसाव में प्राप्त घोड़े पर नहीं बैठ कर पाडे पर बैठे हो?” गुलाबदान को यह बात चुभ गयी। वह विद्याभ्यास करने को मचल उठा।

असामान्य व्याकुलता से ग्रस्त किशोर विद्या प्राप्ति के लिए महाकवि सूर्यमल्ल मिश्रण से मिलने बूंदी चला आया। जब उसने महाकवि के द्वार पर दस्तक दी तो भीतर से उनके नौकर ने आकर पूछा कि “आप कौन हैं और किस सबब से कवि से मिलना चाहते हैं?” प्रत्युतर में आशार्थी ने अपना नाम गुलाबदान बताकर कहा कि “मुझे महाकवि की छत्रछाया में ठौर चाहिए ताकि में भी काव्य विद्या में पारंगत हो सकूं।” नौकर ने जब भीतर जाकर आगंतुक के आने का आशय बताया तो कवि ने अविलम्ब कहा कि जाकर पूछो कि “वह नौजवान कहाँ तक पढ़ा है?” गुलाबदान के यह कहने पर कि विद्या सीखने ही इस दर पर आया हूँ। कहते हैं अपनी अहद के चलते सूर्यमल्ल ने यह कहलाकर मिलना स्वीकार नहीं किया कि “सूर्यमल्ल अनपढ़ से बात नहीं करता” इस पर वह युवक वहाँ से चल पड़ा और सीधे ही काशी चला गया और वहाँ से पांच वर्ष तक संस्कृत का अध्ययन कर फिर से महाकवि के द्वार पर उसी जिज्ञासा से आया। कहा जाता है की पूर्व का द्रश्य जस का तस दुहराया गया यद्यपि नौकर अवश्य बदल गया था पर कवि का कथन वही था।

जब नौकर ने आकर युवक से पढाई बाबत पूछा तो उसने पूरे धैर्य से कहलवाया कि “ककहरा सीखा है अब आपके सानिध्य में रहूंगा तो आवश्यक काव्य ज्ञान भी पा लूंगा।” ऐसा सुनकर सूर्यमल्ल ने कहा कि “अच्छा! यदि ऐसा है तो उसे आने दो।”

गुरु शिष्य का यह सामान्य मिलन कालांतर में महामिलन सिद्ध हुआ। समय की गति का कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकता कि इतने जिज्ञासु भाव से काव्य विद्या सीखने वाला गुलाबदान किसी दिन कविता ही नहीं इस जगत से भी उदासीन हो जाएगा। वैराग्य के भाव का उठना था, उठा और गुलाबदान पालावत नामक इस दानिशमंद कवि का कायाकल्प पहले यति गणेशपुरी नामक वानप्रस्थी के रूप में हुआ जो अंततः स्वामी गणेशपुरी के नाम से सुप्रसिद्ध हुए।

स्वामी गणेशपुरी जी ने मारू महराण, भर्त्रहरी शतक, जीवन मूल, वीर विनोद (कर्ण पर्व) सहित कई स्फुट काव्यों की रचनाएँ की।

 

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