सूर्यमलजी का मौजी स्वभाव

विश्वविख्यात ग्रंथ वंशभास्कर के रचयिता महाकवि सूर्यमलजी बहुत ही मनमौजी स्वभाव के कविराजा थे और उन्हे मद्यपान का बहुत ही शौक था, उनके लिऐ तत्कालीन समय के राजन्य वर्ग व कुलीन खानदान के मित्रगण अच्छी किस्म की अति उम्दा आसव कढवा कर भिजवाते ही रहते थे। इसी क्रम मे ऐक बार भिणाय के राजा बलवन्तसिंह जी ने इनकी सेवा में बहुत ही मधुर मद्य भेजा था, जिसकी प्रशंसा में सूर्यमलजी ने उनको ऐक कवित्त लिखकर भेजा था। यथाः……….

।।कवित्त।।

मोद कर ऐसो मधु मधुर पठायो भूप,
छायो बैठ केतकी गुलाब सुम छाजे पै।
स्वाद पुनि सरस सुधाहू तें सुहायो सूम,
लाखन के लखत नमायो बैन लाजे पै।
ज्यों ज्यों रविमल्लको नजीक नियरायो गेह,
त्यों त्यों होय मोहित सुगन्धि सुख ताजे पै।
आये जानि आसव हमारे बलवन्त आये,
भैरव भवानी दोरि दोरि दरवाजे पै।।

उपरोक्त कवित्त का मंचन कोटा के रंगकर्मी श्री राजेंद्र पांचाल ने अपने प्रसिद्ध नाट्य “कथा सुकवि की” में बहुत प्रभावशाली ढंग से किया है।
~~राजेन्द्रसिंह कविया संतोषपुरा (सीकर)

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