🌹सूर्यनारायण स्तुति🌹-कविराज नवलदानजी आसिया (खांण)

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💐दोहा💐
विमल जगतकर कर विमल, अल सुख भगत उदेश|
नित्यानंद प्रकाशनित, नित भजहू नवलेश||

🌹छंद रेणंकी🌹
नित नित नवलेश शेश कर समरन, जुग अशेश कर क्लेश जरे|
सुमिरत अमरेश शेश पुनि शारद, ध्यांन धनेश गणेश धरे|
विलसत दश देश बेस बल व्यापक, प्रगट विग्यान अग्यान परे|
दिनकर कर निकर उदयगिरि ऊपर, होय उदयकर तिमिर हरे||१

सरवर पशु पंछि प्रकर तरवर सब, गहर होत लखि कर गहरं|
हरखत नर अमर दरसकर तमहर, कमल परस कर हुलस करं|
डरपत निसिचर जु दुरत गिरि कंदर, पर प्रकास जब देख परे|
दिनकर कर निकर उदयगिरि ऊपर, होय उदयकर तिमिर हरे||२

परसत ना दरश वस्तु करतल पर, दूर पूर जल थल दरसे|
पावत कल जंतु विकल मति पावन, बिमल हजुर नूर वरसे|
विकसत चित मरम परम जोगेस्वर, हरिजन धरम धजा फहरे|
दिनकर कर निकर उदयगिरि ऊपर, होय उदयकर तिमिर हरे||३

बैरी तन रोग ओघ जिहि व्यापत, करम भोग केहि भांत कटे|
प्रगट्यां तोहि जोत पहर एक पूरन, होय चैन रूज दूर हटे|
गंगा जल हुकम होत नर गौरव, स्नान पान धुनि जय उचरे|
दिनकर कर निकर उदयगिरि ऊपर, होय उदयकर तिमिर हरे||४

प्राची दिसि परम सहस कर प्रगटत, मिटत करम तसकर मरमं|
हुलसत जन सकल हरिय हरसो सत, भजत तमर तमचर भरमं|
पावन कर करम परम मुनि पुंगव, धरम वरम तन धीर धरे|
दिनकर कर निकर उदयगिरि ऊपर, होय उदयकर तिमिर हरे||५

भळळळळ रूप विमळ जग भ्राजत, झळळ तेज अंबार झरे|
खळळळ उडुगन जु होत तप खर भर, हलल इन्द्र झल झलक हरे|
दीपक खधोत होत अति दुर्बल, कहा जोत कोउ रतन करे|
दिनकर कर निकर उदयगिरि ऊपर, होय उदयकर तिमिर हरे||६

ब्रह्मादिक देव भेव जस गावत, सेव एव मुनि तोहि उचरे|
चाढत जल रमल अमल मन साधक, ध्यान उलट भट सिध्ध धरे|
बंदत कर जोरि निहोरि पुरूस वर, पोरि सुरग चढि जात परे|
दिनकर कर निकर उदयगिरि ऊपर, होय उदयकर तिमिर हरे||७

गायि गुनगाथ सनाथ करन घट, नाथ माथ तोहि नमन करो|
जीतों भाराथ साथ किंकर जम, विजय विजय जिमि विजय वरों|
पूरन समरत्थ हाथ धर सिर पर, ताप जनम अरु मरन टरे|
दिनकर कर निकर उदयगिरि ऊपर, होय उदयकर तिमिर हरे||८

🌸कलस छप्पय🌸
सूर दिवाकर भानु, विरोचन वधन तिमिरहर|
उल्हरश्मि तिग्मांशुं ,हंस हरि जगद्रग दिनकर|
मिहिर रूपतग पतंग, सहसकर ईन विभाकर|
दिनमनि अंबरमनिय,तरनी सविता सु अंसुधर|
चौबीस नाम रवि जाम तक, सुरति सुमति प्रातहि जपहि|
विधि कहत नवल भव सिंधु बिच, त्रिविध ताप कबहू न तपहिं||

🌹घनाक्षरी🌹
राज से दराज कौन राजा महाराज राज, राना राव रंकन पे सासन तमारी है|
धरम धुरंधर धनेश दृढ जोती धीर, धरनी धरैया सुख धाम न्यायधारी है|
बदे नवलेश बलवंत तौ बिलंद बाहु वेद ब्रहमांड बीर बिरद बिचारी है|
होनहार हारन हजारन हिमायत तें, हरि हरि हरि एक अरजी हमारी है||

🌹दोहा🌹
जग कारन जो ज्योतमय, जपत वेद जस जास|
प्रबल प्रतक्ष प्रमान है, परमेश्वर बुध पास||१
खल अरु अलख हि अलख लखि, अगम रु सगम उचार|
वदि सत्यारथ कवय बरू, बिलखहु भ्रमहि निवार||२
देव देव दिनकर द्रस्यां, दुरबल सकल द्रशाय|
तोंग प्रतख परमान तज, लघु अनुमान लगाय||३
लहत स्वारथी लक्षणा, तजहु ताहि बुध तंत|
जहत स्वारथी है जगत, समझत सुमतिय संत||४
अस्ति भाति प्रिय अचल, वदत राह वेदांत|
आतम परमातम उभय, भांन जांन तजि भ्रांत||५
बिंब और प्रतिबिम्ब का, परम न्याय जब पाय|
सायुज मुगती संभवे, बिन रवि मति न वसाय||६
रवि ससि द्रग वैराट की, पढत जु वेद पुरान|
कृत्य अशुभ लखि क्रोध कर, जाहि ग्रहण कह जान||७

~~कविराज नवलदानजी आसिया (खांण)

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