कोटा मे क्रांति के सूत्रधार कविराजा दुर्गादान

‘मैं देश सेवा को अति उत्कृष्ट आदरणीय मनुष्य धर्म समझता हूं’, इन शब्दों में स्वतंत्रता की अमिट लालसा तो थी ही, साथ ही पराधीनता के दौर में औपनिवेशिक सरकार को दी गई चुनौती की एक लिखित स्वीकारोक्ति भी थी, जो रियासतयुगीन कोटा के प्रमुख जागीरदार कविराजा दुर्गादानजी द्वारा 20 दिसंबर 1920 ई. को कोटा रियासत के दीवान ओंकारसिंहजी को प्रेषित एक पत्र में उल्लेखित थी। वास्तव में 1920 ई. का दशक स्वतंत्रता संग्राम के एक लोमहर्षक युग का प्रवर्तक था। जब रोलेट एक्ट द्वारा क्रांतिकारियों पर दमनचक्र के आर्तनाद की छाया में महात्मा गांधी के आंदोंलनों की शुरुआत थी, वहीं रिवोल्युशनरी सोशलिस्ट पार्टी पंडित चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में बंगला क्रांतिकारी वीरेंद्र घोष के मार्ग निर्देशन में शक्ति प्रदर्शन से ब्रिटिश साम्राज्यवाद पर संघात कर रही थी।[…]

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मध्यकालीन राजस्थानी काव्य में रामभक्ति परंपरा

….कविवर हमीरजी रतनू के शब्दों में–
कह तपनीय पीतरंग कुरमदन, जातरूप कल़धोत जथा।
लाख जुग लग काट न लागै, कल़ंक न लागै रांम कथा।।
इस काट रहित कथा को आधार मानकर राजस्थानी कवियों ने राम महिमा और नाम निर्देशन का जो सुभग संदेश जनमानस को दिया है उनमें मेहारामायण (मेहा गोदारा), रामरासो (माधोदास दधवाड़िया) दूहा दसरथराउत रा (पृथ्वीराज राठौड़), रामरासो (सुरजन पूनिया), रामरासो रसायन (केसराज), रामरास (रूपदेवी), रामसुयश (केसोदास गाडण), रुघरास (रघुनाथ मुंहता) भक्तमाल (ब्रह्मदास बीठू), रुघनाथ रूपक (मंछाराम सेवग), रघुवर जस प्रकाश (किसनाजी आढा), के साथ नरहरिदास बारठ, पीरदान लाल़स प्रभृति नाम गिनाएं जा सकते हैं….

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मेरे वचनों की आबरू

पश्चिमी राजस्थान में गौधन की रक्षार्थ जितने प्राण इस धरा के सपूतों ने दिए हैं, उतने उदाहरण शायद अन्यत्र सुनने या पढ़ने में नहीं आए। बांठै-बांठै के पास अड़ीखंभ खड़ी पाषाण मूर्तियों के निर्जीव उणियारों पर स्वाभिमान व जनहितैष्णा-पूर्ति की आभा आज भी आलोकित होती हुई दिखाई देती है।
इस इलाके की अगर हम सांस्कृतिक यात्रा करें तो हमें ऐसे-ऐसे नर-नारियों के निर्मल चरित्र को सुनने का सौभाग्य प्राप्त होता है जिनका नामोल्लेख किताबों में नहीं मिलता।
ऐसी ही एक अल्पज्ञात कहानी है ऊजल़ां की हरखां माऊ की।[…]

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मेरा यही पश्चाताप है

…क्या कारण है कि लोक में यह मनस्विनियां देवियों के रूप में समादृत होकर सर्वसमाज में स्वीकार्य है?

इसका सीधासाधा कारण यही है कि इन मनस्विनियों ने अपना जीवन लोकहिताय समर्पित किया। जो अपना जीवन लोकहिताय जीते हैं और लोकहितार्थ ही समर्पित करते हैं। लोक उन्हीं को अपना नायक मानकर उनकी स्मृतियां अपने मानसपटल पर सदैव के लिए अंकित रखता है।

ऐसी ही एक घटना है मा सभाई की।[…]

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इनसे तो देव ही डरते हैं तो फिर

स्वमान व सत्य के प्रति आग्रही जितने चारण रहे हैं उतने अन्य नहीं। इनके सामने जब सत्य व स्वमान के रक्षण का संकट आसीन हुआ तब-तब इन्होंने निसंकोच उनकी रक्षार्थ अपने प्राण अर्पण में भी संकोच नहीं किया। चारणों ने सदैव अपने हृदय में इस दृढ़ धारणा को धारित किया कि सत्य सार्वभौमिक, शाश्वत, व अटल होता है। यही कारण था कि इन्होंने कभी भी सत्य के समक्ष असत्य को नहीं स्वीकारा। यही नहीं इन्होंने तो सदैव लोकमानस को यह प्रेरणा दी कि- ‘प्राणादपि प्रत्ययो रक्षितव्य’
यानी प्राण देकर भी विश्वास बनाए रखना चाहिए।[…]

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मेरे कानों के लोल़िये तोड़े तो तोड़ लेना

जब-जब सत्ता मदांध हुई तब-तब जन सामान्य पर अत्याचारों का कहर टूटा है। राजस्थान के मध्यकालीन इतिहास के गर्द में ऐसी अनेक घटनाएं दबी पड़ी है जिनका उल्लेख इतिहास ग्रंथों व ख्यातों के पन्नों से ओझल है परंतु लोकमानस ने उन घटनाओं का विवरण अपने कंठाग्र रखा तथा पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित करता रहा है। यही कारण है कि उक्त घटनाएं लोकजीव्हा पर आसीन रहकर भूत से वर्तमान तक की सहज यात्रा करती रही है।
हालांकि बीकानेर के शासकों के अपनी जनता के साथ मधुर संबंध रहें थे लेकिन दो-तीन शासकों के समय में इन संबंधों में कड़वाहट तब आई जब कान के कच्चे शासकों ने कुटिल सलाहकारों की सलाह अनुसार आचरण किया। ऐसे में उस सलाह के भयावह परिणाम आए तथा शासक अपयश के भागी बने।
ऐसी ही एक घटना बीकानेर महाराजा रतनसिंहजी के समय सींथल गांव में घटी।[…]

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ईश्वर से प्रश्न पूछने के साहसी भक्ति कवि ईसरदास. . .। – तेजस मुंगेरिया

…इसी भक्ति काव्य की डिंगल़ काव्य परम्परा में ईसरदास भादरेश का नाम अग्रगण्य है। ईसरदास के भक्ति काव्य में समन्वय का महान् सूत्र समाहित है जो तुलसीदास के समन्वय से भी व्यापक व विशाल है। यहाँ इन दो कवियों के काव्य में तुलना करना इसलिए समीचीन है क्योंकि अक्सर तुलसी के संबंध में हजारीप्रसाद द्विवेदी के समन्वय विषयक तथ्य को चटकारे लेकर सुनाया जाता है जबकि ईसरदास के काव्य में शामिल नाथपंथी प्रभाव तथा एक ही ग्रंथ (हरिरस) में निर्गुण तथा सगुण का समान रूप से पोषण तथा सबसे अलहदा बात कि मातृ काव्य (देवियाँण) तथा वीर काव्य (हाला झाला रा कुण्डलिया) का तुलसी के काव्य में सर्वथा अभाव है।…

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शरणागत की रक्षार्थ प्राण अर्पित किए- (मा पुनसरी एक परिचय)

हमारी संस्कृति के मूलाधार गुणों में से एक गुण है शरणागत की रक्षा अपने प्राण देकर भी करना। ऐसे उदाहरणो की आभा से हमारा इतिहास व साहित्य आलोकित रहा है, जिसका उजास सदैव सद्कर्मों हेतु हमारा पथ प्रशस्त करता है।

जब हम अन्य महापुरूषों के साथ-साथ चारण मनस्विनियों के चरित्र का पठन या श्रवण करते हैं तो ऐसे उदाहरण हमारे समक्ष उभरकर आते हैं कि हमारा सिर बिना किसी ऊहापोह के उनके चरणकमलों में नतमस्तक हो जाता है।

ऐसी ही एक कहानी है गुजरात के कच्छ प्रदेश की त्याग व दया की प्रतिमूर्ति मा पुनसरी (पुनश्री) की।[…]

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सबै मिनख है एक सम (मा जानबाई एक परिचय)

…जब हम चारण देवियों का इतिहास पढ़ते हैं अथवा सुनते हैं तो हमारे समक्ष ऐसी कई देवियों के चारू चरित्र की चंद्रिका चमकती हुई दृष्टिगोचर होती है जिन्होंने साधारणजनों तथा खुद की संतति में कोई भेदभाव नहीं किया।

जिस छुआछूत को आजादी के इतने वर्षों बाद भी अथक प्रयासों के बावजूद हमारी सरकारें पूर्णरूपेण उन्मूलन नहीं कर सकी उसे हमारी देवियों ने पंद्रहवीं सदी व अठारहवीं सदी में ही अपने घर से सर्वथा उठा दिया था।

ऐसी ही एक देवी हुई है जानबाई। जिन्होंने छूआछूत को मनुष्य मात्र के लिए अभिशाप माना तथा उन्होंने इस अभिशिप्त अध्याय का पटाक्षेप अपने गांव डेरड़ी से किया।…

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दीपै वारां देस, ज्यारां साहित जगमगै (एक) – डॉ. रेवंत दान बारहट

…राजस्थानी भाषा के इन युवा कवियों के बीच एक नौजवान और प्रगतिशील कविता की उभरती हुई बुलंद आवाज है-तेजस मुंगेरिया की।

यथा नाम तथा गुण। गिरधर दान जी के शब्दों में कहूं तो ‘बीज की बाजरी ‘ अर्थात बहुत ही अनमोल।

तेजस मुंगेरिया राजस्थानी कविता और खासकर डिंगल की उस प्राचीन विशिष्ट काव्य शैली का भरोसेमंद नाम है।…

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