तूंकारो कवि ज्यूं तवै

कवि नै शास्त्रां में स्वयंभू अर निरंकुश मान्यो गयो। यानी कवि रो दर्जो ऊंचो मानीज्यो है। आपां राजस्थानी रो काव्य मध्यकाल़ सूं लेयर आज तांई रो, वो काव्य पढ़ां जिणमें नायक रै गुणां-अवगुणां री चर्चा है तो आ बात सोल़ै आना सही है कै कवि नायक नै तूंकारै सूं ई संबोधित कियो है। काव्य रो नायक, भलांई कोई गढपति हुवो कै भलांई गडाल़पति। उण, उणांनै तूंकारै सूं ई संबोधित कियो है। डिंगल़ कवियां तो अठै तक कैयी है कै जे तमाखू में घी रल़ायर चिलम पीवोला तो जैर हुय जावैला अर जे कविता में नायक नै जी सूं संबोधित कर रैया हो तो कविता में दूषण मान्यो जावैला-[…]

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नाथी का बाड़ा के निमित्त

किसी भी भाषा के मुहावरे एवं कहावतें उस भाषा के सांस्कृतिक इतिहास एवं सामाजिक विकास की कहानी के साक्षी होते हैं। इन कहावतों में उस क्षेत्र के लोगों की मानसिकता भी परिलक्षित होती है। हमारे यहां पुरुष प्रधान मानसिकता हावी रही है अतः बहुधा उसके प्रभाव से कहावतों के निर्माण को देखा समझा जा सकता है। पापां बाई रो राज,  नाथी रो बाड़ो, खाला रो घर, पेमली रा परचा आदि कहावतों के पीछे भी कहीं न कहीं हमारी कुंठाओं का हाथ है।[…]

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मैं ही तो मोरवड़ा गांव हूं

मैं ही तो मोरवड़ा गांव हूं। हां भावों के अतिरेक में हूं तभी तो यह मैं भूल ही गया कि आप मुझे नहीं जानतें। क्योंकि मेरा इतिहास में कहीं नाम अंकित नहीं है। होता भी कैसे ?यह किन्हीं नामधारियों का गांव नहीं रहा है। मैं तो जनसाधारण का गांव रहा हूं जिनका इतिहास होते हुए भी इतिहास नहीं होता। इतिहास सदैव बड़ों का लिखा व लिखाया जाता है। छोटों का कैसा इतिहास?वे तो अपने खमीर के कारण जमीर को जीवित रखने के यत्नों में खटते हुए चलें जाते हैं।…

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मोरवड़ा मे सांसण की मर्यादा रक्षार्थ गैरां माऊ का जमर व 9 चारणों का बलिदान (ई. स.1921)

प्रसंग: सिरोही राज्य पर महाराव केशरीसिंह का शासन था। राज्य आर्थिक तंगी से गुजर रहा था। राज्य की माली हालात सुधारने के नाम पर खजाना भरने की जुगत में दरबार ने कई नये कर लगाकर उनकी वसूली करने का दबाव बनाया। जिन लोगों को कर वसूल करने की जिम्मेदारी दी उन्होंने पुरानी मर्यादाओं और कानून कायदों की धज्जियां उड़ाते हुए उल्टी सीधी एवं जोर जबरदस्ती से कर वसूल करना शुरू कर दिया।

इसी कर-वसूली के लिए एक जत्था मोरवड़ा गाँव मे भी आया। मोरवड़ा गाँव महिया चारणों का सांसण मे दिया गाँव था। सांसण गांम हर प्रकार के कर से एवं राजाज्ञा से मुक्त होता है। ये बात जानते हुए भी दरबार के आदमियों ने आकर लोगों को इकठ्ठा किया और टैक्स चुकाने का दबाव बनाया। गाँव के बुजुर्गों ने उन्हे समझाया कि ये तो सांसण गांव है! हर भांति के कर-लगान इत्यादि से मुक्त, आप यहाँ नाहक ही आए! यहाँ सिरोही राज्य के कानून नहीं बल्कि हमारे ही कानून चलते हें और यही विधान है।[…]

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लक्ष्मणदान कविया खैण – परिचय

…आज राजस्थानी में लिखै घणा ई है पण उणांरो लिख्यो पढां जणै सावजोग समझ सकां कै ऐ कवि वैचारिक कुंडाल़िए सूं बारै आय’र जनमन नै समझण अर उणरी कोठै में उपजी नै आपरै होठै लावण सूं शंकै। पण जनमन नै समझ’र उणरी अंतस भावना नै आपरै आखरां पिरोय बिनां हाण लाभ रै फिकर में जन जाजम माथै राखी है उणांमें लक्ष्मणदान कविया खैण रो नाम हरोल़ में है। साहित्य मनीषी कन्हैयालाल सेठिया रै आखरां में “लक्ष्मणदान कविया राजस्थानी रा लोककवि है। आंरी कवितावां जुगबोध अर जुग चेतना सूं जुड़्योड़ी है।” जिण कवि री कवितावां जुगबोध अर जुग चेतना सूं जुड़ी थकी है उवो कवि इज सही अरथां में लोककवि है।…

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राजस्थानी लोक मानस में गाँधी

राजस्थानी लोक जीवन में एक लोकोक्ति प्रसिद्ध है कि ‘‘ज्यांरी सोभा जगत में, वांरो जीवण धन्न’’ अर्थात इस संसार में उन्हीं लोगों का जीवन धन्य माना जाता है, जिनकी सुकृति की शोभा लोकजिह्वा पर विराजमान रहती है। इस दृष्टि से विचार किया जाए तो विगत एक सदी में लोककंठ पर किसी एक व्यक्ति की सर्वाधिक शोभा विराजमान रही है तो वह नाम है- श्री मोहनदास कर्मचंद गाँधी। राष्ट्रपिता के विरुद से विभूषित महान व्यक्तित्व के धनी महात्मा गाँधी अपनी रहनी-कहनी की एकरूपता, उदात्त जीवन-दृष्टि, मानवीय मूल्यों के प्रति दृढ़ निष्ठा, सत्य में अडिग विश्वास, आत्मबल की पराकाष्ठा, राष्ट्र के प्रति अनुराग, वक्त की नजाकत को पहचानने के कौशल, अन्याय के प्रबल प्रतिकार और अहिंसा के सबल समर्थन इत्यादि वैयक्तिक विशिष्टताओं के कारण भारतीय लोकमानस पर अपनी अमिट छाप छोड़ने में साफल्यमंडित हुए। […]

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राजस्थानी लोककथाओं के आधुनिक रूपांतर का पर्याय: श्री बिज्जी

जब हम राजस्थानी कथा साहित्य एवं लोक साहित्य की बात करते हैं तो पद्मश्री विजयदान देथा का नाम अनायास ही हमारी जुबां पर आ जाता है। अेक व्यक्ति जिसने अपनी श्रमनिष्ठ साधना के बल पर राजस्थानी लोक साहित्य को वैश्विक ख्याति दिलाने का श्लाघनीय कार्य किया। इतिहास इस बात का साक्षी है कि कवीन्द्र रवीन्द्र नाथ ठाकुर के बाद हिंदुस्तान के किसी साहित्यकार को साहित्य के क्षेत्र में नोबल पुरस्कार नहीं मिल पाया। यद्यपि श्री विजयदान देथा जी भी नोबल पुरस्कार प्राप्त नहीं कर पाए लेकिन उन्होंने अपने रचना कर्म के बल पर नोबल पुरस्कार प्रदात्री समिति का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया। जिसका सुखद परिणाम यह हुआ कि राजस्थानी भाषा के किसी साहित्यकार का नाम नोबल पुरस्कार हेतु नामित हुआ और वह नाम और कोई नहीं श्री बिज्जी का नाम था।[…]

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कोटा मे क्रांति के सूत्रधार कविराजा दुर्गादान

‘मैं देश सेवा को अति उत्कृष्ट आदरणीय मनुष्य धर्म समझता हूं’, इन शब्दों में स्वतंत्रता की अमिट लालसा तो थी ही, साथ ही पराधीनता के दौर में औपनिवेशिक सरकार को दी गई चुनौती की एक लिखित स्वीकारोक्ति भी थी, जो रियासतयुगीन कोटा के प्रमुख जागीरदार कविराजा दुर्गादानजी द्वारा 20 दिसंबर 1920 ई. को कोटा रियासत के दीवान ओंकारसिंहजी को प्रेषित एक पत्र में उल्लेखित थी। वास्तव में 1920 ई. का दशक स्वतंत्रता संग्राम के एक लोमहर्षक युग का प्रवर्तक था। जब रोलेट एक्ट द्वारा क्रांतिकारियों पर दमनचक्र के आर्तनाद की छाया में महात्मा गांधी के आंदोंलनों की शुरुआत थी, वहीं रिवोल्युशनरी सोशलिस्ट पार्टी पंडित चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में बंगला क्रांतिकारी वीरेंद्र घोष के मार्ग निर्देशन में शक्ति प्रदर्शन से ब्रिटिश साम्राज्यवाद पर संघात कर रही थी।[…]

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मध्यकालीन राजस्थानी काव्य में रामभक्ति परंपरा

….कविवर हमीरजी रतनू के शब्दों में–
कह तपनीय पीतरंग कुरमदन, जातरूप कल़धोत जथा।
लाख जुग लग काट न लागै, कल़ंक न लागै रांम कथा।।
इस काट रहित कथा को आधार मानकर राजस्थानी कवियों ने राम महिमा और नाम निर्देशन का जो सुभग संदेश जनमानस को दिया है उनमें मेहारामायण (मेहा गोदारा), रामरासो (माधोदास दधवाड़िया) दूहा दसरथराउत रा (पृथ्वीराज राठौड़), रामरासो (सुरजन पूनिया), रामरासो रसायन (केसराज), रामरास (रूपदेवी), रामसुयश (केसोदास गाडण), रुघरास (रघुनाथ मुंहता) भक्तमाल (ब्रह्मदास बीठू), रुघनाथ रूपक (मंछाराम सेवग), रघुवर जस प्रकाश (किसनाजी आढा), के साथ नरहरिदास बारठ, पीरदान लाल़स प्रभृति नाम गिनाएं जा सकते हैं….

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मेरे वचनों की आबरू

पश्चिमी राजस्थान में गौधन की रक्षार्थ जितने प्राण इस धरा के सपूतों ने दिए हैं, उतने उदाहरण शायद अन्यत्र सुनने या पढ़ने में नहीं आए। बांठै-बांठै के पास अड़ीखंभ खड़ी पाषाण मूर्तियों के निर्जीव उणियारों पर स्वाभिमान व जनहितैष्णा-पूर्ति की आभा आज भी आलोकित होती हुई दिखाई देती है।
इस इलाके की अगर हम सांस्कृतिक यात्रा करें तो हमें ऐसे-ऐसे नर-नारियों के निर्मल चरित्र को सुनने का सौभाग्य प्राप्त होता है जिनका नामोल्लेख किताबों में नहीं मिलता।
ऐसी ही एक अल्पज्ञात कहानी है ऊजल़ां की हरखां माऊ की।[…]

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