मन में रही उम्मेद!

राजस्थानी साहित्य रो ज्यूं-ज्यूं अध्ययन करां त्यूं-त्यूं केई ऐड़ै चारण कवियां रै विषय में जाणकारी मिलै जिकां रो आभामंडल अद्भुत अर अद्वितीय हो। जिणां आपरै कामां रै पाण इण पंक्ति नै सार्थक करी कै-

सुत होत बडो अपनी करणी, पितु वंश बडो तो कहा करिए?

पण दुजोग सूं ऐड़ै सिरै कवियां रै विषय में साहित्येतिहास में अल्प जाणकारी ईज मिलै। कारण कोई ई रह्यो हुसी पण साहित्येतिहास माथै काम करणियां ऐड़ै कवियां रै बारै में कोई ठावी जाणकारी नीं दी।
ऐड़ा ई एक सिरै कवि अर मिनखाचार सूं मंडित साहित्य मनीषी हा उम्मेदरामजी पालावत।[…]

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मौज करीनै मूल़िया!

कविवर झूंठाजी आशिया कह्यो है कै भीतां तो एक दिन धूड़ भैल़ी हुय जावैली पण गीत अमर रैवैला-

भींतड़ा ढह जाय धरती भिल़ै, गीतड़ा नह जाय कहै गांगो।

आ बात एकदम सटीक है जिण लोगां मोटी पोल़ां चिणाई उणां रा नाम आज सुणण में कदै-कदास ई आवै पण जिकां मन-महराण ज्यूं राख्यो, उणांरो नाम आज ई हथाई में नित एक-दो बार तो आ ई जावै तो ब्याव-बधावणां में ई तांत रै तणक्कां माथै उवां रा ई गीत सुणण नै मिलै क्यूंकै-

गवरीजै जस गीतड़ा, गया भींतड़ा भाज।

जिणांरा गीत प्रीत रै साथै गाईजै उवां में एक उदारमना हा मूल़जी कर्मसोत।[…]

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भइयो भाटी भैर!

दिन ऊगां दातार, आखै जस सारी इल़ा।
सूमां रो संसार, नाम न जाणै नाथिया।।

कवि कितरी सतोल अर सखरी बात कैयी है कै दातार भलांई कदै ई हुयो हुसी पण उणरो नाम सारी धरती जाणै अर सूमां रो नाम कोई लैणो ई नीं चावै। इणी खातर तो ईसरदासजी नै ई कैणो पड़्यो कै ‘दियां रा देवल़ चढै’ देवै सो अमर अर नीं देवै तो कवियां निशंक कह्यो है-

सर्वगुन ज्ञाता होय यद्यपि विधाता हो पे,
दाता जो न होय तो हमारे कौन काम को?[…]

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नवल हुतो जद नैरवै

थलवट भांयखै रो गांम जुढियो समृद्ध साहित्यिक परंपरा रै पाण आथूणै राजस्थान में आपरी ठावी ठौड़ राखै। एक सूं बध’र एक सिरै कवि इण गांम में हुया जिणां राजस्थानी डिंगल़ काव्य नै पल्लवित अर पुष्पित कियो। उणरो हाल तांई चिन्योक ई लेखो-जोखो नीं हुयो है।

इणी गांम में सिरै कवि नवलदानजी लाल़स रो जनम हुयो। जद ऐ फखत आठ वरस रा ईज हा तद इणां रै मा-बाप रो सुरगवास हुय चूको हो। चूंकि इणांरा पिताजी रेऊदानजी लाल़स पाटोदी ठाकरां रा खास मर्जीदान हा सो इणांरो आगै रो पाल़ण-पोषण उठै ईज हुयो। उठै ईज दरवेश सांईदीनजी इणांनै आखर ज्ञान दियो।[…]

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रहसी रै सुरताणिया!

वीरता अर वीर आज ई अमर है तो फखत कवियां या कविता रै पाण। क्यूंकै कवि री जबान माथै अमृत बसै अर उण जबान माथै जिको ई चढ्यो सो अमर हुयो। भलांई उण नर-नाहरां रो उजल़ियो इतियास आज जोयां ई नीं लाधै पण लोकमुख माथै उण सूरां रो सुजस प्रभात री किरणां साथै बांचीजै।

ऐड़ो ई एक वीर हुयो सुरताणजी गौड़। हालांकि कदै ई गौड़ एक विस्तृत भूभाग माथै राज करता पण समय री मार सूं तीण-बितूण हुय थाकैलै में आयग्या।

इणी गौड़ां मांय सूं ई ऐ सुरताणजी गौड़ हा।[…]

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श्री करणी माता का इतिहास – डॉ. नरेन्द्र सिंह आढ़ा

श्री करणीमाता के पिता मेहाजी जो किनिया शाखा के चारण थे। उनको मेहा मांगलिया से सुवाप नामक गाँव उदक में मिला था, जो जोधपुर जिले की फलौदी तहसील में पडता है। मेहाजी को सुवाप गाँव मिलने से पहले यह गाँव सुवा ब्राह्मण की ढाणी कहलाता था। बाद में मेहाजी ने इस गाँव का नाम बदलकर सुवाप रखा था। इसी गाँव में लोकदेवी श्रीकरणीमाता का जन्म हुआ।

मेहाजी किनिया का विवाह बाड़मेर के मालाणी परगने में अवस्थित वर्तमान बाड़मेर जिले के बालोतरा के पास आढ़ाणा (असाढ़ा) नामक एक प्राचीन गाँव के स्वामी माढा आढ़ा के पुत्र चकलू आढ़ा की पुत्री देवल देवी के साथ हुआ था। कुछ लोग इस प्राचीन गाँव का उल्लेख जैसलमेर की सीमा पर स्थित ओढाणिया गाँव के रूप में भी करते है जो कि एक शोध का विषय है। निष्कर्षतः यह विवाह वि.सं. 1422-23 के आस-पास हुआ था। इस आढ़ी देवल देवी को भी चारण जाति में शक्ति का अवतार माना जाता है।[…]

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ભગવતી આઈ શ્રી જીવામાં – લખીયાવીરા (भगवती आई श्री जीवा मां-लाखीयावीरा)

માતૃપૂજાની શરૂઆત તો સૃષ્ટિના આરંભ સાથે જ થઈ હશે. ભારતમાં તો આદિકાળથી જ માતૃપૂજા થતી આવી છે.

ઋગ્વદમાં પણ જગદંબાને સર્વદેવોના અધિષ્ઠાત્રી આધાર સ્વરૂપ, સર્વને ધારણ કરનારા સચ્ચિદાનંદમયી શક્તિ સ્વરૂપે વર્ણવ્યા છે.

ચારણ આઈઓની ઉજળી ગૌરવશાળી અને ભવ્ય પરંપરા રહી છે. ચારણ તો મુળથી જ જગદંબાનો ઉપાસક રહ્યો છે. તેથી જ ચારણ દેવીપુત્રલેખાય છે. દેવી ઉપાસનાને કારણે જ ચારણોમાં નારીને ભાગ્યા નહીં પુજનીય ગણવામાં આવે છે. સ્ત્રી સન્માનને કારણે જ ચારણ પુત્રીઓ તપ – સાધના – આરાધના કરી આઈનું જગદંબાનું પદ પામી પુરાવા લાગી. ચારણોનું આ નારીતત્ત્વ સંયમ, શીલ, સદાચાર, માનવપ્રેમ, વિઘાર્થન, નિયમ અને તપને કારણે પ્રાપ્ત થયેલી આત્મશક્તિને આભારી છે અને એટલે જ કદાચ આવી ચારણપુત્રીઓ પરમ શક્તિની વાહક બની છે. તેમની આત્મશક્તિ એવી હતી કે તેઓ જે વચન બોલી જાય તેને સાચા પાડવા પ્રકૃતિને પણ તેનો નિયમબદલવો પડે. એટલે જ મેઘાણીજી નોંધે છે કે “આવું નારીતત્ત્વ જગતના ઈતિહાસના અન્ય કોઈ વિર સ્તુતીકાર સંસ્થા સાથે જોડાયેલું જડતું નથી.”[…]

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जद छूटै जालोर!

दूहा लोहा सरिस दुहुं, वडौ भेद इक एह।
दूहो वेधै चित्त नै, लोहा भेदे देह।।

यानी दोहा अर लोहा री मार एक सरीखी। एक चित्त नै वेधै तो दूजो देह नै। पण लोह तो हरएक रै घाव कर सकै पण दूहो फखत समझै उणनै ईज सालै। इतिहास में ऐड़ा अनेकूं दाखला मिलै कै दूहे इतिहास बदल़ दियो। लोगां री दिनचर्या बदल़दी।[…]

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कविता रो प्रभाव

दूहो दसमो वेद,
समझै तैनै साल्है।

काव्य मर्मज्ञां दूहै नै दसमे वेद री संज्ञा दी अर कह्यो कै ओ फखत उणरै काल़जै नै ईज छूवै जिको इणरो मर्म जाणतो हुवै !नीतर आंधै कुत्तै खोल़ण ही खीर वाल़ी बात है। जिणांरै सातै सुआवड़ी हुवै उणांरै दूहे रो मर्म नैड़ैकर ई नीं निकल़ै पण जिकै रै नैड़ैकर निकल़ै, उणनै ओ चित नै चकित करै तो साथै ई चैन ई देवै। आ ई नीं ओ उणरै दिल में दरद उपावै तो साथै ई दवा पण करै-

दूहो चित चक्रित करै, दूहो चित रो चैन।
दूहो दरद उपावही, दूहो दारू ऐन।।[…]

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न्यात न्यात में होवत नाथो!

जोधपुर माथै महाराजा सूरसिंहजी रो राज। सूरसिंहजी रै खास मर्जीदानां मांय सूं एक पुष्करणा ब्राह्मण नाथोजी व्यास ई हा। नेकदिल अर उदारमना मिनख। उणांरै एकाएक बाई ही। दिन लागां बाई परणावण सावै हुई।

बेटी मोटी हुवै जणै बाप सूं पैला मा नै चिंता हुवै। इणी चिंता रै वशीभूत एक दिन गुराणी रै मन में जची कै हमै बाई रा हाथ पील़ा कर दैणा चाहीजै। इण सारू एक दिन उवां व्यासजी नै कह्यो कै –
“जगत में खांचिया फिरो। डूंगर बल़ता निगै आवै पण पगै नीचै सिल़गती निगै नीं आवै। बाई मोट्यार माल हुई है अर थे आंधा हुयोड़ा हो। कांई आ बोल’र कैसी कै म्हनै हमे परणावो।”[…]

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