गीत – प्रिथीराज राठौड़ रो – लक्खा बारठ रो कहियो

गीत नायक पृथ्वीराजजी राठौड़ है। जो वीर प्रकृति व प्रभु भक्ति में समरूप अनुरक्ति रखते थे। इन्होंने अकबर के कहने पर ‘वेली किसन रुकमणी री’ की ब्रजभाषा में टीका भी की थी। उस टीका की भाषा का उदाहरण रावतजी सारस्वत ने अपने विनिबंध ‘पृथ्वीराज राठौड़’ में उद्धृत किया है। लक्खाजी को थोड़ा पढ़ने पर मेरे अंतस में जची है कि छोटा ही सही इन पर एक लेख किसी पत्रिका हेतु लिखूं। बहरहाल लखावत साहब के आदेशों की पालनार्थ-

।।गीत – प्रिथीराज राठौड़ रो- लक्खा बारठ रो कहियो।।

वपि वाधै नितूं विराजै अविरच,
भले बिहुं विध उर नवली भांत।
प्रभु सूं जेतो हेत प्रिथीमल,
पैररसौ ऐतो पुरसात।।[…]

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गीत मथाणियाराय रो

।।गीत मथाणियाराय रो।।
।।गीत।।
अमर दूदहर आवियो तेड़वा ईसरी,
मया कर जोध पर आज माता।
सार कर रिड़ै-तण काज गढ सारजै,
निजर भर इमी री पाल़ नाता।।1[…]

xt-align: center;”>पहर एक प्रभात रा, अमर रुकूँली आंण।
प्रण पूरै प्रमेश्वरी, मरूधर नगर मथांण।।

।।गीत।।
अमर दूदहर आवियो तेड़वा ईसरी,
मया कर जोध पर आज माता।
सार कर रिड़ै-तण काज गढ सारजै,
निजर भर इमी री पाल़ा नाता।।1[…]

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देशाणराय रो गीत – चौथ बीठू

वेदां मह ढील रती नह वरनी।
धाबलयाल़ रही दिसी धरनी।
वीदग बेल थई वीसरनी।
किण दिस गई हमरकै करनी।।

आप तणी म्हारै अवलम्बा।
आवे मनमें घणा अचम्बा।
ईहग कूक सुणी नह अम्बा।
बोल़ी हुय बैठी जगतम्बा।।[…]

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रे बाजे समदर तीरां

।।गीत जात बुध चित्त विलास।।

रे बाजे समदर तीरां!
मादल़ डफ चंग झांझ मंजीरा!
नवलख संग नित रास रमे रव गूंजे गगन गंभीरा!
घरर घरर समदर घुघवाटे,निरमल़ उछल़त नीरा!
समदर तीरा![…]

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बोलो साच सुहाती बात

बोलो सत धार मधुर पण बोलो,
बोलो साच सुहाती बात।
व्हालां इसी कायनूं बोलो,
सुणियां सैणां नको सुहात।।

बिगड़ै संबंध बोल बाड़ां सूं,
गुण हद बिगड़ै कियां गुमेज।
तंतू नेह तणो जद तूटै,
हिरदै मिटै उफणतो हेज।।[…]

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गीत सांगा मैणा रो-कल्याण दास गाडण कहै

।।गीत मैणा सांगा रो।।
—कल्याण दास जाडावत कहै—

कड़िबांधी तणो भरोसो करतां,
तीन च्यारि लागी तरवार।
‘सांगला’ तणी कटारी साची,
मारणहार राखियो मार।।
सांगा, जो कि अपनी कड़बंध अर्थात तलवार पर हमेशा भरोसा रखता था यानी जिसे अपनी प्रहार क्षमता पर पूरा विश्वास था। भलेही उसे तीन चार प्रबल प्रहारों का सामना करना पड़ा लेकिन ऐसी विषम परिस्थिति में भी उसने अपनी कटार के वार से उस दुश्मन को मार गिराया जो उसे मारने को उद्धत था।[…]

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श्रीमद्भागवत महिमा – समानबाई कविया

श्रीमद् सब सुख दाई।
नृपति कुं श्रीसुखदेव सुनाई।।टेर।।

विप्र श्राप तैं जात अधमगति,
डरियो नृपत मन मांई।
ऐसो कोई होय जगत में,
श्रीकृष्ण लोक पंहुचाई।।1।।[…]

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बनासा री बछेरी सतेज घणेरी – समानबाई रचित बना

बनासा री बछेरी सतेज घणेरी, जीनै राम बना चढ फेरी।।टेर।।

राय आंगण बिच रिमझिम नाचै, जाणै इक इन्द्र परेरी।
हार हमेल हिया बिच सोहे, कनक लगाम खिंचेरी
बनासा री बछेरी सतेज घणेरी………….।।1।।

ओछे पांव बजाय घूघरा, मानो इक भाग्य भरेरी।
इत सूं उत पलटत छबि पावै, चपला कार करेरी
बनासा री बछेरी सतेज घणेरी………….।।2।।[…]

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कीनी क्यूं जेज इति किनियांणी!! – जंवारजी किनिया

आजकल किसी चमत्कार की बात लिखते हुए ऊहापोह की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, क्योंकि लोग अंधविश्वासी घोषित करते हुए जेज नहीं करते !! कुछ हद तक यह बात सही भी है कि आजकल स्वार्थी लोग मनगढ़ंत बातों को प्रचार का सहारा लेकर प्रसारित कर दुकानदारी चलातें हैं।

मैं आपसे उन लोगों के संस्मरण साझा कर रहा हूं जिनके हृदय में अगाध आस्था और भक्ति की भागीरथी प्रवाहित होती थी।
मेरे दादोसा (गणेशदानजी रतनू) का ननिहाल सुवाप था। वे अपने ननिहाल का एक संस्मरण सुनाते थे कि सुवाप में जंवारजी किनिया थे। उनके एक ही पुत्र था। पुत्र जवान हुआ और एक दिन दोपहर को अकस्मात काल कवलित हो गया। लोगबाग अर्थी बनाने लगे तो जंवारजी ने दृढ़ता से मना कर दिया और कहा कि “भूवा अवस हेलो सुणसी।”[…]

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मुलक सूं पलकियो काढ माता!! – विरधदानजी बारठ

।।गीत।।
उरड़ अणतार बिच वार करती इधक,
बीसहथ लारली कार बगती।
आंकड़ै अखूं आधार इक आपरो,
सांकड़ै सहायक धार सगती।।

त्रिमागल़ रोड़ती थकी आजै तुरत,
आभ नै मोड़ती मती अटकै।
रसातल़ फोड़ती थकी मत रहीजै,
गोड़ती समुंदरां असुर गटकै।।[…]

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