चौहान सूरजमल हाडा बूंदी

बून्दी का राव सूरजमल हाडा (सूर्यमल्ल) प्रसिध्द महाराणा सांगा की महाराणी कर्मवती का भाई था और सांगा के स्वर्गवास के बाद दो छोटे राजकुमार विक्रमादित्य और उदयसिंह की रक्षा व सम्हाल रणथम्भौर के किले में रहकर करता था। महाराणी कर्मवती भी वहीं रहती थी। राणा सांगा के बाद रतनसिंह द्वितीय मेवाड़ का महाराणा बना तो उसने कोठारिया के रावत पूर्णमल को रणथंभौर भेजकर बादशाह महमूद का रत्न जटित ताज और बेशकीमती कमरपट्टा, जो कि उसने महाराणा सांगा से हारने के बाद उनको भेंट किया था, अपने पास मंगाना चाहा, जिसे देने से महाराणी ने मना कर दिया तो इस बात से रतनसिंह सूर्यमल पर कुपित हुआ।[…]

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मुकंददास दधवाड़िया की वीरता का गीत

मुकंददासजी जोधपपुर महाराजा अभय सिंह के साथ अहमदाबाद की लड़ाई में शामिल थे और इस युध्द में वीरता प्रदर्शित करते हुये शौर्यपूर्वक वीरगति को प्राप्त हो गये थे।ये एक श्रैष्ठ कवि भी थे। वि.सं. १७८७ मे हुये इस युध्द में इनकी वीरगति पर हिम्मता ढोली बऴूंदा ने इनकी वीरता व शौर्य-प्रदर्शन पर एक गीत बनाया जो निम्न प्रकार है।

।।गीत।।

सतरै संम्वत सितियासियै,
भूप सजै दऴ भारी।
सबऴा करी अभा रै साथै,
त्रिजड़ां बंध तैयारी।।[…]

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पीठवा चारण और जैतमाल राठौड़

।।दोहा।।
पावन हूवौ न पीठवौ, न्हाय त्रिवेणी नीर।
हेक जैत मिऴियां हूवौ, सो निकऴंक सरीर।।

पीठवा चारण कुष्ठ रोग से पीड़ित हो गया। इस कुष्ठ रोग से बहुत ही दुःखित होकर उससे छुटकारा पाने के लिए कितने ही तीर्थादि कर आया परन्तु उसका रोग नही गया। ज्यों ज्यों दवा की, मर्ज बढता ही गया। उसने सुना कि रावल मल्लीनाथ का छोटा भाई सिवाणां का राजा जैतमाल जो कि भगवान का बड़ा भक्त था उसके स्पर्श से कोढ रौग दूर हो सकता है।[…]

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सिध्द सन्त महात्मा ईसरदासजी

अमरेली के बजाजी सरवैया के कुंवर करणजी सरवैया के विवाह के दौरान सर्पदंश से हुई असामयिक मौत पर उनके घर से अर्थी उठाकर शमशान भूमि यात्रा पर जाते समय रास्ते में विवाह समारोह में शामिल होने के लिए आते हुए महात्मा ईसरदासजी मिले। यह अणचींती बात सुनकर उनको बहुत ही आघात लगा और उन्होने अपने योग सिध्दी और तपस्याबल से कुंवर को पुनः जीवित करने का संकल्प कर अर्थी को जमीन पर रखवा कर हठयोग साधना द्वारा निम्नांकित गीत कहा:[…]

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गीत नाहरसिंह जी माथै – कवि डूंगर दान आशिया

परम श्रद्धेय ठाकुर नाहरसिंह जी माथै डिंगल़ रा सिरै कवि आदरणीय डूंगरदानजी आशिया री एक रचना- ठाकर नाहर सिंह जी जैङौ भलौ,अपणायत हितैषी अर विनम्र राजपूत इण समय में कीकर जलमीयो,ऐङा राजपूत तौ पांच सौ सातसौ वरसां पैली हुआ करता। इण भाव रौ एक गीत नजर।

।।गीत।।
पांच सातसौ वरसां पैली,
जणवा नाई खाती जाट।
जात जात री माटी जिणसूं,
घङवा लग्यो विधाता घाट।।1।।

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डिंगल़ वाणी में भगवती इंद्र बाई

माँ भगवती लीलाविहारिणी इन्द्रकुँवरी बाईसा का जन्म संवत १९६४ में हुआ था उनके भक्त कवि हिंगऴाजदानजी जागावत ने अवतरण की ऐक प्रसिध्द रचना चिरजा सृजित की है जिसमें विक्रम संवत १९६३ के आश्विन नवरात्रो में माँ हिंगऴाज के स्थान पर सभी देवियों की पार्षद भैरव सहित परिषद लगती है, उस परिषद में भैरव माँ को ज्ञापित करते हैं कि मरूधर देश में अवतार की आवश्कता है, भगवती हिंगऴाज अपनी अनुचरी आवड़ माँ को आदेश देकर सही स्थानादि बताकर मरूधरा में अवतार के लिए प्रेरित करती है व भगवती आवड़ अवतरित हो भक्तवत्सला बनती है अद्भूत कल्पना व शब्दों का संयोजन है रचना में यथाः…..

।।दोहा।।
सम्वत उन्नीसै त्रैसट्यां, साणिकपुर सामान।
शुक्ल पक्ष आसोज में, श्री हिंगऴाज सुथान।।

इसके ठीक नवमास बाद आषाढ शुक्ला नवमी को भगवती का अवतरण निर्दिष्ट स्थान पर हो जाने के बाद विभिन्न कवेसरों ने सहज सुन्दर व सरस सटीक वर्णन किया है यथा कुछ दृष्टान्त:[…]

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जोगीदास भाटी की कटारी

…..इनके पुत्र जोगीदास भाटी बड़े वीर पुरुष हुए थे और महाराजा के बड़े विश्वस्त रहे थे तथा साहस में अपने पिता से भी बढकर हुऐ थे। वि.सं.१६६८ में बादशाह जहाँगीर की फौजे दक्षिण भारत की और कूच कर रही थी, जिसमें सभी रियासतों की सेनाएं भी शामिल थी। आगरा से दक्षिण में एक जगह पड़ाव में एक विचित्र घटना घटी। आमेर के राजा मानसिंह के एक उमराव का हाथी मदोन्मत हो गया और संयोग से जोगीदास भाटी का उधर से घोड़े पर बैठकर निकलना हो गया। उस मतगयंद ने आव देखा न ताव लपक कर जोगीदास को अपनी सूंड में लपेटकर घोड़े की पीठ से उठाकर नीचे पटका और अपने दो दांतों को जोगीदास की देह में पिरोकर उपर की तरफ उठा लिया।
“जोगीदास भाटी नें हाथी के दांतों में बिंधे और पिरोये हुये शरीर से भी अपनी कटारी को निकालकर तीन प्रहार कर उस मदांध हाथी का कुंभस्थल विदीर्ण कर डाला” […]

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अवतरण अर प्रवाड़ां रो गीत

।।गीत।।
प्रथम देश जैसाण बीकाण प्रगटी पछैं,
बरजियो भांण बेड़ो उबारियो।
अबै परब्रह्म वाऴी प्रकृति अद्रजा,
धजाऴी मद्र अवतार धारियो।।1।।

बंस रतनूं धनो छात बीसोतरां,
धनो धिन मातरी मात धापू।
बाप सागर धनो सकति मा बापरो,
बाप-मह धिनो शिवदान बापू।।2।।[…]

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डिंगल काव्य केवल वीर रस प्रधान ही नहीं इसमें हास्य रस भी है-मोहन सिंह रतनू

महान भक्त कवि ओपा जी आढा को देवगढ के कुंवर राघव देव चूंडावत ने ऐक घोड़ा भेंट किया। घोड़ा बूढा एवं दुर्बल था।
इस पर कवि ने कुंवर को उलाहना स्वरूप एक गीत लिखा…देखिये सुंदर बिंनगी

धर पैंड न चालै माथो धूणै,
हाकूं केण दिसा हैराव।
दीधो सो दीठो राघव दे,
पाछो ले तूं लाख पसाव।।1[…]

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