राजस्थानी लोक मानस में गाँधी

राजस्थानी लोक जीवन में एक लोकोक्ति प्रसिद्ध है कि ‘‘ज्यांरी सोभा जगत में, वांरो जीवण धन्न’’ अर्थात इस संसार में उन्हीं लोगों का जीवन धन्य माना जाता है, जिनकी सुकृति की शोभा लोकजिह्वा पर विराजमान रहती है। इस दृष्टि से विचार किया जाए तो विगत एक सदी में लोककंठ पर किसी एक व्यक्ति की सर्वाधिक शोभा विराजमान रही है तो वह नाम है- श्री मोहनदास कर्मचंद गाँधी। राष्ट्रपिता के विरुद से विभूषित महान व्यक्तित्व के धनी महात्मा गाँधी अपनी रहनी-कहनी की एकरूपता, उदात्त जीवन-दृष्टि, मानवीय मूल्यों के प्रति दृढ़ निष्ठा, सत्य में अडिग विश्वास, आत्मबल की पराकाष्ठा, राष्ट्र के प्रति अनुराग, वक्त की नजाकत को पहचानने के कौशल, अन्याय के प्रबल प्रतिकार और अहिंसा के सबल समर्थन इत्यादि वैयक्तिक विशिष्टताओं के कारण भारतीय लोकमानस पर अपनी अमिट छाप छोड़ने में साफल्यमंडित हुए। […]

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गीत भाटी तेजमालजी रांमसिंहोत रो

इमां अथग आतंक रो घालियो अवन पर, चहुवल़ घोर अनियाव चीलो।
बहंता जातरु घरां में बाल़ पण, हियै सुण बीहता नांम हीलो।।1
असुर उण हीलियै बीहाया अनेकां, कितां नै लूंटिया सीस कूटै।
घणां रा खोसनै मार पण गीगला, लखां नै उजाड़्या लियै लूंटै।।2[…]

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भारत री छत्राणी

थारै मन री बात लाडेसर, म्हारै सूं अणजाणी के।
जे आँख्यां में पाणी ल्याऊं, भारत री छत्राणी के।

कन्त हजारी बाग जेळ में, बेटो जेळ बरेली में।
देवर जी जंगळ में भटकै, गोरा घुसिया हेली में।
जामाता जूझै गोरां सूं, सगळां मन में ठाणी के।
जे आँख्यां में पाणी ल्याऊं, भारत री छत्राणी के।[…]

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दुर्गादास राठौड़ रो गीत तेजसी खिड़िया रो कहियो

असपत नूं लिखै नवाब इनायत, दाव घाव कर थाकौ दौड़।
मारूधरा मांहै मुगलां नूं, ठौड़ ठौड़ मारै राठौड़।।

कारीगरी न लागै कांई, घाव पेच कर दीठा घात।
किलमां नूं मारता न संकै, मरवि सूं न डरै तिलमात।।[…]

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झरड़ो! पाबू सूं करड़ो!!

प्रणवीर पाबूजी राठौड़ अपने प्रण पालन के लिए वदान्य है तो उनके भतीज झरड़ा राठौड़ अपने कुल के वैरशोधन के लिए मसहूर है।
मात्र बारह वर्ष की आयु में जींदराव खीची को मारा। जींदराव की पत्नी पेमां जो स्वयं जींदराव की नीचता से क्रोधित थी और इस इंतजार में थी कि कब उसका भतीजा आए और अपने वंश का वैर ले। संयोग से एकदिन झरड़ा जायल आ ही गया। जब पेमल को किसी ने बताया कि एक बालक तलाई की पाल़ पर बैठा है और उसकी मुखाकृति तुम्हारे भाईयों से मिलती है। पेमल की खुशी की ठिकाना नहीं रहा। वो उसके पास गई। उसकी मुखाकृति देखकर पहचान गई तो साथ ही उसकी दृढ़ता देखकर आश्वस्त भी हो गई कि यह निश्चित रूप से वैरशोधन कर लेगा।[…]

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प्रताप – प्रशंसा

।।गीत चित इलोल़।।
इक इकां सूं हुवा आगल़
पुणां बप्पां पूत।
माण कज रण बीच मूवा
रूक ले रजपूत।
तो रजपूतजी रजपूत रंग धर राजिया रजपूत।।१[…]

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संवेदनाओं के पर्याय महाकवि पृथ्वीराज राठौड़

आज राजस्थान और राजस्थानी जिन महान साहित्यकारों पर गौरव और गर्व करती है उनमें से अग्रपंक्ति का एक नाम हैं पृथ्वीराजजी राठौड़

बीकानेर की साहित्यिक और सांस्कृतिक धरोहर के धोरी और धुरी थे पृथ्वीराजजी राठौड़। इसलिए तो महाकवि उदयराजजी उज्ज्वल लिखतें हैं-

नारायण नै नित्त, वाल्ही पीथल री धरा।
सुरसत लिछमी सत्थ, ऐथ सदा वासो उदय।।[…]

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सबसूं है मोहन सिरमोड़ !

गीत – वेलियो
मोहन बल़ तणी बात आ महियल़,
लखियो नकूं कोई लवलेश।
डिगतो बह्यो डांग कल़ डोकर,
अधपतियां करियो आदेश।।1

बीजो बुद्ध अवतरियो बसुधा,
अहिंसा तणो उपासक आप।
गुणधर पांण विनाशक गोरां,
पराधीनता काटण पाप।।2[…]

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रैणायर दुरगो रतन!

सामधरम रो सेहरो, मातभोम रो मांण।
आसै रै घर ऊगियो, भलहल़ दुरगो भांण।।1

आभ मरूधर आस घर, ऊगो अरक उजास।
जस किरणां फैली जगत, दाटक दुरगादास।।2

नर-समंद मुरधर नमो, इल़ पर बात अतोल।
रैणायर दुरगो रतन, आसै घरै अमोल।।3

चनण तर दुरगो चवां, सुज धर पसर सुवास।
निमल़ कियो घर नींब रो, सूरै सालावास।।4[…]

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पाबू जी रा छन्द – कवि पूंजराज जी हड़वेचा

।।छन्द – भुजंगी।।
कया वैण सो काळवीं क्यों न केनों,
धरा भूप ले जावंत बाल धेनों।
महा दुष्ट खींची गयो मांह मोड़ै,
जबे पाल घोड़ी मांगी हाथ जोड़ै।।१।।

द्यों काळवीं मुज्झ नों बैण दीजै,
करै वाहरु धेन रा बोल कीजै।
भणै अम बाबू सुणो हो भवानी,
ममु वेण दीजै तमों साच मानी।।२।।[…]

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