ભગવતી આઈ શ્રી વાનુમા – મોરઝર (भगवती आई श्री वानुमा मोरझर)

માતૃપૂજાની શરૂઆત તો સૃષ્ટિના પ્રારંભ સાથે જ થઈ હશે. ભારતમાં તો આદિકાળથી જ માતૃપૂજા થતી આવી છે.

વેદોમાં પણ જગદંબાને સર્વદેવોના અધિષ્ઠાત્રી, આધાર સ્વરૂપ સર્વને ધારણ કરનારા સચ્ચિદાનંદમયી શક્તિ સ્વરૂપે વર્ણવામાં આવ્યા છે.

લોકજીવનમાં પરંપરાગત શક્તિ-પૂજા સાથે ચારણો ના ઘેર જન્મ લેનાર શક્તિ અવતારોની પૂજાનું પણ વિશિષ્ટ અને મહત્ત્વપૂર્ણ સ્થાન છે.[…]

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चारणां रो रगत पचैला नीं!

कच्छ धरा में एक गांम है मोरझर। मोरझर जूनो सांसण। अठै सुरताणिया चारण रैवै।

ऐ सुरताणिया पैला पाधरड़ी गांम में रैवता। किणी बात माथै उठै रै ठाकुर राजाजी वाघेला सूं अणबण हुयगी अर ऐ आपरो माल-मवेशी लेय गांम सूं निकल़ग्या। मोरझर पासै आया तो इणां नै आ धरा आपरै बसणजोग लागी। घणो झूंसरो, प्रघल़ो पाणी। लीला लेर अर घेर घुमेर रूंखां री जाडी छाया देख इणां आपरो नेस अठै थापियो।

इण सुरताणिया परिवार रा मुख्या जगोजी हा। वै बोलता पुरस, डील रा डारण अर दीखत रा डकरेल हा। मोरझर री धरा लाखाड़ी री सीमा में पड़ती सो जगाजी रो ऐड़ो व्यक्तित्व देख’र उठै रा ठाकुर देवाजी इणां नै सदैव रै सारू इनायत करदी। जगाजी रै साथै ई इणां रा मोटा भाई भाखरसी ई रैता। इणी भाखरसी रै एक बेटे रो नाम हो महकरणजी।

महकरणजी रो ब्याव वावड़ी गांम रा झीबा खोड़ीदान री बेटी वानूं रै साथै हुयो।[…]

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वांनूं – विरद

महान गौ भक्त एवं गौ रक्षार्थ अपने प्राण न्यौछावर करने वाली व अपने गांव मोरझर कच्छ में भूखों के लिए प्रातः होने से पहले घने अंधेरे में इस उद्देश्य से अखंड सदाव्रत चलाने वाली कि किसी स्वाभिमानी निर्धन को अपना मुंह दिखाकर लज्जित न होना पड़े। अठारवी शताब्दी की महान लोक पूज्य चारण देवी को समर्पित मेरी डिंगल रचना आपकी सेवा में प्रस्तुत– […]

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