पुस्तक समीक्षा – प्रकृति-संस्कृति री ओपती सुकृति-‘रूंख रसायण’ – महेन्द्रसिंह सिसोदिया ‘छायण’

पुस्तक समीक्षा – प्रकृति-संस्कृति री ओपती सुकृति-‘रूंख रसायण’ – महेन्द्रसिंह सिसोदिया ‘छायण’
लेखक – डॉ. शक्तिदान कविया

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राष्ट्राराधना का गौरवमय काव्य: क्रांतिकारी केहर केसरी

“इदम् राष्ट्राय, इदम् न ममः” की अमर सूक्ति को यत्र-तत्र-सर्वत्र सुनने-सुनाने का सुअवसर पाकर भी हम अपने आपको धन्य मानते हैं लेकिन असल में उन हूतात्माओं का जीवन धन्य है, जिन्होंने इस महनीय आदर्श को अपने जीवन एवं आचरण से चरितार्थ किया है। राष्ट्रहितार्थ अपना सर्वस्व न्योच्छावर करके भावी पीढ़ी के लिए मिसाल कायम करने वाले असंख्य प्रातःस्मरणीय भारतीय चरित्रों में से एक अति विशिष्ट चरित्र है- क्रांतिकारी केसरीसिंह बारहठ। वीर वसुंधरा के विरुद से विभूषित भरतभूमि का इतिहास ऐसे असंख्य वीरों के शौर्य की गाथाओं से परिपूर्ण है, जिनको स्मरण करके हर भारतीय को गौरव की अनुभूति होती है।[…]

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प्रीत पुराणी नह पड़ै

हिंदी-राजस्थानी के युवा प्रखर कवि व लेखक डॉ.रेवंतदान ‘रेवंता’ की आदरणीय डॉ.आईदानसिंहजी भाटी पर सद्य संस्मरणात्मक प्रकाशित होने वाली पुस्तक के लिए ‘फूल सारू पांखड़ी’—-

मैं यह बात बिना किसी पूर्वाग्रह के कह रहा हूं कि राजस्थानी लिखने वाले तो ‘झाल’ भरलें उतने हैं परंतु नवपौध को सिखाने वालों की गणना करें तो विदित होगा कि ये संख्या अंगुलियों के पोरों पर भी कम पड़ जाए। या यों कहें तो भी कोई अनर्गल बात नहीं होगी कि राजस्थानी में उन लेखकों की संख्या पांच-दस में ही सिमट जाती हैं जिनसे नई पीढ़ी प्रेरित होकर उनका अनुसरण करें।[…]

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पुस्तक समीक्षा – चारण चंद्रिका – महेंद्रसिंह सिसोदिया ‘छायण’

साहित्य अर इतिहास रै आभै में उजास करती ‘चारण चंद्रिका’ ~~महेंद्रसिंह सिसोदिया ‘छायण’ राजस्थान रौ इतिहास जितरौ लूंठौ अर गौरवमय हैं उतरौ ई अनूठौ अठै रौ साहित्य हैं। राजस्थानी साहित्य री डिंगळ परंपरा नै देखां तो लागै कै इणमें वीरां री अजरी वीरता रै वरणाव साथै सामाजिक अर सांस्कृतिक परंपरावां, रीति रिवाज अर लोक-जीवण री छिब साकार व्हैती निगै आवै। इणी ज डिंगळ साहित्य रौ ऊजळौ अध्याय हैं–चारण चंद्रिका। डिंगळ रै प्रख्यात कवि -निबंधकार गिरधरदान रतनू इण कृति नै जिण लगन अर निष्ठा सूं संपादित करी, इणरै लारै वांरी गै’री सोच अर वडेरां रै प्रति असीम श्रद्धा लखावै। संपादित कृति […]

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मानवकल्याण रै चिंतन रो सुभग संदेशः वेदार्थ चिंतामणि

आपांरै महताऊ ग्रंथां रो मंथण कर’र मानखै सारू ज्ञान रूपी माखणियो काढणिया एक महात्मा हुया है परमहंस स्वामी माधवानंदजी। उणां गुजराती में एक पोथी लिखी ‘वेदार्थ चिंतामणि‘। आ पोथी राजर्षि नाहरसिंहजी तेमावास पढी तो इणां नै लागो कै ऐड़ी जनकल्याणकारी पोथी राजस्थानी मानखै रै हाथां पूगणी चाहीजै ताकि ऐ ई आपरो कल्याणकारी मार्ग चुण आपरो हिंत चिंतन कर सकै। इणी पावन ध्येय नै दीठगत राख’र आप इण पोथी रो राजस्थानी में अनुवाद कियो।

निसंदेह मानव कल्याण करण वाल़ी आ पोथी आम मिनख सारू अंवेरणजोग है। नाहरसिंहजी नै लागो कै वेदार्थ जैड़ै गूढ विषय नै बोधगम्य बणाय’र आमजन तांई पूगायो जावै ताकि ईसरदासजी बारठ रा ऐ भाव फलिभूत हुय सकै तो साथै ई ऋषि ऋण परिशोध रो काम ई साधियो जा सकै-

भाग वडा तो राम भज, दिवस वडा कछु देह।
अकल वडी उपकार कर, देह धर्यां फल़ ऐह।।[…]

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भाव व भाषा का सुभग संगम: मेहाई महिमा

कवि श्रेष्ठ सागरजी कविया, जिन्हें कवियों ने ‘सागर सिद्ध’ की संज्ञा से अभिहित किया है, की गौरवशाली वंश परंपरा में रामप्रतापजी कविया के घर वि.सं.1924 की माग शुक्ला 13 शनिवार के दिन सेवापुरा गांव में कवि पुंगव हिंगलाजदान जी कविया का जन्म हुआ। कुशाग्र बुद्धि, विलक्षण स्मृति, वाग्मिता, आदि गुण आपमें वंशानुगत थे। यही कारण है कि आप एक नैसर्गिक कवि थे। आपका समग्र काव्य हृदयग्राही व चित्ताकर्षक है। डिंगल़-पिंगल़ में आपको समरूप प्रावीण्य प्राप्त था तो साथ ही आप संस्कृत व उर्दू में भी निष्णांत थे। यही कारण है कि डिंगल़ के मर्मज्ञ विद्वानों ने आपको डिंगल़ परंपरा का अंतिम महाकवि माना है जो वस्तुतः सत्य प्रतीत होता है।

आपकी उल्लेखनीय रचनाएं हैं-‘मेहाई-महिमा‘, ‘दुर्गा बहतरी’, ‘मृगया-मृगेंद्र’, ‘अपजस-आखेट’, ‘प्रत्यय-पयोधर’, ‘सालगिरह शतक‘, ‘वाणिया रासो’। इन महनीय रचनाओं के अलावा आपके कई डिंगल छंद व चिरजाएं शक्ति की भक्ति में प्रणीत हैं जो अत्यंत प्रसिद्ध व लोकप्रिय हैं।[…]

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सोढाण रो सांस्कृतिक दर्पण-सोढाण सतसई

साहित्यिक अर सांस्कृतिक भोम रो नाम है सोढांण। सोढांण धाट अर पारकर भांयकै रो समन्वित अर रूपाल़ो नाम। सोढाण मतलब सोढां रो उतन। इण विषय में मारवाड़ रा विख्यात कवि तेजसी सांदू भदोरा लिखै-

अमरांणो अमरावती, धरा सुरंगी धाट।
राजै सोढा राजवी, पह परमारां पाट।।

आ उवा धरा जठै कदै ई सोढा राजपूत शासन करता। उणी सोढां री धरा सोढाण, जिणरी जाण आखै हिंदुस्थान में है। बिनां खोट जिणां कीरती रा कोट कराया। मनमोटां, पोटां भर द्रब बांटियो अर सुजस खाटियो-[…]

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पुस्तक समीक्षा – विडरूपता अर विसंगतियां रै चटीड़ चेपतो : ‘म्रित्यु रासौ’

यूं तो शंकरसिंह राजपुरोहित साहित्य री केई विधावां में लिखै पण इणां री असली ओळखाण अेक नामी व्यंग्य लेखक रै रूप में बणी। इणां रो पैलो व्यंग्य-संग्रै ‘सुण अरजुण’ बीसेक बरसां पैली छप्यो। औ व्यंग्य-संग्रै राजस्थानी साहित्यिक जगत में आपरी जिकी लोकप्रियता बणाई वा इणां रै समवड़ियै लेखकां नैं कम ई मिली। अबार शंकरसिंह राजपुरोहित जको व्यंग्य-संग्रै चर्चित है उणरौ नाम है- ‘म्रित्यु रासौ’।
‘म्रित्यु रासौ’ में कुल बीस व्यंग्य है। बीसूं ई व्यंग्य अेक सूं अेक बध’र अवल। बीसूं ई व्यंग्यां में मध्यम वर्ग री अबखायां अर भुगतभोगी यथार्थ जीवण रो लेखो-जोखो है तो दोगलापण, विडरूपतावां, देखापो, भोपाडफरी, छळछंद, पाखंड, अफंड आद रो सांगोपांग भंडाफोड शंकरसिंह राजपुरोहित कर्यो है।[…]

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पुस्तक विमोचन, उत्कृष्ट सेवा एव साहित्य सम्मान समारोह

श्री केसरीसिह बारहठ चारण सेवा संस्थान के तत्वावधान में 31 अगस्त 2017 को मिनी ऑडिटोरियम सूचना केन्द्र जोधपुर में कवि गिरधर दान रतनू “दासोड़ी” लिखित पुस्तक “ढऴगी रातां ! बहगी बातां !” तथा जनकवि श्री वृजलाल जी कविया द्वारा रचित पुस्तक “विजय विनोद” के विमोचन का भव्य आयोजन हुआ। मंच पर अध्यक्ष के रूप में तकनीकी वि.वि. कोटा के डीन डॉ हाकमदानजी चारण, मुख्य अतिथि उच्च न्यायालय के न्यायाधिपति पुष्पेन्द्र सिंहजी भाटी, विशिष्ट अतिथि राजर्षि ठाकर नाहरसिंह जी जसोल, डिंगल़ के शिखर पुरुष श्रद्धेय डॉ शक्तिदानजी कविया, इतिहासज्ञ प्रो जहूर खां मेहर, डिंगल के दिग्गज कवि डूंगरदानजी आशिया, समालोचक व राजस्थानी के लोकप्रिय श्रेष्ठ कवि डॉ आईदानसिंह जी भाटी, लोकसाहित्य के मर्मज्ञ विद्वान डॉ सोहनदानजी चारण, राजस्थानी भाषा आंदोलन के पुरोधा लक्ष्मण दानजी कविया एवं डूंगर मा.वि.बीकानेर की राजस्थानी विभागाध्यक्ष डॉ प्रकाश अमरावत आसीन थे।[…]

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पुस्तक समीक्षा – पखापखी विहुणी निरख-परख

साहित्य सिरजण रै सीगै बात करां तो सगल़ां सूं अबखो अर आंझो काम है आलोचना रो। आलोचना रै पेटै काम करणियो नामचीन ई हुवै तो बदनाम ई। इण छेत्र में तो वो ई काम कर सकै जिणरै मनमें “ना काहू सों दोस्ती, ना काहू सों बैर “री भावना हुवै। हकीकत में आज इणरै ऊंधो हुय रह्यो है, आज तो आलोचना ई मूंडो काढर तिलक करण री परंपरा में बदल़ रह्यी है।
राजस्थानी आलोचना री बात करां तो आपां रै सामी आलोचकां रा नाम कमती अर पटकपंचां रा नाम ज्यादा अड़थड़था लखावै। यूं भी आलोचना करणो कोई बापड़ो विषय नीं है जिको हर कोई धसल़ मार देवै। आलोचना करणो खांडै री धार बैवणो है। जिण खांडै री धार माथै सावजोग रूप सूं बैवणो सीख लियो वो आलोचना रै आंगणै आपरी ओपती ओल़खाण दिराय सकै कै थापित कर सकै।[…]

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