पुस्तक समीक्षा – विडरूपता अर विसंगतियां रै चटीड़ चेपतो : ‘म्रित्यु रासौ’

यूं तो शंकरसिंह राजपुरोहित साहित्य री केई विधावां में लिखै पण इणां री असली ओळखाण अेक नामी व्यंग्य लेखक रै रूप में बणी। इणां रो पैलो व्यंग्य-संग्रै ‘सुण अरजुण’ बीसेक बरसां पैली छप्यो। औ व्यंग्य-संग्रै राजस्थानी साहित्यिक जगत में आपरी जिकी लोकप्रियता बणाई वा इणां रै समवड़ियै लेखकां नैं कम ई मिली। अबार शंकरसिंह राजपुरोहित जको व्यंग्य-संग्रै चर्चित है उणरौ नाम है- ‘म्रित्यु रासौ’।
‘म्रित्यु रासौ’ में कुल बीस व्यंग्य है। बीसूं ई व्यंग्य अेक सूं अेक बध’र अवल। बीसूं ई व्यंग्यां में मध्यम वर्ग री अबखायां अर भुगतभोगी यथार्थ जीवण रो लेखो-जोखो है तो दोगलापण, विडरूपतावां, देखापो, भोपाडफरी, छळछंद, पाखंड, अफंड आद रो सांगोपांग भंडाफोड शंकरसिंह राजपुरोहित कर्यो है।[…]

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पुस्तक विमोचन, उत्कृष्ट सेवा एव साहित्य सम्मान समारोह

श्री केसरीसिह बारहठ चारण सेवा संस्थान के तत्वावधान में 31 अगस्त 2017 को मिनी ऑडिटोरियम सूचना केन्द्र जोधपुर में कवि गिरधर दान रतनू “दासोड़ी” लिखित पुस्तक “ढऴगी रातां ! बहगी बातां !” तथा जनकवि श्री वृजलाल जी कविया द्वारा रचित पुस्तक “विजय विनोद” के विमोचन का भव्य आयोजन हुआ। मंच पर अध्यक्ष के रूप में तकनीकी वि.वि. कोटा के डीन डॉ हाकमदानजी चारण, मुख्य अतिथि उच्च न्यायालय के न्यायाधिपति पुष्पेन्द्र सिंहजी भाटी, विशिष्ट अतिथि राजर्षि ठाकर नाहरसिंह जी जसोल, डिंगल़ के शिखर पुरुष श्रद्धेय डॉ शक्तिदानजी कविया, इतिहासज्ञ प्रो जहूर खां मेहर, डिंगल के दिग्गज कवि डूंगरदानजी आशिया, समालोचक व राजस्थानी के लोकप्रिय श्रेष्ठ कवि डॉ आईदानसिंह जी भाटी, लोकसाहित्य के मर्मज्ञ विद्वान डॉ सोहनदानजी चारण, राजस्थानी भाषा आंदोलन के पुरोधा लक्ष्मण दानजी कविया एवं डूंगर मा.वि.बीकानेर की राजस्थानी विभागाध्यक्ष डॉ प्रकाश अमरावत आसीन थे।[…]

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पुस्तक समीक्षा – पखापखी विहुणी निरख-परख

साहित्य सिरजण रै सीगै बात करां तो सगल़ां सूं अबखो अर आंझो काम है आलोचना रो। आलोचना रै पेटै काम करणियो नामचीन ई हुवै तो बदनाम ई। इण छेत्र में तो वो ई काम कर सकै जिणरै मनमें “ना काहू सों दोस्ती, ना काहू सों बैर “री भावना हुवै। हकीकत में आज इणरै ऊंधो हुय रह्यो है, आज तो आलोचना ई मूंडो काढर तिलक करण री परंपरा में बदल़ रह्यी है।
राजस्थानी आलोचना री बात करां तो आपां रै सामी आलोचकां रा नाम कमती अर पटकपंचां रा नाम ज्यादा अड़थड़था लखावै। यूं भी आलोचना करणो कोई बापड़ो विषय नीं है जिको हर कोई धसल़ मार देवै। आलोचना करणो खांडै री धार बैवणो है। जिण खांडै री धार माथै सावजोग रूप सूं बैवणो सीख लियो वो आलोचना रै आंगणै आपरी ओपती ओल़खाण दिराय सकै कै थापित कर सकै।[…]

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पुस्तक समीक्षा: गीतां पैली घूघरी – श्री भागीरथ सिंह भाग्य

राजस्थानी कविमंचां रा महारथी कवियां मांय सूं अेक गीरबैजोग कवि है- श्री भागीरथसिंह भाग्य। आपरी अलबेली अदा, सरस रचनावां, सुरील राग, मनमौजी सभाव, ऊंडी दीठ, लोकरंग-ढंग री गैरी पिछाण, संस्कृति अर सामाजिक जीवणमूल्यां री जबरी जाण-पिछाण, लोकव्यवहार री लळकती-टळकती रगां नैं टंटोळण री लकब अर जनता-जनार्दन री चाह रा जाणीजाण कवि भागीरथसिंह भाग्य री रचनावां रा अनुभूति अर अभिव्यक्ति दोनूं पख प्रबळ है। कवि जीवण रा लगैटगै साठ बसंत देख चुक्यो अर मोकळी रचनावां लिखी है। कवि री लगैटगै 90 काव्यरचनावां रूपी सुमनां सूं सज्यो गुलदस्तो है ‘गीतां पैली घूघरी’ सिरैनामक पोथी। पोथी सद्भावना समिति पिलाणी सूं प्रकाशित हुई है। आमुख पं. नागराज जी शर्मा, संपादक-बिणाजारो रो लिख्योड़ो है, जकां रो अनुभव अर साहित्यिक दखल किणी परिचै री मोहताज नीं है। नागराजजी लिखै कै ‘भागीरथसिंह भाग्य कविता लिखै ई कोनी, कविता नैं जीवै है।’ साव साची बात है।[…]

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व्रजलालजी रो विविध वरणो काव्य : विजय विनोदः गिरधर दान रतनू दासोड़ी

चारण जाति आपरी विद्वता, प्रखरता, सत्यवादिता अर चारित्रिक दृढ़ता रै पांण चावी रह्यी है। इणी गुणां रै पांण इण जाति नैं मुलक में मांण मिलतो रह्यो है। संसार रै किणी पण कूंट में अेक ई अैड़ो उदाहरण नीं मिलै कै चारणां टाळ दूजी कोई पण जाति समग्र रूप सूं आपरै साहित्यिक अवदान रै पांण ओळखीजती हुवै! चारण ई अेक मात्र अैड़ी जाति है जिणरो राजस्थानी अर गुजराती साहित्य रै विगसाव पेटै व्यक्तिगत ई नीं अपितु सामूहिक अंजसजोग अवदान रह्यो है। इणी अवदान रै पेटै लोगां इणां री साहित्यिक सेवा रो मोल करतां थकां राजस्थानी साहित्य रै इतियास रै अेक काळखंड रो नाम ‘चारण साहित्य’ तो गुजराती में इणां री प्रज्ञा अर प्रतिभा री परख कर’र इणां रै रच्यै साहित्य रो या इण परंपरा में रच्यै साहित्य रो नाम ‘चारण साहित्य’ रै नाम सूं अभिहित कियो जावै।[…]

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प्रस्तावना

राजस्थान री धरा सूरां पूरां री धरा। इण धरा रे माथे संत, सती, सूरमा, सुकवि अर साहुकारां री ठावकी परंपरा रेयी है। जग रे पांण राजस्थान आखै मुलक में मांण पावतो अर सुजस लेवतो रेयौ है। डॉ शक्तिदान जी कविया रे आखरां में-

संत, सती अर सूरमा, सुकवि साहूकार।
पांच रतन मरूप्रांत रा, सोभा सब संसार।।

इण मरू रतनां रे सुजस री सोरम संचरावण वाळौ अठेरो साहित पण सजोरो। शक्ति, भक्ति अर प्रकृति रो त्रिवेणी संगम। शक्ति जाति वीरता रो वरणाव वंदनीय तो प्रकृति सूं प्रेम पढण वाळै नें हेम करे जेडौ तो इणी गत भक्ति काव्य भक्त ह्रदय सूं निकळण बाळी गंगधार। इणी गंग धार में नहाय आपरे जीवण रो सुधार करण रा जतन करणिया अठे रा कवेसर पूरै वतन में निकेवळी ओळखाण राखै। भक्ति काव्य री परंपरा घणी जूनी अर जुगादि। राम भक्ति काव्य कृष्ण भक्ति काव्य रे साथै साथै अठै तीसरी भक्ति धारा ई संपोषित ह्वी अर समान वेग सूं चाली। अर बा है देवी भक्ति काव्य धारा।[…]

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परमवीर प्रभु प्रकाशःअदम्य साहस रो अमिट उजास

रजवट (साहस) रो वट जिण सूरां आपरै रगत सूं सींच र पोखियो उणां रो नाम ई अमर रैयो है। कायर अर वीर रै मरणै में ओई फरक है कै कायर तो मरर धूड़ भेल़ा होवै अर वीर जस देह धार अमरता नै प्राप्त होवै। आजरै इण नाजोगै जमानै में ई आपरो जोगापणो बतावणिया जनम लेय, देश रै कारण मरण खाट, ऊजल़ै वेश सुरग पथ रा राही बणै। ऐड़ो ई एक वीर लारलै दिनां देश भक्ति रो दीप दीपाय अमरता नै प्राप्त होयो।
इण वीर रो नाम हो प्रभुसिंह गोगादेव।[…]

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साहित-खेत रो सबळ रुखाळो: अड़वौ – पुस्तक समीक्षा

‘लघुकथा’ साहित्य री इयांकली विधा है जकी दूहे दाईं ‘देखण में छोटी लगै (अर) घाव करै गंभीर’ री लोकचावी साहित्यिक खिमता नैं खराखरी उजागर करै। ओपतै कथासूत्र रै वचनां बंध्योड़ी पण मजला सूं इधको हेत राखती गळ्यां-गुचळ्यां अर डांडी-डगरां री अंवळांयां सूं बचती सीधी अर सत्वर सोच्योड़ै मुकाम पूगण वाळी विधा है- लघुकथा। राजस्थानी साहित्य अर संस्कृति रा जाणीजांण, राजस्थानी प्रकृति नैं परतख पावंडां नापणियां, वनविभाग रा आला अधिकारी श्री अर्जुनदान चारण लघुकथावां रा खांतीला कारीगर है। आपरा दो लघुकथा संग्रै छप्या थका है। दोनूं मायड़भासा राजस्थानी मांय है। पैलो ‘चर-भर’ अर दूजो ‘अड़वौ’। ‘अड़वौ’ संग्रै मांय राजस्थानी जनजीवण, नीत-मरजाद, लोक-व्यवहार, लेण-देण, सेवा-चाकरी, मैणत-मजूरी, नीत-अनीत आद विषयां सूं जुड़ी 52 लघुकथावां भेळी है। […]

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साख रा सबद

‘दलित-सतसई’ श्री लक्ष्मणदान कविया री सद्य प्रकाशित काव्यकृति है। इणसूं पैली सतसई सिरैनाम सूं आपरी रूंख-सतसई, रुत-सतसई, मजदूर-सतसई अर दुरगा-सतसई (अनूदित) आद पोथियां छपी थकी है। दूहा छंद में सिरजी आ पोथी ‘दलित-सतसई’ आपरै सिरैनाम री साख भरती दलितां री दरदभरी दास्तान रो बारीकी सूं बखाण करै। कवि रो मानणो है कै मिनख मिनख सब अेक है पण मामूली स्वारथां रै मकड़जाळ में फंसियोड़ा मिनखां मिनखाचारै पर करारी मार मारी अर मिनखां में फांटा घाल दिया।[…]

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