गीत कुशल जी रतनू रे वीरता रो बगसीराम जी रतनू रचित

राजस्थान मे चारण कवि ऐक हाथ मे कलम तथा दूसरे हाथ मे कृपाण रखते थे। महाराजा मानसिंह जी जोधपुर के कहे अनुसार रूपग कहण संभायो रूक। ऐक बार मानसिंह जी का भगोड़ा बिहारी दास खींची को भाटी शक्तिदान जी ने साथीण हवेली मे शरण दी, इस पर मान सिह जी ने क्रुद्ध होकर फोज भेज दी। शरणागत की रक्षा हेतु भाटी शक्तिदान जी ऐवं खेजड़ला ठाकुर सार्दुल सिंह जी ने सामना किया। इस जंग मे मेरे ग्राम चौपासणी के उग्रजी के सुपुत्र कुशल जी रतनू ने पांव मे गोली लगने के बाद भी युद्व किया।
उनकी वीरता पर तत्कालीन कवि बगसीराम जी रतनू ने निम्नलिखित डिंगल गीत लिखा जो यहाँ पेश है।

» Read more

जाट सिर झाट खागां

मध्यकालीन इतियास नै पढां तो व्यक्तिगत अहम पूर्ति अर व्यक्तिगत वैमनस्यता री बातां तो साची निगै आवै पण जिण जातिगत वैमनस्यता अर कटुता री बातां आजरै इतियासकारां लिखी है वै सायत घणीकरीक मनघड़त अर गोडां घड़्योड़ी लागै क्यूंकै जातिगत कटुता उण जुग में सायत नीं ही अर जे ही तो ई आजरै संदर्भ में जिको मनोमालिन्य है उवो जातियां में नीं हुय’र मिनखां में हो। भलांई उण दिन मिनख कमती हा पण मिनखाचार घणो हो। क्यूंकै उण जुग में ऐड़ा दाखला पढण में नीं रै बरोबर आवै। उण जुग में एक बीजै रै पेटे सनमान, अपणास समर्पण अर अपणास खोब-खोब’र भर्योड़ी ही।[…]

» Read more

आंखड़ियांह देखां पदम

बीकानेर रो इतियास पढां तो एक नाम आपांरै साम्हीं आवै जिको वीरता, अडरता, उदारता, री प्रतिमूरत निगै आवै। वो नाम है महाराज पदमसिंहजी रो। पदमसिंहजी जितरा वीर उतरा ई गंभीर तो उतरा ई लोकप्रिय। किणी कवि कह्यो है–

सेल त्रभागो झालियां, मूंछां वांकड़ियांह।
आंखड़ियांह देखां पदम, सुखयारथ घड़ियांह।।

पछै प्रश्न उठै कै इण त्रिवेणी संगम री साक्षात प्रतिमा मुगलां रै अधीन कै उणांरो हमगीर क्यूं रह्यो?[…]

» Read more

जंबुक ऐ क्यूं जीविया?

रोटी चीकणी जीम लैणी पण बात चीकणी नीं कैणी री आखड़ी पाल़णिया केई कवेसर आपांरै अठै हुया है। आपां जिण बात री आज ई कल्पना नीं कर सकां, उवा बात उण कवेसरां उण निरंकुश शासकां नै सुणाई जिणां रो नाम ई केई बार लोग जीभ माथै लेवता ई शंक जावता।

ऐड़ो ई एक किस्सो है महाराजा जसवंतसिंहजी जोधपुर (प्रथम) रो।[…]

» Read more

रहसी रै सुरताणिया!

वीरता अर वीर आज ई अमर है तो फखत कवियां या कविता रै पाण। क्यूंकै कवि री जबान माथै अमृत बसै अर उण जबान माथै जिको ई चढ्यो सो अमर हुयो। भलांई उण नर-नाहरां रो उजल़ियो इतियास आज जोयां ई नीं लाधै पण लोकमुख माथै उण सूरां रो सुजस प्रभात री किरणां साथै बांचीजै।

ऐड़ो ई एक वीर हुयो सुरताणजी गौड़। हालांकि कदै ई गौड़ एक विस्तृत भूभाग माथै राज करता पण समय री मार सूं तीण-बितूण हुय थाकैलै में आयग्या।

इणी गौड़ां मांय सूं ई ऐ सुरताणजी गौड़ हा।[…]

» Read more

रंग जोरावर रंग

दौरा दिन बै देस रा, फोरा साव फिरंग।
मच मच गौरा मारिया, रंग रे जोरा रंग।।01।।

भ्राता-सुतन प्रताप भड़, सदा रैयो जिण संग।
सखा केसरीसिंह सो, रंग जोरावर रंग।।02।।

मातभोम दुख मेटबा, आराध्यो इकलंग।
मलफ्यो मस्त मतंग ज्यूं, रंग जोरावर रंग।।03।।

ऊमर भर अज्ञात रह, करी न कोई कुसंग।
डट्यो रह्यो डिगियो नहीं, रंग जोरावर रंग।।04।।[…]

» Read more

आवां छां अमरेस!

स्वाभिमान अर हूंस आजरै जमाने में तो फखत कैवण अर सुणण रा ईज शब्द रैयग्या। इण जमाने में इण दो शब्दां नै लोग जितरा सस्ता अर हल़का परोटै, उणसूं लागै ई नीं कै कदै, ई शब्दां रा साकार रूप इण धर माथै हा। आज स्वाभिमान अर हूंस राखणा तो अल़गा, इण शब्दां री बात करणियां नै ई लोग गैलसफा कै झाऊ समझै। पण कदै ई धर माथै ऐड़ा मिनख ई रैवता जिकै स्वाभिमान री रुखाल़ी सारू प्राण दे सकता हा पण स्वाभिमान नै तिल मात्र ई नीं डिगण देता। कट सकता हा पण झुक नीं सकता। ‘मरणा कबूल पण दूध-दल़ियो नीं खाणा।’ यूं तो ऐड़ै केई नर-नाहरां रा नाम स्वाभिमान री ओल़ में हरोल़ है पण ‘सांवतसिंह झोकाई’ री बात मुजब ‘मांटियां रो मांटी अर बचकोक ऊपर’ री गत महावीर बलूजी(बलभद्र) चांपावत रो नाम अंजसजोग है।[…]

» Read more

स्वाभिमान और गौरव का बिंदु है जौहर

राजस्थान का नाम धारा-तीर्थ के रूप में विश्रूत रहा है। शौर्य और धैर्य का मणिकांचन संयोग कहीं देखने को मिलता था तो वो केवल यही धरती थी। ऐसे में कुछ सवाल उठते हैं कि फिर राजस्थान के रणबांकुरों को युद्ध में परास्त और यहां की वीरांगनाओं को जौहर की ज्वालाओं में क्यों झूलना(नहाना) पड़ा? क्या कारण था कि जिनकी असि-धाराओं के तेज मात्र से अरिदलों के हृदय कंपित हो उठते थे, उनको साका आयोजन करना पड़ता था?[…]

» Read more

शेर तथा सुअर की लड़ाई का वर्णन – हिंगलाजदान जी कविया

।।छंद – सारंग।।
डाकी इसा बोलियो बैण डाढाळ।
कंठीरणी छोड़ियो कुंजरां काळ।।
जाग्यो महाबीर कंठीर जाजुल्य।
ताळी खुली मुण्डमाळी तणी तुल्य।।
घ्रोणी लखे सींह नूं गाजियो घोर।
जारै किसूं केहरी ओर रो जोर।।

» Read more

डूंगरां ऊपरै छांह डाकी

कविवर नाथूसिंहजी महियारिया सही ई लिख्यो है कै भगती अर वीरता वंशानुगत नीं हुय’र फखत करै जिणरी हुवै-

जो करसी जिणरी हुसी, आसी बिन नूंतीह।
आ नह किणरै बापरी, भगती रजपूतीह।।

क्यूंकै फखत शस्त्र धारण सूं सूर अर गैणो पैरण सूं कोई हूर नीं हुवै-

भेख लियां सूं भगत नीं, होय न गैणै हूर।
पोथी सूं पंडित नहीं, नहीं शस्त्र सूं सूर।।[…]

» Read more
1 2 3 11