तंत्रोक्त देवी सुक्तम का भावानुवाद

( मेहाई सतसई – अनुक्रमणिका )

IMG-20150104-WA0009
देव नमो देशाणपत, सगती रूप शिवा ज।
प्रणमुं भद्रा प्रकृति, मेहाई महराज।।२००
नित्या रूद्राणी नमूं, गौरी धात्रि मां ज।
ससि रुपा जोसना सुखा, मेहाई महराज।।२०१
कल्याणी वृधि सिध करा, राखस लिछमी राज।
श्री-राजा, शिव सहचरी, मेहाई महराज।।२०२
दुर्गम पार उतारणी, सारां सारण काज।
ख्याति क्रृष्णा धूमवत, मेहाई महराज।।२०३
घणी सुकोमळ रूद्र घण, निवण निमण माता ज।
जगचावी घण जोगणी, मेहाई महराज।।२०४
विलस रही वपु मात्र मैं, बणे विष्णु माया ज।
नमो नमो नारायणी, मेहाई महराज।।२०५
वपु मँह बण विलसे रही, चारणि चेतनता ज।
वंदन वर वसुधा तणी, मेहाई महराज।।२०६
व्यापक वह वपु मँह रही, परतख बुध्धि प्रभा ज।
वीणपाणि वरदायिनी, मेहाई महराज।।२०७
हुलसित हरदम ह्वै रही, नयन नींद माता ज।
जोगण धर जंगळ तणी, मेहाई महराज।।२०८
मिनख मात्र रा पेट मँह, जो बण बसी क्षुधा ज।
जोगण वड जालंदरी, मेहाई महराज।।२०९
घट घट मँह जिण घर कियो, जननी बण छाया ज।
नमो मात निखिलेश्वरी, मेहाई महराज।।२१०
सगती बण घट घट सदा, रहो बिराजित राज।
वड जोगण वसुधा वदी, मेहाई महराज।।२११
हुलसित हरदम ह्वै रही, तूं बण मां तिसना ज।
धुरी धरा री धारणी, मेहाई महराज।।२१२
घट घट मँह थें घर कियो, जामण बणै छिमा ज।
नमन नमन मां आपनें, मेहाई महराज।।२१३
घट घट मँह थें घर कियो, जाति रूप बण मां ज।
चहो चहो बस चारणी, मेहाई महराज।।२१४
घट घट वासो बण कियौ, ललित रूप लज्जा ज।
नारी मय नारायणी, मेहाई महराज।।२१५
सकळ जगत मँह शांति बण, बाई रही बिराज।
स्थित प्रज्ञा शाकंभरी, मेहाई महराज।।२१६
श्रध्धामय सर्वेश्वरी, सब जन कहत सदाज।
दुःखियां री देवी सदा, मेहाई महराज।।२१७
कांति रूप मां करनला, वपु वपु रही बिराज।
अखिल जगत आलोकिनी, मेहाई महराज।।२१८
सब रे बसै शरीर में, जो बण लिछमी मां ज।
वा बिरवड वरदायिनी, मेहाई महराज।।२१९
जण जण में जिण घर कियो, मन वृत्ति बण मां ज।
जबर जागती जोगणी, मेहाई महराज।।२२०
स्मृति रूप बण तूं सगत, बिलसत वपु वपु मांझ।
चेतन चावी चारणी, मेहाई महराज।।२२१
जड चेतन सब जीव में, देवी रूप दया ज।
किनियाणी करूणामयी, मेहाई महराज।।२२२
वपु वपु में विलसंत जो, मन तृष्टि बण मां ज।
धिन धिन धाबळवाळ हे!, मेहाई महराज।।२२३
जण जण मँह जोगण बसी, जननि रूप बण मां ज।
जगत-मात जगदीस्वरी, मेहाई महराज।।२२४
घट घट में घूमै रही, भ्रांती बणे भवा ज।
भय मन भंजण भगवती, मेहाई महराज।।२२५
अधिराजा इन्द्रीय री, वपु वपु रही बिराज।
बीसहथी वरदायिनी, मेहाई महराज।।२२६
चिद्-रूपा चित शगत थूं, थानक चित मँह थां ज।
मन मंदिर मँह मढ कियो, मेहाई महराज।।२२७
देवी सेवी देवता, जै जै वेद किया ज।
विघन हरण मंगळ वरण, मेहाई महराज।।२२८
दहितां घणा डरीजिया, आपै देव अवाज।
संकट मेटण शंकरी, मेहाई महराज।।२२९

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *