तंत्रोक्त रात्रिसुक्तम का भावानुवाद

( मेहाई सतसई – अनुक्रमणिका )

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रात्रि सुक्त तंत्रोक्त रा, मायड भासा मांझ।
आखर मांडूं ओपता, मेहाई महराज।।४१६
जोगण निद्रा आपरा, कथूं प्रवाडा राज।
उकती शुभ दो अंबिका, मेहाई महराज।।४१७
अखिल जगत अधिराजिनी, धारण वळै धरा ज।
उतपति थिति लय कारणी, मेहाई महराज।।४१८
अनुपम सगती इश री, नींद कहै दुनिया ज।
आवड वपु खुद अंबिका, मेहाई महराज।।४१९
वषट्कार स्वाहा स्वधा, सुर लय नाद अर साज।
जीवनदायी जोगणी, मेहाई महराज।।४२०
प्रणव ओम परमेस्वरी, आप मात आवाज।
करणी कलकल नाद नित, मेहाई महराज।।४२१
तीन रूप थूं त्रंबका, अकार उकार मां ज।
माता वळै मकार मय, मेहाई महराज।।४२२
बिंदु रूप थूं बीसहथ, जिण नँह उचर सकां ज।
सिंझ्या सावित्री सदा, मेहाई महराज।।४२३
धारण करणी धरणि री, जग री सरजक राज।
पालक, पोखक, सोखणी, मेहाई महराज।।४२४
सर्जक सृष्टि रूपिणी, पालक स्थिति रूपाज।
काल रूप कल्पान्तिका, मेहाई महराज।।४२५
महा विधा माया महा, स्मृति -मह, मह मेधा ज।
महा मोहिनी मात थूं, मेहाई महराज।।४२६
देवीवड देवां मुकट, महासुरी थूं मां ज।
जोग निंद रूपां जयो, मेहाई महराज।।४२७
त्रिगुण विभावी त्रंबका, प्रकृतिमय परमा ज।
जोग निंद रूपां जयो, मेहाई महराज।।४२८
काळरात, महरात मां, मोहरैण, पण मां ज।
जोग निंद रूपां जयो, मेहाई महराज।।४२९
श्रीविधा सुभ इश्वरी, ह्रींमय पण थूं मां ज।
बोधस्वरूपा बुध्धि जय, मेहाई महराज।।४३०
तुष्टि पुष्टि लज्जा तुही, शांती तथा छिमा ज।
सकल भाव में तू सदा, मेहाई महराज।।४३१
खडगमालिनी खप्परा, कर धर तरसूळा ज।
घोर रूप घनगर्जिणी, मेहाई महराज।।४३२
शंख चक्र सर चाप धर, गदा धारणी मां ज।
दुरगा मढ देसाण री, मेहाई महराज।।४३३
बाण भुसुंडी बहुरि मां, सोहत कर परिघा ज।
जीव चराचर रक्षणी, मेहाई महराज।।४३४
सौम्य मात तूं सौम्यतर, सुंदर सुंदरता ज।
अपरापर अखिलेस्वरी, मेहाई महराज।।४३५
सरव सरूपी सत असत, बसणी सब रिधु राज।
तवन तिहारां किं कथूं, मेहाई महराज?।।४३६
सरजक, पोखक, सोखणी, हरि-मय नींद किया ज।
कीरत कुण तौ कथ सकै, मेहाई महराज।।४३७
हरि हर अज त्रय देव री, रचना करणी राज।
कुण कीरत तव कथ सकै, मेहाई महराज।।४३८
देवी वडदातार थूं, जोगण हरि जगा ज।
मधु कैटभ मन मोह कर, मेहाई महराज।।४३९
मधु कैटभ नें मारवा, हरि री बुध्धि बढा ज।
वडी रात माता वदूं, मेहाई महराज।।४४०
निशीथिनी निखिलेस्वरी, जग पौढै लख राज!।
थकित माणसां रो थडो, मेहाई महराज।।४४२
रात रहसमय रूप रिधु, ध्यान धरै मुनि राज!।
सिध्धिदा संपत प्रदा, मेहाई महराज।।४४३
अनँत प्रवाडा आपरा, जग थाकै कथतां ज।
जिम तारा नह गिण सकां, मेहाई महराज।।४४३
नीड-विहग, नर-झोंपडी, वाडो-धेनू, राज!।
सरणागत शरणो वडो, मेहाई महराज।।४४४
अजर अमर अविनाशिनी, जळ थळ नभ मैं मां ज।
धटाम्बिका घटवासिनी, मेहाई महराज।।४४५
थिर, अस्थिर, थिति, लय, प्रलय, जड अर चेतनता ज।
जीव चराचर जगत री, मेहाई महराज।।४४६
राका नरपत री रिधू, वंदन नित प्रत वां ज।
शरणागत री शर्वरी, मेहाई महराज।।४४७

~~नरपत आसिया “वैतालिक”

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