तारा स्वरूपा आवड वंदना

।।दोहा।।
तन्वी, तरला तारिणी, तन श्यामा त्रय नैन।
आवड तारा रूपिणी, दीजो मां सुख चैन।।1
तारा तरूणावल्लरी, नीलवाहिनीमात।
खीनपयोहर मां जया, आवड वपु अवदात।।2

।।शार्दूलवीक्रिडीत छंद।।
अंबा नीलसरस्वती त्रिनयनी, वन्दे शम्शानी परा।।
कैची खप्परणी विशाल खडगा, नीलांम्बुजं धारिणी।
कंठे हार भुजंग व्याल वलया, तन्वी जया तारिणी।
श्रीमद्एकजटाशिरा नमन मां, श्यामा तनु आवडा।।1

ऐं ह्रीं श्रीं शुभ क्लीं हुं उग्र तरला, कापालिका मंगला।
कंकाली नरमुंडमाल धरिणी, शक्ति स्वरूपा भवा।
वामाखेपवशिष्ठ आदिजननीं, हुंकारिणी, चित्परा।
तारा वंदन कालहंती वरदा, मां आवडा शारदा।।2

नीलाक्षीणतनुकुचां अभयदा, नागांगआभूषणा।
आनंदा शिवरक्षप्राणखडगा, घोरा सुधादायिनी।
श्रीतारा शववाहिनी विषहरा, श्मासानयावासिनी।
कृष्णा मात कपर्दिनी त्रिनयना, दिव्या सुखा आवडा।।3

तारा-उग्र, अधोर, तीव्रगमना, सिध्धा जगत्पालिनी।
कृत्या, सिध्ध- प्रपूजिता अकल तू, हे चित्परा तत्परा।
आधा वंदित इश्वरी सुखकरी, काली कृषांगी भवा।
रीझो शारद रूप मां भगवती, आई उमा आवडा।।4

व्याध्राचर्मविशालअंगवसना, देवी दया राखनें।
आठूं प्होर ज अंब काव्यसलिला, कंठे बणे गाजजे।
कोई और न चाह फेर मन री, म्हारे रहै मावडा।
रीझो शारद रूप मां त्रिनयना, तारा बणे आवडा।।5

वाणी, आखर, भाव कथ्य उपमा, छंदांरसालंकृता।
आपो बाळक ने अपार जननी, श्रीराज राजेश्वरी।
ओपावो नित देय काव्य अमणा, है मां इती कामना।
रीझो नील सरस्वती नमन हे, रूपा सदा आवडा।।6

अंबा शोभितनागपिंगलजटाजूटा विशाला गिरा।
चंडी खप्परणि अक्षोम्य प्रमदा, घोरारवा भीषणा।
गध्य पध्य निबंध चम्पू विविधा, साहित्य सिध्धिकरा।
रीझो मां विध रूप -भाष जननी, तारा मयी आवडा।।7

नीलाराजिव लोचनी ह्रदय में, वासो करो श्यामली।
बैठौ आसन थे मसाण मन रे, आणंद सूं मां भली।
चाहूं और न कोइ बात वरदा, माता इतो दीजियो।
रीझो हे सुरराय थें विदग पे, आई कृपा कीजियो।।8

।।दोहा।।
प्रत्यालीढपदा खडी, शवारूढ तन श्याम।
वा आवड तारा बणे, करै “नपा” रा काम।।1
रसना पर कविता बणै, गरजो आठो याम।
आवड अरजी आपने, सहस-गिरा, तनु श्याम।।2
चतुर्भुजी चंडी जया, लोचन त्रयी ललाम।
खपराळी खडगा “नपो”, नित जपतो तौ नाम।।3
तारा-मय आवड तवन, कथियो मां कर कोड।
रीझौ हे राजेसरी, मन रा पूरण कोड।।4

~~नरपत आसिया “वैतालिक”

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