तीनूं ताल़ा दे गया

गाय वैसे तो पूरे भारत के लिए श्रद्धा का कारण रही है लेकिन राजस्थान के संदर्भ में बात करें तो हमें विदित होता है कि मध्यकाल में यहां गौ रक्षार्थ युद्ध तो लड़े ही गए साथ ही चारण देवियों ने अपनी अथवा अपने समग्र गांव के गौधन की रक्षार्थ जमर की ज्वाला में अपने आपको समर्पित कर इतिहास में नाम अमर कर दिया। ऐसी ही कहानी है हड़वेचा गांव की सुअब माऊ की।

आजसे लगभग 250वर्ष पूर्व की बात है। हड़वा व हड़वेचा गांव की सीमा पर जहां अभी सुरलाई नाडी स्थित है, वहां पर सुअब माऊ ने जमर कर अन्याय व अत्याचार का प्रतिकार करते हुए एक उज्ज्वल इतिहास रचा था।

यह विडंबना ही कही जाएगी कि जिन्होंने इतिहास रचा उन्हीं का आज इतिहास गवेष्य है। उनके पति, पिता, पीहर आदि के नाम प्राप्य नहीं है। हां हड़वेचा उनका ससुराल था।

उस समय हड़वा गांव में भाटियों की जसोड़ शाखा के लुनाइया राजपूतों के कुछ घर थे। सुअब माऊ ने उन्हीं लुनाइयों के अत्याचार के खिलाफ जमर किया था। सुअब माऊ के जमर की बात करूं उससे पहले उन लुनाइयों की बात करना समीचीन रहेगा।
लुनाइया आसकरण जसोड़ के पुत्र भीम के पुत्र तेजसी की संतति है। इन दोनों पिता-पुत्र का इतिहास कलुषित रहा है। क्योंकि पिता भीम ने जैसलमेर गढ़ का उस समय भेद दिया जब मुसलमान आक्रांताओं के विरुद्ध रावल दूदा ने मोर्चा संभाल रखा था। उस उनके भाई के पुत्र भीम ने विधर्मियों को गढ़ का भेद दिया, जिसके परिणामस्वरूप रावल दूदा को केसरिया कर साका करना पड़ा। भीम भाटी के देशद्रोह को उस समय के कवियों ने रेखांकित करते हुए लिखा है-

गेमी नांम धरावियो, आसावत अणजांण।
भाटी दीनो भीमदे, तव गढ भेद प्रमांण

इसी भीम के पुत्र तेजसी ने रावल गड़सी पर प्रहार कर काल कवलित कर दिया जब वे अपने अश्व की पीठ से उतर रहे थे। पाट घाव करना तत्कालीन समय में अक्षम्य अपराध माना जाता था। वो एक तरह का देशद्रोह ही था और ऐसे द्रोहियों को जनमानस ने कभी मनसे माफ नहीं किया। जनता ने ऐसे लोगों को नमकहराम की संज्ञा से अभिहित किया। नैणसी लिखते हैं-“हरांमखोर नासै गयो।” उसी तेजसी की संतति कुछ जगह तिबा तो हड़वा में लुनाइया कहलाती है।

बात यों बनी कि सुअब माऊ के पास बहुत सारी गायें थी, जो गांव की गोचर में में चरा करती थी। एक दिन ऐसा योग बना कि उनकी गायें हड़वेचा और हड़वा की सीमा पर स्थित लुनाइयों के खेत में चली गई। गायों ने फसल को भारी नुकशान पहुंचाया। इस बात का जब उन्हें पता चला तो उन्हें क्रोध आ गया। वे अपने दलबल सहित खेत पहुंचें और गायों को ऊंटों-घोड़ों के आगे देकर बहुत दौड़ाया, संताया।

यह बात जब किसी ने आकर सुअब मा के पुत्रों को बताई तो वे वहां गए तथा जसोड़ों को बात समझाते हुए कहा कि-
“यह तो बेचारे मूक प्राणी हैं। इन्हें यह तो विदित नहीं है कि यह खेत फलां-फलां का है अतः हम नुकशान न करें। फिर भी इन्होंने जो फसल को हानि पहुंचाई है उसका हम हर्जाना भरने के लिए तैयार हैं। आप हमारी बेचारी गायों को तंग न करें।”

लेकिन जसोड़ों ने अपने बाहु व संख्या बल के बूते उनका अनुनय-विनय ठुकराते हुए बुरा-भला कहा। जिससे बात बढ़ गई। उसका परिणाम यह हुआ कि जसोड़ों ने अपनी क्षत्रियोचित मर्यादा को तिलांजलि देते हुए चारणों के गायों की पूंछे काट दी। जब निरीह प्राणियों के पूंछों से रक्त झरते हुए देखा तो करुणार्द्र में क्रोधित होकर सुअब मा के एक पुत्र ने वहीं जसोड़ों पर कटार खाकर अपने प्राणांत कर लिए।

इधर जब गायें भयाक्रांत होकर वहां से भागकर सुअब माऊ के घर पहुंची तो उन्होंने देखा कि उनकी सभी गायों की पूंछे कटी हुई हैं, तो उन्हें भयंकर क्रोध आ गया। उन्होंने कहा-
“अरे इसे दुष्टी को नवलाख भक्षण करे। कालींदर खाए इस नीच को।” इतने में किसी ने पूरी घटना सुअब माऊ को बताई कि किस तरह जसोड़ों ने गायों की पूंछे काटी और किस तरह उनके एक पुत्र ने उन पर कटारी खा ली है। यह सुनते ही उनकी क्रोधाग्नि भभक उठी। वो उसी समय वहां पहुंची जहां सुअब माऊ के पुत्र जसोड़ों पर कटार खाकर कीर्ति-शेष हुए थे।

उन्होंने अपने पुत्र के पार्थिव शरीर को गोद में लिया और जसोड़ों को शाप दिया कि-
“गायों के रक्त से हाथ रंगने वालों तुम्हारी जड़ें विनष्ट हो जाएगी। तुम काल के गाल में समा जाओगे। तुम अपयश के भागी बनोगे।” यह कहकर उसी समय अग्निशिखा में समाहित हो गई।

जसोड़ों ने उसी समय वे खेत छोड़ दिए जिनकी सीमा में सुअब माऊ ने जमर किया था।

उस जमर स्थल के पास वर्तमान में सुरलाई तालाब बना हुआ हैं। वहां एक दिन जसोड़ आपसी लड़ाई में पड़कर आपस में कट मरे। उन जसोड़ों के घरों की थेह आज भी वहां इस बात की साक्षी भर रही है कि-

अन्याई से जात है, तेज राज अरूं वंश।
तीनूं ताल़ा दे गया, कौरव रावण कंस।।

उस सुरलाई नाडी के बीचोबीच मा सुअब की जमर स्मृति में एक छोटा मंदिर बना हुआ था। जो तालाब में पानी के आधिक्य व देखरेख के अभाव में जीर्णशीर्ण अवस्था में आज भी वहां है तो मूर्ति भी भग्नावस्था में पड़ी हमारी उदासीनता व असंवेदनशील प्रवृत्ति का परिचय दे रही है।

।।सुअब माऊ रा दूहा।।
सुअब संकल़ाईह, दिस-दिस चावी देश में।
लांठा लूणाईह, मुरड़ रसातल़ मेलिया।।1
सुरभ्यां वाल़ा सींग, भँज पूंछां बाढी भल़ै।
तिसड़ा वे त्रिसींग, आई सुअब उथापिया।।2
करली गल़ै कटार, सुवन सुअब रै सूरमै।
तो सुणतां तिणबार, कड़की ऊपर केवियां।।3
जमर तणी चढ झाल़, सठ लूणाई सापिया।
जो झलिया जमजाल़, कोप तिहारै कुबुद्धिया।।4
सुरभ्यां ऊपर संभ, गुण तज पड़िया गादड़ा।
ज्यांनै तैं जगतंब, शूल़ पिरोया साबल़ी।।5
सुरल़ाई है साख, जमर सजी तूं भोम जिण।
खुटल़ां रा घर खाख, सुअब मिलाया शूल सज।।6
कियो अमर धर कांम, जाई आई कर जमर।
निज कुल़ चावो नांम, हड़वेचा हर दिस हुवो।।7
पावन धर पांणीह, पावन कुल़वट पेखियो।
सुअब साचांणीह, आब चढाई ईहगां।।8
देवल रो वरदान, हो हड़वेचां हेतवां।
उणनै धरा अमांन, साचो कीनो सगतियां।।9

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी
फोटोज साभार-रमेशजी हड़वेचा

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