सांस्कृतिक संबंधां रो साकार सरूप ठाकुर नाहरसिंहजी जसोल

Girdhardan-8
राजस्थानी रा सिरै कवि रायसिंहजी सांदू मिरगैसर आपरी रचना “मोतिया रा सोरठा” में ओ सोरठो जिण महामनां नै दीठगत राखर लिखियो उणां में नाहरसिंहजी हर दीठ सूं खरा उतरै-

राखै द्वेष न राग, भाखै नह जीबां बुरो।
दरसण करतां दाग, मिटै जनम रा मोतिया।।

किणी मध्यकालीन कवि ठाकुर सुरतसिंह री उदार मानसिकता नै सरावतां कितो सटीक लिखियो हो-

सुरतै जिसै सपूत, दिस दिस मे हिक हिक हुवै।
चारण नै रजपूत, जूना हुवै न च्यारजुग।।

आज जद आपां नाहरसिंहजी जसोल नै देखां तो बिनां किणी लाग लपट उण मध्यकालीैन क्षत्रिय मनीषियां री बातां अर अंजसजोग काव्य ओल़ियां याद आ जावै जिकी इणां चारण कवियां री स्वामी भक्ति, सदाचरण, साहित्य रै प्रति समर्पण, सांस्कृतिक चेतना, सत्य रो समर्थन साच कैवण रो साहस अर सही सलाह रै उदात्त गुणां नै देखर कैयी।

महारावल़ हरराज, महाराजा जसव़तसिंह, महाराणा राजसिंह, महाराजा मानसिंह, रावराजा देवीसिंह, महाराजा बल़वतसिंह, ठाकुर गुमानसिंह आद क्षत्रिय मनीषियां, चारणां कवियां री बधतायां नै आपरी वाणी सूं जिकी ऊंचाइयां दीनी वै काव्य जगत में आज ई अमर है। जिण उदार मानसिकता रै नर रत्नां इण बात नै आपरी आंख्यां देखी उणां में एक सिरै नाम है ठाकुर नाहरसिंहजी जसोल रो। नाहरसिंहजी जसोल रै मन में इण साहित्यिक जात रो हर आदमी आम नी होयर खास है। भलांई आज राज नीं है, गढ नीं है अर इणां रो इण सधर पुरस रै मन मोह ई नीं है पण संबंधां री प्रगाढतां री झीणी याद आज ई इणां रै मन में सुखद अनुभूति दैवै। महारावल़ हरराज री आ ओल़ी नाहरसिंहजी नै देखियां याद आवै-

जावै गढ राज भलां भल जावो
राज गयां नह सोच रती।
गजब ढहै कवराज गयां सूं
पलटै मत बण छत्रपति।।

देवीसिंहजी सीकर जिकी सतोली बात लिखी वा नाहरसिंहजी रै व्यक्तित्व सूं मेल़ खावै-

चारण तणो रह सो चाकर
सो ठाकर संसार सिरै।।

चारण अर क्षत्रियां रो जिको चोल़ी दामण रो संबंध रैयो है उण रा ठाकुर साहब बाल़काल़ में साखीधर रैया है। जसोल जैड़ै संस्कारी घराणै में ठाकुर साहब अमरसिंहजी रै घरै जनमिया नाहरसिंहजी दोनूं जातां रै बिचाल़ै रैयै सांस्कृतिक संबंधां रा सेतु है। चारण कवियां ऐड़ै निछल़ हृदय रै पुरसां नै सदैव आपरी वाणी सूं कीं न कीं भेंट करण री आखड़ी पाल़ी है। भलांई आजरी पीढी में चारण कवियां री इण भांत री कवितावां रै पेटै नीं जाणै कांई कांई धारणावां है पण म्हारै मन में तो एक ही धारणा है कै चारण कवि सदैव भावां रा भूखा रैया है अर भावनावां री कूंत करणी जाणी है। इण कवियां सदैव उण मनीषी नै मन सूं आघ दियो है जिण रै मन में इणां रै पेटै निछल़ प्रीत रैयी है। सांई दीन दरवेस जैड़ै त्यागी पुरस ई आ बात अंगेजी है कै दुनिया में दो वस्तुवां सिरै है। एक हरि रो नाम अर दूजो चारण सूं राजी रैवणो-

दीन कहै दुनियाण में, देखी वस्तु दोय।
राजी चारण सूं रहो, मुकत नाम से होय।।

जै किणी सुगरै पुरस सूं प्रीत लागगी तो वा कदै ई पुराणी नीं पड़ सकै जिण भांत सौ वरसां लग जल़ में रैवण रै पछै ई पत्थरी आग रो साथ नीं छोडै-

प्रीत पुराणी नह पड़ै, जो उत्तम सों लग्ग।
सौ वरसां जल़ में रहै, पत्थरी तजै न अग्ग।।

आ बात नाहरसिंहजी साहब जाणै कै इण कवियां री प्रीत कदै ई पुराणी नीं पड़ै क्यूं कै इणां में सबसूं मोटी खोड़ है कै बधताई नै सरायां बिनां अर खामी नै कुसरायां बिनां ऐ रैय नीं सकै। आ हकिकत है। शायद किणी कवि इण कवियां नै दीठगत राखर ओ दूहो कैयो हुवैला-

म्है मगरै रा मोरिया, काकर चूण चुगंत।
रुत आयां बोलां नहीं, (तो )हिंयो फूट मरंत।।

ओ ई कारण है कै नाहरसिंहजी रै व्यक्तित्व नै इंगित करतां केई कवियां आपरी रचनावां सरजी तो म्है कीकर लारै रैवतो। म्है ई एक गीत आपरी निजर कर रैयो हूं। जिको इण तूटतै संबंधां नै अजै जरू झालियां बैठै ठाकुर नाहरसिहजी नै समर्पित है-

।।गीत नाहरसिंहजी जसोल रो “जांगड़ो”।।
मालाणी मुलक मिनख मन मोटो
माहेचो मिणधारी।
नेही निछल नाहरो नामी
कमंध कीरत रो धारी। १

सरस भाव मिल़े जी सोरै
जग बातां सत जाणी।
पातां सूं प्रीत रीत पुरबली
उर पाल़ै अमराणी।। २

सतवट बहै साहित रो सेवी
रहै सदा इकरंगी।
जाहर नाहर आज जसोलो
सत पातां रो संगी।। ३

आछा करम करै उपकारी
किरीट छत्रियां कोड़ै।
मालो बीजो आज महेचां
जोय राज रिख जोड़ै। ४

चितसुध मान अमोलख चारण
धारण की व्रतधारी।
मांझी थल़वट माड मही रा
साख मरूधर सारी।। ५

सादै वेस रेहणी सादी
रजवट रीत रुखाल़ो।
परसै चरण ऊठ नै पातां
भाव भायां सो भाल़ो।। ६

सँत माफक रैवै सतधारी
अध्ययन ईस अराधै।
ख्यातां बातां कवित खेवटै
सद मारग नै साधै।। ७

चारण की चीज देखबा चावो
सह रजपूत सुणीजो
सत री सीख बगत सिटल़ी में
लेस नाहर सूं लीजो।। ८

~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी

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