तो कांई म्हारी दाऴ अलूणी ही!!

चाडी रूपावतां रो कदीमी ठिकाणो!! राव जोधाजी आपरै भाई-भतीजां नै बंट दियो उण बखत रूपाजी नै पांचोड़ी साथै चाडी ई दियो। रूपाजी री वंश परंपरा में चाडी ठाकर दौलसिंह रा बेटा खेतसिंह होया।

खेतसिंह आपरी बखत रा अणीपाणी वाल़ा राजपूत हा!! जिणां आपरी आन-बान अर शान रै पाण जगत में माण कमायो। आज ई लोक में चावो नाम है खेतसिंह रो।

एकबार खेतसिंह कोई घरेलु काम-काज रै मिस जोधपुर गया। आपरो ऊंठ निमाज हवेली में बांध सामान-सट्टो खरीदण गया अर, पाछा आय हवेली रातवासो लियो। दिनूंगै उठिया तो सऴवऴ सुणीजी कै हवेली मानसिंहजी घेराय दी है।

ठाकरां रो साथ भेऴो होयो अर मुकाबलो करण री तेवड़ी। उणां मांय सूं किणी खेतसिंहजी नै कैयो कै-
“खेतसिंहजी ! थे अणखाधी रा क्यूं मरो !! थे थांरै ऊंठ सवार होय जावो परा !! दरबार रो कोप ठाकरां माथै है दूजै किणी माथै नीं सो थे क्यूं उडतो तीर गऴै में लेवो?”

आ सुण’र खेतसिंहजी कैयो कै-
“तो पछै थे क्यूं अठै ऊभा हो ? थे ई थांरै मारग जावो अर हवेली खाली करदो!! थे क्यूं मरो ? ठाकरां माथै कोप है तो ठाकर बाढैला अर काढैला!!”

आ सुण र उणां मांय सूं किणी कैयो कै-
“म्हे कीकर जा सकां!! म्हां ठाकरां रो लूण खाधो है पछै लूण हरामी कीकर करां? म्हांरी भुगत तो ठाकरां भेऴी है!!”

आ सुणतां ई भंवारा चढावतां खेतसिंह कैयो-
“तो इतरो नाजोगो हूं ई नीं हूं अर नीं म्हनै म्हारी मा उण रात जिणियो है जको हूं किणी रो लूण खाय हराम करूं!! म्हनै ई राम नै जीव दैणो है!! म्है मरण सूं डरूं थोड़ो ई हूं जको ठाकर नै संकट में देख पगरखी हाथां में लूं!! म्है ई राजपूत हूं !! जैड़ो-तैड़ो लोह रो खीलो हूं ई कनै राखूं!! इणनै डरर नाखूं नीं”

डर सूं शस्त्र नांखदे, कायर फोट कपूत।
मरणा सूं डरपै मुदै, जका किसा रजपूत!!

खेतसिंह ओ कैयो तो उणां मांय सूं किणी पाछो पूछियो कै-
“थे कद ठाकरां रो लूण खाधो? जको उजाऴण खातर सीस देवण नै ई त्यार हो!!”

आ सुणर खेतसिंह कैयो-
“पैला तो कदै ई नीं खाधो पण रातै रोटी तो म्हारै कनै ही पण ओलण रै मिस रसोवड़ै मांय सूं कुड़छियोक दाऴ लेयली !! सो उणरै ओऴावै ठाकरां रो लूण तो पेट में पूगो ईज है!! आप सगऴा लूण री बात करो तो कांई म्हारी दाऴ अलूणी ही?

आ बात उठै आवतां ठाकर सुरताणसिंह रै कानां पड़ी तो उणां पूछियो कै-
“ओ मोट्यार कुण है?”

पाखती ऊभै किणी कैयो कै-
“हुकम ओ तो चाडी रो रूपावत खेतसिंह दौलसिंह रो है अर रातै रसोवड़ै मांय सूं दाऴ ली !! उणमें पड़ियै चिमठी लूण रै सारू मरणो मांडियो है!!”

आ सुणर ठाकरां कैयो-
“अरै! इण चिमठीक लूण खातर क्यूं आप मोत अंगेजो!! म्हारै कानी सूं छूट है आपनै जावण सारू, कोई ओऴभो नीं।”

आ सुणर खेतसिंह कैयो-
“हुकम ! आंख में रातै कस्सै वाऴै राजपूत नै तो मरण सारू चिमठीक लूण ई उबरतो है अर जिणरी आंख फिटकड़ी रै फूलां ज्यूं होवै उण सुरल़ीशंख नै भलांई पाखल़ियां रै भराव खड़ावो तो ई कांई फरक पड़ै?
म्है हमे पग रोप दिया तो का इनै का बिनै!! म्है लूण मूंगो अर म्हारो माथो सूंगो मानूं!!”

खेतसिंह कैयो तो ठाकरां कैयो-
“रावऴी मरजी-

नर सैणां सूं व्है नहीं, निपट अनौखा नांम।
दैणा मरणा मारणा, कालां हंदा कांम!!

आप कालाई मत करो, म्है तो अजै ई आपनै पालूं!!”

आ सुणर खेतसिंह कैयो-
“हुकम ! पछै म्है लोक में आ बतावूंला कै निमाज री हवेली घेरीजतां ई म्है तो तैतीसा मनाया!! ई कऴंक नै ढोयर कांई म्है चैन सूं जी पाऊंलो!! म्है अपजस रो वौपारी नीं म्हनै तो सुजस चाहीजै !! कांई आप सुणियो नीं-

प्राण पियारा नह गिणै, सुजस पियारा ज्यांह।
सिर ऊपर रूठा फिरै, दई डरप्पै त्यांह।।

हवेली रै च्यारां कानी दरबार रा आदमी!! दरबार ओ दृश्य किले रै ऊपर ऊभा देखै।
महाराजा मानसिंहजी री रीझ अर खीझ दोनूं ई घोड़ै रै कनौत्यां ज्यूं।

दोनां कानी मोरचा मंडिया। बंदूका छूटी। सणणाट करती गोऴी निमाज ठाकर सुरताणसिंह रै लागी। मोत किणरो गनो राखै!! ठाकर ई वीरगति वरी।

खेतसिंह आपरी तरवार लेय ‘सटै सलूणै सीस दे’ रै कैताणै नै सिद्ध करण सारू मरण नै वरण बुवो। राटक बाजी। जूंझतो थको रणखेत उजाऴ सुरग हालियो!!

दरबार खेतसिंह री सामभक्ति अर अडरता देख पूछियो कै ओ कुण हो? किणी अरज करी कै चाडी रो रूपावत खेतसिंह हो!! उण बखत उण मोट्यार राजपूत री तरवार रो पाणी देख कवि हृदय मानसिंहजी री वाणी अंतस उद्गार रै रूप में इणगत प्रगटी-

खाग बजाई खेतसी, बढ कट हुवो बरंग।
संग लड़ियो सुरतांण रै, रूपावत नै रंग।।
तन झड़ियो तरवारियां, अपछर वरियो अंग।
संग रहियो सुरतांण रै, रूपावत नै रंग।।

उण बखत बीजै कवियां ई इण महाभड़ री निकल़ंक वीरत नै कीरत री सूरत दे अमर कीनी। किणी समकालीन कवेसर रै सतोलै आखरां री बांनगी-

चाडी धणी पखां जल़ चाढै, 
रूपावत रण रसियो। 
वर अपछर नै बैठ वीमाणां
विसनपुरी जा बसियो।।

आजरा डिंगल़ कवि गणेशदानजी रतनू (दासोड़ी) खेतसिंह रै इण सजोरै समर नै इण भांत अमर कियो-

रूपावत चाढी रती, अत जस कटियो अंग।
सुजस लियो सुरतांण सथ, रजपूती नै रंग।।
अड़ियो खेतो अडरपण, झड़ियो खागां जंग।
मड़ियो पण मुड़ियो नही, रूपावत नै रंग।।

सुरताणसिंह ऊदावत निमाज ई आपरी बखत रा सपूत मिनख हा। वे इण बात रा प्रबऴ हिमायती हा कै-

धर जातां धर्म पऴटतां, त्रिया पड़ंतां ताव।
तीन दिहाड़ा मरण रा, कहा रंक का राव!!

अर महाराजा उणां री ऐड़ीज एक आखड़ी पाऴण री द्रढता सूं चिड़ग्या!!

बात यूं बणी कै एक दिन खांगटा रो एक चौधरी आपरी बेटी नै चूड़ै रो माप दिरावण जोधपुर साथै लायो। साथै लावणी जरूरी ही क्यूंकै उणनै थोड़ै दिनां पछै उणरो मुकलावो करणो हो अर चूड़ीगर नै चूड़ै सारू उणरै हाथ रो माप लैणो हो!!

वे बाप-बेटी उदयमंदिर रै आगै सूं निकऴै हा कै बेटी माथै उदयमंदिर नाथ भीमनाथ री निजर उणरै जवान शरीर अर फूटरापै माथै पड़ी!!

उण थोड़ी करी न घणी भरियै बाजार में उणरो हाथ झाल लियो!! इण अचाणचक होयै वरताव सूं बाप-बेटी डाफाचूक होयग्या!!
राणी नै काणी कुण कैवै ? महाराजा मानसिंहजी जिणां नै मानै उणां नै भलो-बुरो कैवण री कुण आसंग करै। भीमनाथ रै नाम सूं हिरण बांडा होवै।

उणां डरूं-फरूं इनै बिनै जोयो पण कोई मददगार नीं दीसियो। जितै जोग ऐड़ो बणियो कै नीमाज ठाकर सुरताणसिंह आपरै घोड़ै सवार उठीनै सूं निकऴिया। उणां ओ अजोगतो काम देखियो तो उणां री आंख्यां में झाऴां छूटी। रीस में भाभड़ाभूत होयग्या। उणां थोड़ो कियो न घणो आपरै घोड़ै सूं उतर भीमनाथ नै फटकारियो अर दो-तीन चाबका उणरै मोरां बाया!! भीमनाथ लचकाणो पड़ उदयमंदिर में बड़ग्यो पण किणी चुगलखोर जाय दरबार नै भिड़ाया कै-
“आप तो नाथजी नै इतरा मानो अर सुरताणसिंह एक मामूली बात सारू भगमै में धूड़ नांखी, नाथजी री भक्ति बिगाड़ी अर सरेआम कूटिया!!”

आ सुणतां ई दरबार रो पारो सातवैं आसमान पूगो। राजा कानां रा काचा होवता उणांनै रीस आयगी कै जिणां नै नवकोटी रो नाथ ई नाथ मानै उणां माथै ठाकर री हाथ उठावण री हीमत कीकर होई।
उणां उणी बखत कैयो-
“सुरताणसिंह ऐ चाबका नाथजी रै नीं बाया बल्कि म्हारै बाया है। ऐ म्हारै जितैतक चिरबिरैला जितैतक हूं सुरताणसिंह नै इणरो डंड नीं दूं।”

अबै कुण कैवै कै ब्याव भूंडो है। दरबार तो आपरी टुकड़ी निमाज हवेली माथै मेलदी!! किणी भलचाऊ सुरताणसिंह नै कैयो कै-
“आप खामंधां सूं इण बात री माफी मांगलो!! नीतर हमे मंगऴ नीं है।”

आ सुणर सुरताणसिंह कैयो कै-
“म्है जे सामहरामी करतो तो अवस माफी मांग लेतो पण एक अबऴा री इज्ज़त बचावणी राजपूत रो परम धरम है अर म्है धरम पाऴियो है, पछै इण बात री क्यूं माफी मांगूं!! मरणो तो है ही तो पग रोपर मरूंला-

सूर मरै कायर मरै, दोनां अंतर ऐह।
कायर मर माटी भिऴै, धसै सूर जस देह।।

जोर री रीठ बाजी। सुरताणसिंह न्याय रै खातर सुरग अंगेजियो। केई चारण कवेसरां सुरताणसिंह री इण स्त्री सनमान रै भावां अर अडरता नै आपरै सतोलै आखरां अमर कर दीनी। अठै आ बात उल्लेखणजोग है कै महाराजा मानसिंहजी चारण कवेसरां नै आपरी वार में इकसठ सांसण इनायत किया-

इकसठ सांसण आपिया,
मानै गुमनाणी।।

पण जद उणां अकारण सुरताणसिंह माथै हमलो करायो अर उण बखत सुरताणसिंह अर उणां रै छोटो भाई सूरसिंह न्याय माथै अडग रैतां थकां मोत अंगेजी। इण बात री चारण कवेसरां खुलर तारीफ करी यानि महाराजा रा प्रियपात्र होवतां थकां ई उण कवेसरां इण काम नै अप्रिय मानर सुरताणसिंह रै सुजस नै सोनलियै आखरां मांडियो-

सुपह मांन घैंसाहरां सिलह तन साझियां। 
गज-डंका जाहरां त्रम्बागल़ गाजियां। 
बीजल़ां थाहरां घेरतां बाजियां। 
बरूथां नाहरां जेम निबाजिया। 
खाग झड़ उरड़ पड़ झालड़ा खड़बड़ै। 
रोस चड़ सोहड़ आथड़ भड़ अड़बड़ै। 
खटायत सूर-सुरताण साम्हो खड़ै। 
लाख रो पटायत न्याय इण विध लड़ै। 

एक दूजै गीत में कवि लिखै कै सुरताणसिंह जिण बात सारू लड़र वीरगति वरी उणरी बात उतैतक कायम रैवैला जितैतक सूरज-चांद उदय होवता रैवैला-

ऊदो प्रब पायो जको इतै भांण तपै इल़ा,
थायो थको भुजां खत्री पणां वाल़ो थोक।
भाई भड़ां समेल़ां बधारे तोल इंद भारी,
लीधां सती साथ ही पधारै देवलोक।।

सुरताणसिंह रै पाट सांवतसिंह बैठा। उणां नीं दरबार सूं मातमपुर्सी करी अर नीं किणी बीजी रीतां री पाऴणा नै उडीकिया। दरबार सूं अबढा बुवा। वीर अर भुजां गाढधारी हा सो दरबार री घणी गिनर नीं करी। उणी दिनां बूडसू, बड़लू आद ठिकाणां ई दरबार नै रेख-चाकरी दैणी बंद कर दीनी। मानसिंहजी नै बीजो कोई समर्थ आदमी दीसियो नीं जको मेड़तियां नै सर कर रेख-चाकरी भरावै। उणां सांवतसिंह नै याद किया अर दूहो किणी रै साथै मेलायो-

कऴियो गाढै कीच में, रजवट हंदो रत्थ।
सांवतिया सुरताण रा, तूं काढण समरत्थ।।

दूहो पढ सांवतसिंह वैर भाव भूलग्या अर पूछियो कै ऐड़ी कांई अबखी आई जको धणियां म्हनै याद कियो। संदेशवाहक पूरी बात बताई। सांवतसिंह मेड़तियां माथै चढिया। मेड़तिया सांवतसिंह री वीरता सूं वाकिफ हा सो उणां किणी बिनां खून खराबै रै रेख-चाकरी भरणी अंगेजी। दरबार सांवतसिंह री वीरता अर अडरता बखाणतां कैयो-

सींगां पल़ी न संचरी, खुरी न ठेठर बंध।
दूध पियंतै बाछड़ै, दियो महाभड़ कंध।।
म्है जाण्यो धोऴो मुऔ, खाली व्हैगो बग्ग।
उण बाड़ै रो बाछड़ो, आण तडुकण लग्ग।।

सामधरम, स्त्री सनमान, अर रजवट नै ऊजल़ी राखणियै उणां नरां अर खत्रवट री वाट बैवणियै नरां रै सुजस नै आपरै आखरां अमर करणियै कवेसरां नै नमन।

~~गिरधर दान रतनू “दासोड़ी”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *