आवड वंदना – त्रिकूटबंध गीत

।।दोहा।।
त्रिकुट भवानी ताहरो, रचण चहुं हुं रास।
त्रिकुट बंध रा गीत में, शिवा सुणै अरदास।।1।।
चाळकना री चारणी, जोगण जूनी जाळ।
बाळक बिरदावै थनें, रहै सदा रखवाळ।।2।।
मढ में गढ कोटिक रहे, धजवड़ आवड़ आइ।
पग पड़तों पातक बल़े, वड़ थड़ तेमड़राय।।3।।
खड़गनेत्रिका खड़गिनी, खड़ग वाहती खास।
खड़खड़ खड़ हँस वा करे, वैरी दल़ां विनाश।।4।।
खड़ खड़ रव भुज चुडलो, धड़ धड़ धड़ रव ढोल।
बढ चढ नाचै तेमडै, वड़ आवड़ अणमोल।।5।।

।।गीत-त्रिकूट बंध।।
मन रंग थळ री मावडी,
नरपत उदधि भव नावडी,
शिणगार सोळह सजै सुंदर, लाख नव संग लेय।
अगवाण नाचै आवडा,
मन मोद कर धी मामडा,
धर चाप पद शुभ धरणि धसकत।
घुघर घण रव घमम घमकत।
ठमक ठम ठम रमत ठमकत।
फरर फर फर वसन फरकत।
चमक दुति जिम चपल चमकत।
विविध नभ शुभ सुमन वरसत।
नमन सुर नर करत निरखत।
नयण दरसण करत नित प्रत। देवी आणंद देय।।1।।

विध विविध वाजिंत्र वाजता,
घण गहर सुर लय गाजता,
डफ चंग मिरदंग डाक ड़क ड़क, सरस सुर शहनाइ।
झण झणण झणणण झालरां,
घण घणण घणणण घुघरा,
धिधकट धिकट धत तबल धिधकिट।
तिकिट तत तत ततत तिरकिट।
करत खडतल मधुर खटपट।
शकत हिळ मिळ नचत सटपट।
झपट चवसठ चलत झटपट।
अलक लट लट उलझ अटपट।
लसत पट शुभ ललित लटपट।
मुदित गजगत हलत मदमत। अजब रमती आइ।।2।।

घन गहर जिम मा गाजणी,
शादूळ स्वारी साजणी,
मदछकां महिखा मात मारण, झाल कर जमदाढ।
अरि दळां हणवां हालिया,
पी छाक शोणित प्यालियां,
छप चलत असि छप छपक छप छप।
झपक झप झप झपक झप झप।
कटत उतबँग खलन कप कप।
धपत पलचर पलन धप धप।
रगत मय धर रगत रत वप।
कुपित हुय खळ दळण कँप कँप।
सकळ सठ भग सहम सकपक।
हरख सुर मुनि मनुज हकबक। गाई चिरजा गाढ।।3।।

समरत्थ हाकड सोखणी,
जय जय तुहाळी जोगणी,
चळू एक भर कर गई चट थुं, उदधि जळ अणपार।।
अपरम्म परचा आइ रा,
मामड तणी महमांय रा।
कर गरब घण रव समद गरजत।
लहर उछळत गगन लखियत।
सकळ नवलख सकत सजियत।
अनत जळ वळ पिवण अविरत।
गरज लरजत लरज गरजत।
सकत हुय मन कुपित दरसत।
दसन कटकट रसन लपकत।
गिटक गटगट गिटक गटकत, थें पियौ ; किय थार।।4।।

रवि रत्थ आवड रोकियौ।
कौतुक जगत अवलोकियौ।
वड देव समरथ मात विध विध, प्रवाडा अणपार।
सँग सात झूलर शोभणी।
जय जय करे जग जोगणी।।
कज बँधव महिरख कलस अमियल।
लघवि निस उण अतळ गय तल।
पहर निस हुय पुरण पल पल।
हुवत तद घण ह्रदय हल चल।
“लघव -भगनिय थकित मग चल।
समय -घण किय, सगत झट चल।
अमिय लिय झट, झपट अविरल।
लघवि हुय किम कहत उण पल। करी उण खुडियार।।5।।

धर सिर अषाढी धाबळी,
जिण कोर चमकत बीजळी,
नवलाख तारक भात मँह जिण, ओपती अणपार।
भुवि असुर खळ दळ भंजणी,
रमती शिवा शिव रंजणी,
गड़ गड़ड़ घण रव गड़ड़ गड़ड़ड़।
कड़ड़ कड़ कड़ तडित कड़ड़ड़।
खड़ड़ जनु भुज चुड खड़ड़ड़।
झड़ड़ लड़ झड़ झड़ड़ जळ झड़।
धड़ड़ पद मनु धड़ड़ धड़ धड़।
तड़ड़ कर-तल हुवत तड़ड़ड़।
अड़ड़ अड़ नभ रमत अड़ड़ड़।
सड़ड़ नभ मँह उडत सड़ड़ड़, अंब इळ आधार।।6।।

मढ धकै नाचै मोरिया,
धर धवळ मुरधर धोरिया,
सुभ थान ओपत जठै सुंदर, जुगां जूनी जाळ।
जबरी बिराजी जोगणी।
मामड सुता चिंतामणी।
नित करत भगतन काज निश दन।
दरस कज जन जननि हर दिन।
हरख तन मन पुलक जन जन।
करत थळ रज ठणण कणकण।
सणण सणणण पवन सणणण।
रसन कर नँह सकत वरणन।
ललित अनुपम सुखद चितवन।
विहग कल-रव करत नरतन, मां धकै मृगबाळ।।7।।

रख लाज मौ राजेश्वरी।
भव तारणी भुवनेश्वरी।
अति अगरु चंदण तणी अहनिस, धूप मय धमरोळ।
उतरै तमीणी आरती,
जयकार घण गुंजारती,
जय जयति जय जय जननि तव जय।
गुगळ जव तल हवन सुभ थय।
धरत पकवन शकर घृत मय।
दियण वित घण गयँद गय हय।
करत रिपु खय भगत निरभय।
शरण तव मन अहर निस चय।
नमन नरपत करत अनुनय।
तवन अरचन करत लय मय, छंद वाळी छोळ।।8।।

।।कलश छप्पय।।
गिरा रूप तौ गंग, बहै रसना बाळक रे।
काव्य उक्ति नव भाव, तणी बण रखवाळक रे।
उर अरणव अठपौर, सदा लय लिये हिलोळां।
छंद गीत री छौळ, विदग सुण करे किलोळां।
कवि नरपत री मन कोटडी, जाजम आय बिराजजो।
अनवरत अंब आवड अरज, रसन कवित बण गाजजौ।।

~~कवि नरपत आसिया “वैतालिक”

One comment

  • Pushpenjug Jugtawat

    कसी हुई बणगत, सहज प्रवाह, सशक्त अभिव्यक्ति। इस कठिन गीत प्रकार को साधने के सफल प्रयास। नमन, अभिनंदन, बधाई।

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