तूं किणी गढ नै टिल्लो दीजै!!

माड़वो(पोकरण)आपरी सांस्कृतिक विरासत रै पाण चावो गांम रैयो है। इणी गांम में महाशक्ति देवल रो जनम होयो। इणी धरा नै बूट बलाल बैचरा जैड़ी महाशक्तियां रो नानाणो होवण रो गौरव प्राप्त है। इणी धरा री मा चंदू माड़वा गांव री रक्षार्थ अखेसर री पावन पाल़ माथै पोकरण ठाकुर सालमसिंह रे खिलाफ १८७९ वि° मे जमर कियो।

चंदू मा सूं पैला इणां री मा अणंदूबाई, गुड्डी रै पोकरणां रै खिलाफ जमर कियो।

जद इण गांम री ऐ गर्विली गाथावां सुणां तो लागै कै शायद इण माटी में ईज ऐड़ो आपाण भर्योड़ो हो कै अठै रो वासी आपरै माण नै मुचण नीं देता। अन्याय रै खिलाफ खड़ो होवणो रो जको किरको अठै रै वासींदां में हो बो दूजी जागा कम ई सुणण में आवै।

बात उगणीसवें सईकै रै उतरार्द्ध री है। जागीर अर जागीरदारां रो समय है। जागीरदार नै रैयत चाहीजती। बिनां रैयत जागीरदार कांई कांम रो। बीजी रैयत होवो भलांई मत होवो पण कारू (काम करने वाली जात) यथा दर्जी, नाई, सुथार आद होवणा जरूरी हा। ऐ उण दिनां हर गांम में नीं होयर ठावकै गांम में ईज लाधता अर माड़वो एक ठावको गांम हो।

माड़वै रै पाखती ई पोकरणां रो गांम है गुड्डी। गुड्डी मे नाई नी हा सो पोकरणा चढिया अर माड़वै आय एक नाई नै आपरै उठै हालण रो कैयो। नाईयां कैयो कै–“म्है चारणां रा नाई हां अर चारण म्हांनै रैयत ज्यूं नीं बल्कि भाईयां ज्यूं राखै। सो आप पैला उणांनै पूछलो।”

पोकरणां चारणां नै पूछियो कै – “थांरो नाई थोड़ै दिनां खातर म्हांनै देवो, म्हे थोड़ै दिनां पछै पाछो मेल देवांला।”

चारणां कैयो कै – “थे ठैर्या राजपूत ! थांरो कोई भरोसो नीं। डाकण बेटा देवै कै लेवै। थां सूं पार नीं पड़ै सो थे रैवण दो।”

जणै पोकरणां कैयो कै–
“म्हे मलीनाथजी री आण ले कैवां कै थांरो नाई, म्हांरो काम काढ पाछो पूगतो कर दां ला।”

जणै चारणां आपरो एक नाई इणां रै साथै मेल दियो।

दिन बीता चारण गुड्डी गया अर आपरो नाई मांगियो पण पोकरणां आंख काढी। चारणां घणो ई ऊजर कियो पण पोकरणां कीं काढर नीं दियो।

चारण पाछा आयग्या। आ बात जद ऊदोजी दलावत री जोड़ायत अणंदूबाई मिकसाणी नै ठाह पड़ी तो उणांनै रीस आयगी। वां कैयो कै आपां ई चारण हां! इयां नाई कीकर छोडांला। आज ऐ ले गया काल दूजा ले जावैला पछै आपांरो काम कीकर पार पड़सी? आ कैय वे गुड्डी गया अर आपरो नाई मांगियो।

आ सुण पोकरणां कैयो कै – “कैड़ो नाई ? थांनै ई गांम म्हांरै दियोड़ो सो थांरो ऐड़ो नाईयां माथै कांई ऊजर? चारण हो सो माण थांरै हाथ में है। घणो तामस मत करो।”

आ सुणतां ई अणंदूबाई नै रीस आयगी। वां कैयो – “जावो रै सींतगियां ! थांरो कांई घसको है ? जको म्हारो नाई राखो। हूं कोई कारू-कमीण नीं हूं जको थे धसल़ां करो। हूं चारणी हूं अर चारणी आपरै स्वाभिमान सारू ई शरीर नै तुच्छ समझै। का तो म्हारो नाई दिरावो नींतर हूं थांरै माथै जमर करसूं।”

आ सुणर किणी पोकरणै डोल़ा (आंख) काढिया अर कैयो कै- “जमर कोई बातां सूं नीं होवै? किण रोकी है तनै जमर करण सूं?”

आ सुणतां ई उणां जमर री त्यारी करी अर उण पोकरणै नै कैयो कै थारो ओ डोल़ो तो हणै ई बारै आवैला अर नाई थारै कै थारी ऐल़ रै कीं काम नीं आवैला!! आज पछै थारै नाई सूं काम नीं पड़ै। थारी गल़त (निर्वंश) जासी अर इण पछै जको ई गुड्डी रो बोलतो-पुरस (जोगो मिनख) होसी उणरो अचाणक सभा में डोल़ो निकल़सी।”

जितै लारै माड़वै सूं दो-चार चारण अर इणां री बेटी चंदूबाई आयगी।

चंदूबाई मा रो ओ विकराल़ रूप देख कैयो कै – “मा तूं रैवण दे, हूं जमर सझूं।” आ सुण अणंदूबाई कैयो – “नी, बेटी तूं कोई गढ नै टिल्लो देई। इण घरघेटियां नै तो हूं ई घणी। इतरो छोटो काम थारो नीं बल्कि म्हारो है।”

आ कैय अणंदू माऊ गुड्डी रै पोकरणां माथै जमर कियो।

इण सब बातां नै समाहित कर एक गीत अणंदू माऊ नै समर्पित कियो-

।।गीत अणंदू माऊ माड़वो रो।।

पोकरणा गुड्डी रा चढ्या हुय पतित मन,
सदल़ बल़ पापिया खाग सारै।
उतरिया माड़वै पवित्र इल़ा पर,
धीठ मद छाकिया नको धारै।।1

मांगियो ठगी बल़ ख्वास इक माड़वै,
चार दिन गांम री कढै चांटी।
राखियो जिकै नै डकर सूं रोड़नै,
आपरी धरा में देय आंटी।।2

चारणां मांगियो जाय दिन चार सूं,
रैयत आ मांहरी मति राखो।
कारू पण माहरो दिरावो कोड सूं,
आपनै सरावै जगत आखो।।3

मनी ना कार लिग्गार मरजाद री,
हेर निज जात री करी हेठी।
उथापी आण मलिनाथ री अवन पर,
रसा पर सांसणां माम रेटी।।4

छतो वो सनातन मेटियो छाकटां,
नाकटा नटै गया देख नाई।
रैयत तो गमी गी सांपरत रेणवां,
ऐहड़ी खबर जद गांम आई।।5

सांभल़ी बात अणंदू वा साबल़ी,
धाबल़ी धारणी वा’र धाई।
नावड़ी कुछत्र्यां लार जा निडरपण,
नेह धर मांगियो निजूं नाई।।6

बोल वै कावल़ा कुछत्री बोलिया,
डाकियां जेम वै काढ डोल़ा।
उणी वर कड़क नै ईसरी आखियो,
मूरखां आविया दीह मोल़ा।।7

ध्यान वो दिनंकर जोगणी धारियो,
साधियो जोग जद आप साची।
परमजोत मे मिल़ी गी जदै सह पेखतां,
विमल़ कथ समर संसार बाची।।8

पोकरणा शापिया तैंज परमेसरी,
मही पर वचन ना अजूं मोल़ो।
आपरै कोप सूं गुडी मे अजूं लग,
दूठ रो सभा मे पड़ै डोल़ो।।9

ऊपनी चंदू तो पवित्र उदर मे,
ढाल बण ताकवां सलो ढायो।
उकत आ आप दी मूझ नै ईसरी,
ठाठ सूं गीधियै गीत ठायो।।10

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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