ऊभी आई हूं अर आडी निकल़ूंली

म्हैं लारली पोस्ट में ई ओ निवेदन कियो कै अबार डूंगरदानजी आशिया बल़ाऊ सूं ज्ञानगोठ जरिये फोन कर रह्यो हूं। केई जूना प्रवाद, गीत अर ऐतिहासिक बातां रो आप कनै खजानो है। कालै आपसूं एक बात सुणी नाणै ठकराणी अगरां उदावत री। वीरता री प्रतीक इण डकरेलण रै विषय में सायत इतरै मोटै राजस्थान अथवा सीमित क्षेत्र री बात करूं तो नवकोटी मारवाड़ में खुणचियोक लोग ई नीं जाणता हुसी। पण जद आपां बात सुणां तो उण दूध अर ओद माथै मोद आयां बिनां नीं रैवै।

इणी भावां रै वशीभूत म्हैं आ बात म्हारी सद्य प्रकाशित हुवण वाल़ी पोथी-ढल़गी रातां! बहगी बातां!! रै भाग तीसरै सारू लिखी– ऊभी आई हूं अर आडी निकल़ूंली–

राजस्थानी साहित्य में आपां विशेषकर चारण-काव्य पढां या उण माथै लिख्योड़ी समीक्षावां या टिप्पणियां पढां तो आपांरै साम्हीं एक बात अवस आवैली कै चारण-काव्य में फखत अतिशयोक्ति अर ठकुरसुहाती ई मिलैला।

इण विषय में म्हारो ओ विनम्र निवेदन कै ऐड़ो कुणसो काव्य या कवि हुयो है जिकै आपरै काव्य-नायक रो चरित्र चित्रांकन करती वल़ा इण अलंकार रो प्रयोग नीं कियो हुव ? अर ठकुरसुहाती रै विषय में म्हारो निवेदन है कै एकर ऐ चारण कवियां रो विसर काव्य अवस पढै। जिण लोगां माथै उणां लिख दियो पण आपां आज रा तथाकथित निडर आलोचक उणां री संतति नै सुणावता ई थरका करां।

ऐड़ी ई एक बात नाणै ठाकुर चिमनसिंह अर उणरै कुंवर लालसिंह री है, पण असल में ऐ बात नायक नीं है। बात नायिका री है अर उवा है लालसिंह री जोड़ायत अगरां

अगरां रै विषय में लिखूं, उणसूं पैला नांणै रै विषय में थोड़ो बतायदूं। नांणो, बैड़ा ठिकांणै रो एक गांम हो। बैड़ा मारवाड़ में राणावत सिसोदियां रो ठिकाणो हो। उठै रा तत्कालीन ठाकुर रो आपरी लोहड़ी ठकराणी माथै लाड घणो हो। उण ठकुराणी रो ठाकुर थूक ई नीं उलांघता। जोग सूं ठाकुर बीमार पड़्या तो ठकुराणी नै चिंता हुई कै ठाकुर तो पाटवी बेटो बणसी अर उवो मोटोड़ी रो है। जणै उण ठकुराणी ठाकुर रै मांचै री ईस कनै बैठ निसासो न्हाखियो।

ठकुराणी नै निसासो न्हाखतां देख ठाकुरां कह्यो कै–
“आयो है सो तो जावसी-
आवारूगमन नै बणाया ईशवर,
देख संसार री राह दोनूं।
कोई बेगो तो कोई मोड़ो, जावणो ई है। इणमें निसासो न्हाखण री कांई जरूरत?”

जणै ठकुराणी कह्यो कै-
“हुकम! आपरै सौ वरस कर्यां, हूं अर म्हारो जायो लोगां रा मातेत हुय जासां। उणां री इच्छा माथै जीवणो दुभर हुय जासी सो म्हारै छोरै सारू ई कठै न्यारी पगरखी खोलण री जागा आपरै रैतां-रैतां हुय जावै तो म्हारै नहचो हुवै।”

बात ठाकुरां रै हियै बैठगी। उणां आपरै मोटै कुंवर नै बुलाय कह्यो-
“बेटा! आपांरै कुल़ में अर जात में ऐड़ा-ऐड़ा नर हुयग्या जिकां बाप री इच्छा रै सनमान सारू राज, देश आद तक छोड दिया सो म्हारी इच्छा है कै तूं म्हारी बात मान।”

बेटो सपूत हो। उण कह्यो आपरी इच्छा है तो हूं म्हारो हक छोड दूं लो।”

जणै ठाकुरां कह्यो कै-
“नीं, हूं बैड़ा सूं आधो ठिकाणो तनै अर नाणा सूं आधो ठिकाणो लोहड़ियै नै देवूं। तूं इण बात नै मानै तो हूं मर्यो मुखातर पाऊं।”

बडै बेटे बात मानली अर बैड़ा ठिकाणो रा दो वंट हुयग्या।

पण जिकी बात लिख रह्यो हूं उण दिनां बैड़ा रो ठाकुर पृथ्वीसिंह अर नाणा रा ठाकुर चिमनसिंह पदमसिंह रो हा। चिमनसिंह घुड़सवारी रो शौकीन। इणरी घोड़ी अर घुड़सवारी री तारीफ करतां किणी कवि लिख्यो है–

अप्रमांणिय तेज बखांणिय आलम,
पांणिय अंगस पूर पटा।
चसमांणिय रूप चँगाणिय सोहत,
आंणिय नासक आंन घटा।
जगमांणिय आंन नहीं जग जांणिय,
तांणिय आडज तीर तणी।
चिमनेस सवार सुरंगिय चंचल़,
वाह सुचंगिय जोड़ बणी।।

चिमनसिंह बड़बोलो ई हो अर जिका मुटबोला हुवै उणां सूं रणांगण में कृपाण रो तेज झलै नीं। आ ई नीं चिमनसिंह लांग रो काचो ई हो।

इणी चिमनसिंह रै कुंवर रो नाम हो लालसिंह। लालसिंह रो ब्याव निबैड़ै रै उदावत सिमरथसिंह री बेटी अगरां साथै हुयो।
अगरां वीर, साहसी, चरित्रवान अर दूरदर्शी महिला ही आ ई नीं उवा शिकार री पण शौकीन ही सो उण कनै आबू, अजमेर आद जागा सूं अंग्रेज मीमड़ियां आवती रैवती अर आ इणां नै आपरै इलाकै में शिकार रमावती, सोरी राखती सो मीमड़ियां इण सूं घणी राजी। अठीनै बैड़ा ठाकुर पृथ्वीसिंह रो ब्याव मारवाड़ रै मुसाहिब-ए-आला अर ईडर नरेश सर प्रताप री बेटी सागै हुयो।

सर प्रताप नै लोगां कह्यो कै-
“हुकम! आप ईडर रा नरेश अर मारवाड़-धणी रा भाई हो पछै आप एक गांम धणी नै आपरा बाईसा परणाय कोई गीरबैजोग काम नीं कियो! कठै राजा रो रजवाड़ो अर कठै इंदर रो अखाड़ो?
सर प्रताप नै सलाहकारां सलाह दीन्हीं कै कम सूं कम आप नाणा नै पाछो बैड़ा भेल़ो रल़ाय दो।

आ सलाह सर प्रताप रै जचगी अर उणां एक दल़ मेल्यो अर नाणा ठाकुर चिमनसिंह नै आदेश दियो कै नाणो पाछो बैड़ै में मिला दियो सो ओ गढ छोड दियो जावै नीतर राज आपरै दल़-बल़ सूं गढ छोडावैला। बेइज्जती कराय’र बैवोला तो इणसूं आछो है कै सदियै-सदियै निकल़ जावो।”

चिमनसिंह थोड़ो घणो उजर कियो जणै सर प्रताप रो आदेश आयो कै-
“तपड़ बारै फैंक दिया जावै अर हुकम अदूली में ठाकुर अर कुंवर नै पकड़ लियो जावै।”

राज रै किणी संदेशवाहक पाछो जाय ठाकुर नै सारी हकीकत कैयी तो ठाकुर रै बल़ जवाब दे दियो। वो जनाना गाभा पैर आपरै कुंवर सागै लारलै बगैरणै सूं आपरै ठिकाणै रै एक गांम चांमडरी जावतो रुक्यो।

सर प्रताप रै दल़-मुखिया देख्यो कै कोट नै अजै ई चिमनसिंह खाली नीं कियो तो उण रीस में धमकी दी कै-
“या तो गढ छोड दियो जावै या जीवित पकड़ीजण सारू संभ जावै।”

आ बात सुण’र कोट रै मांयां सूं कुंवराणी कैवायो कै-
“गढ में ठाकुर नीं है सो कोट खाली नीं कर सकां, उवां आयां ई खाली हुसी, म्हैं एकलै जनाना कठै जावा?”

ऐ समाचार जोधपुर पूगाया तो सर प्रताप कैवायो कै कुंवराणी नै कैवाय देवो कै-
“आप मरदाना डोढी सूं जनाना डोढी में जावो परा ताकि म्हे बैड़ा ठाकुर साहब रै नाम रो अमल गल़ाय दुहाई फेरावां।”

आ सुण कुंवराणी कह्यो कै-
“अठै कोई मरद है नीं जणै मरदाना ड्योढी भल़ै कैड़ी? अठै सगल़ी जनाना ई इज है सो आज तो जनाना ड्योढी इज है अतः कोट खाली नीं कियो जा सकै।”

ऐ समाचार भल़ै जोधपुर पूगा तो सर प्रताप पाछो आदेश दियो कै लुगायां है, गिदड़-भभक्यां करो। डर जावैला सो एकर कूड़ी बंदूकां ताणो।”

सैन्यदल़ भल़ै पग पटक्या अर बंदूकां ताणी तो मांयां सूं कुंवराणी ई बंदूकां ताणली। उणां समाचार कराया कै-
“म्हांनै नाणो सर प्रताप रै दियोड़ो नीं है सो इयां डर’र छोड दूं!
कोट में म्हैं मोड़ वडो कियो है। अठै म्हैं ऊभी आई हूं अर आडी जावूंला। हमैं कोट कानी पग उवो इज करैला जिणरै दो माथा हुवै या बटीड़ लागा लोही री जागा दूध निकल़तो हुवै। जैड़ो कुतको थां कनै है, उड़ो खीलो म्हारै कनै ई है।”

आ कैय कुंवराणी आपरी बंदूंक ताण भुरज में मोरचो लियो।

सर प्रताप रै मेल्यै मिनखां हकीकत सूं पाछा सर नै अवगत कराया। आ सुण सर प्रताप गतागम में फसग्या। आगै कुवो अर लारै खाई वाल़ी बात हुयगी। उवां दल़ नै समाचार करायो कै चार-पांच दिन उठै जमिया रैवो। आगलै आदेश नै उडीको।
अठीनै जोग ऐड़ो बण्यो कै अंग्रेज मीमड़ियां आबू सूं शिकार रै मिस घूमती-घूमती नाणा ढूकी। कोट में आई तो आगै कोट में सोपो पड़्योड़ो। मिनख रो बोलाल़ो ई नीं। उवै इचरज में पड़गी। घोड़ां सूं उतर खड़ां-खड़ां कोट में गी। आगै कुंवराणी बंदूक ताण्यां उणांरै स्वागत में मिली।

मीमड़ियां हकीकत पूछी जणै कुंवराणी सारी बात अर नाणा रो इतियास ई बतायो। आपरी गाय रो घी सौ कोसै आडो आवै। इणीगत मीमड़ियां कुंवराणी री आवभगत सूं घणी राजी ही सो उवै अजेज पाछी चढी अर आबू जाय अंग्रेज सरकार सूं सर प्रताप रै आदेश माथै स्टे दिरा दियो। तीजै-चौथै दिन मारवाड़ रै राजाजी रै दल़ री कार्यवाही माथै स्टे आयग्यो अर पछै नाणो मुकदमो ई जीत ग्यो। पण इण पूरी घटना उत्तर मध्यकालीन एक कटु साच नै आपांरै साम्ही अड़ीखंभ ऊभो कर दियो।
राणा रा वंशज जिकै कदै ई आपरी वीरता अर धीरता रै कारण चावा हा, उणी राणा रो एक वंशज चिमनसिंह आपरै विरुद्ध तणती तोपां नै देख’र छूटण सूं पैला ई गढ छोड पड़ छूटो पण उणरी बहुआरी अगरां आपरी कुल़ परंपरा रै विरद ‘रणबंका राठौड़’ नै अखी बणायो राख्यो।

अगरां रै चरित्र नै देखां तो लागै कै महाकवि सूर्यमल्लजी मीसण वीर सतसई में एक कायर पति सारू लिख्यो, चिमनसिंह अर लालसिंह उण सूं ई एक पाऊंडो आगला निकल़्या। क्यूंकै दूजा कायर पति दुश्मणां सूं डरता घर आय आपरै धण रै गाघरै में लुकता जदकै ऐ घर छोड न्हाठा–

कंत घरै किम आविया, तेगां रो घण त्रास।
लहंगै मूझ लुकीजिए, वैरी रो न विसास।।

किणी एक कवि रो दूहो है जिणमें एक वीर नायिका आपरै पति नै कैवै कै-
“हे कंत खुद रै घर में तो गिंडक ई शेर हुवै उवो आपरा पग रोपै पण पराई भोम माथै रण मंडियो है, सो पग मत समटजै। पग समटियां दोनूं कुल़ां रै दाग लागसी-

कंता पराए गौरवैं, म भागै गंवार।
मैणी लागै दो कुल़ां, जीणो कितीक बार।।

पण इण राणावतां सूं तो आपरै घरै ई नीं ठैर्योज्यो। उणांनै गढ बटक्यां सूं खावण लागो। उणां बांठा पग दिया। ऐड़ै कायरां नै इंगित करतां किणी एक कवि एक गीत कह्यो। जिणमें एक वीर पत्नी आपरै कायर पति माथै व्यंग्य कसतां कैवै कै आप तो जुद्ध में मत ठैरजो। आप देखोला कै घरै गयां कवि भूंडा कैवैला तो कैवण दीजो। ऐ बातां आपरै सारू चौखी हैपण कुवैण सूं डरतां प्राण गमा दिया तो पाछा कठै सूं लावोला? इणांसूं आपरै कोई गूंबड़ा नीं हुवै-

कहै भूंडा जिकै कह बोकरो,
आपरी इसी कह जिकै आछा।
वीगड़ै नहीं यूं कदै ई कुवैणां,
प्राण छूटां वल़ै नहीं पाछा।।

अर आं दोनूं राणावतां आ इज करी। पण अगरां आंनै न्हाठतां देठ न्हाठण मतै नीं हुई। उण डरतै धूजतै कोट नै धीजो बंधायो कै-

धरती म्हारी हूं धणी, ढाल़ू नेजां ढल्ल।
कूण उतारै ठाकरां, ऊभां सींहां खल्ल।।

अर आ डकरेलण मेड़ी चढ मरण नै वरण संभी।

इण वीर मनस्विनी अगरां री वीरता रा वारणा लेतां अर कायर बाप बेटे रो माजनो पाड़ता लक्ष्मीदानजी आंगदोस कीं दूहा अर एक प्रहास साणोर गीत लिख्यो। इण दूहां नै पढ्यां आपांनै ठाह लागसी कै कवि बीती बात नै जिण निडरता अर निष्पक्षता साथै बताई है उणसूं शंकरदानसा देथा लीबड़ी रै एक कवित्त री ऐ ओल़्यां सार्थक हुवै कै चारण कुक्षत्रियां नै नाग रै समवड़ लागै अर जिकै रजवट रै पथ रा पथिक है उणांनै संजीवनी मंत्र जैड़ा लागै-

क्रीतपूत कृत्रिम कुक्षत्री व्याल जाल वाको,
अति दुखकारी हमै लगै उरगारी है।
क्षात्रधर्म पथ के पथिक शुद्व क्षत्रिन को,
संजीवनी मंत्र जैसे हम लगै सुखकारी है।।

लक्ष्मीदानजी रै ऐ दूहा इण बात रा साखीधर है कै चारण कायरां रा कटु निंदक अर वीरां नै वंदन वाल़ा हा। इण पूरी घटना नै समझण सारू दो दूहां नै छोड बाकी अविकल रूप सूं दे रह्यो हूं।

दो दूहा छोडण सारू कविश्रेष्ठ लक्ष्मीदानजी री स्वर्गस्थ आत्मा सूं माफी मागतां थका बाकी इणगत है

चिमनसिंह नै फटकारतां कवि लिखै–

कर कर केसरियाह, बातां घणी बणावतो।
फौजां दल़ फिरियाह, छांनै पड़ भागो चिमन।।1
आडै दिन तो केसरिया कर करनै घणी ई बातां बगारतो पण जद फौजां आय फिरी तो कणै गढ छोड न्हाठो पतो ई नीं पड़ण दियो।

कुल़ री छोडै कांण, छतै पांण गढ छोडियो.
रजवट रो वट रांण, छांटो नह रहियो चिमन।।2
चिमनसिंह आपरै घराणै री मरजादा छोड गाढ थकां गढ छोड न्हाठो। इण सूं क्षत्रियत्व में जिको मरट हुवै उणरो छांटो लारै नीं बच्यो।

लूंबै खल़ लागाह, दल़ फिरिया गढ दोल़िया।
भागल पड़ भागाह, चिड़ियां ढल़ पड़िया चिमन।।5
दल़ आय गढ घेरियो तो चिमनसिंह मनभागल हुय न्हाठो जाणै ढूलो चिड़्यां में पड़्यां चिड़्यां उडै

लखणां हीणा लाल, ओल़जहीणा आपही।
गढ में सेरी घाल, चेरी बण भागो चिमन।।6
उणरै कुंवर लालसिंह में ई कीं लखण नीं हा अर ओ तो खुद ओल़झहीण हो ई सो दासी रै रूप में गढ री भींत में बारी घाल पड़ छूटो।

क्यां थे इतो कियोह, विरथा वाद हिमत बिनां।
गढ छिटकाय गयोह, चमक झमक करतो चिमन।।7
कवि कैवै कै थैं में गाढ नीं हो तो पैला वाद चढ्यो क्यूं?हमैं पगां में पायल़ बजावतो निकल़्यो नीं!

वै सो बाल़क, उणरै हाथ न ऊतरै।
नांणा गढ रो नेह, चित सूं किम छूटो चिमन।।8
अरे! गैला छोटै टाबर रै हाथ में कोई नाणो (रुपिया) झलादे तो सोरै सास बो ई पाछो नीं दे सो तूं अधबूढ नाणै रो नेह त्याग इयां कीकर निकल़ग्यो?

लाडी हूंता लाल, कंवरांणी हूती कमंध।
झिलम टोप खग झाल, नांणो गढ छोडत नहीं।।9
जे थारो कुंवर लाडी हुवतो अर इणरी जागा जागा इणरी जोड़ायत कुंवर हुवती तो बखतर पैर लड़ती, इयां गढ छोडती नीं।

अगरां नै कवि दिल खोल कवि दाद देतां लिखै–

कियो चिमन लालै कंवर, नैड़ो उदियानेर।
अगरां सिंघण एकली, आंगमियो आसेर।।1
फौजां नै देख चिमनसिंह अर लालसिंह तो डरतां गढ छोड उदयपुर नेड़ो कियो पण अगरां गढ नै अंगेज हेज साथै मरण संभी।

फौजां झंडा फरहरै, भभकी तोपां भाल़।
चित ओचकियो चिमन रो, भैचकियो भुरजाल़।।2
जद फौजां आय आपरा झंडा तांण्या अर तोपां घुराई तो चिमनसिंह रो चित्त जागा छोड दी। चिमनसिंह नै चैताचूक दीठो तो विचारो कोट ई डरग्यो कै हमैं म्हारो धणी कुण?

धणियांणी धीरोपियो, कंवरांणी क्रोधाल़।
म्हूं लड़सूं सधरै मतै, भैचक मत भुरजाल़।।3
ऐड़ै में गढ री धणियाप करतां धणियाणी खार खाय गढ रो जीव जमावतां कह्यो कै हे गढ!डर मत। थारै कारण हूं गंभीरता सूं लड़ूंली।

मन द्रढ रख डरपै मती, त्रह त्रहत्रहिया त्रंबाल़।
सिर धड़ ऊपर साबतो, भिल़ण न दूं भुरजाल़।।4
हे गढ! तूं चल़विचल़ मत होय। तूं मन में द्रढ रैय। ऐ जुद्ध-नगारा भलांई बाजो। जितैतक म्हारी धड़ माथै माथो साबतो है उतैतक म्हैं तनै भिल़ण नीं दूं अर्थात वैर्यां रो मांयां आंगल़ी टिकाव ई नीं हुवण दूं।

फौजां लड़ करसूं फतै, तेगां झड़ रणताल़।
आंच थनै न आंणदूं, जांण न दूं भुरजाल़।।5
म्हैं खुद तरवार झाल रणांगण में फौजां कर’र लड़ूंली। तनै ई धकल ई नीं आण दूं अर नीं तनै वैर्यां रै हाथां जावण दूं।

समर छोड खामंध ससुर, कायर भागो कंत।
हूं भाग जावूं हमैं, धरती सिर धुणंत।।6
थारो डरणो सही है क्यूंकै म्हारो कायर सुसरो अर डरपोक पति दोनूं समर छोड न्हाठग्या पण तूं निरभै रैय जे आंरै दांई म्हैं ई न्हाठगी तो धरती लाजां मरती माथो धूणैली।

समर छोड खामंध ससुर, भागा दुरंग भल़ाय।
किलो छोड परठूं कदम, (म्हारी) जात रसातल़ जाय।।7
हे गढ! तूं आ मानलै कै उवै थोनूं गढ म्हनै भोल़ाय ग्या ऐड़ै में जे हूं थारो साथ छोड दूंली तो म्हारी जात री गरिमा खतम हुय जावैला अर्थात रसातल़ में बुई जावैली।

तात मात मौसाल़ तक, सूरां साख संसार।
पल़टूं गढ ऊभां पगां, (म्हारो) लाजै पीहर लार।।8
हां थारो डरणो सही है कै म्हारा च्यारूं पख ऊजल़ा नीं है पण तूं आ तो जाणै कै म्हारा दो पख अर्थात पीहर अर नानाणो तो वीरता रै मारग ऊजल़ा है। इण बात री साख संसार भरै सो म्हैं ई थारै सूं बदल़गी तो म्हारो पीहर लाज सूं मर जावैला।

कंवरांणी सजियो किल्लो, बिलकुल मरण विचार।
किलो रहियां रहसी कलम, (म्हारी) लाज किला री लार।।9
अतः कंवरांणी किल्लै नै रुखाल़ण सारू मरण तेवड़ियो क्यूंकै उवां जाणती कै किल्लो रह्यां म्हारी जीतब है। म्हारी लाज रो ढाकण ओ किल्लो इज है सो ओ रह्यां लाज रहसी।

इण दूहां पछै लक्ष्मीदानजी एक गीत कैतां चिमनसिंह री कायरता माथै प्रहार करतां अगरां र री वीरता रा बखाण करतां लिखै–

हुवो कूच चिमनेस यूं अदप राखै हुकम,
भड़ां काचां किता प्रांण भागा।
देख फौजां डंबर दुरग छोडै दियो,
जोधहर नह छोडी दुरग जागा।।
फौज निज आव घर राड़ लेवण फबी,
छकाया गोल़ियां घाल छेटी।
मात रखी फतै लड़ी चढ मोरचां,
बाप घर देखियो समर बेटी।।

अगरां जैड़ी वीर मनस्विनी अर उणरी वीरता रा वारणा लेवणियां लक्ष्मीदानजी नै वंदन।

~~गिरधरदान रतनू “दासोड़ी”

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