गज़ल: उधारे आंसुओं का भार

उधारे आंसुओं का भार तुम कब तक उठाओगे
उसूलों से अदावत को कहो कैसे निभाओगे

किसी के गमजदा किस्से दिलों से निकलती आहें
अगर सुन भी तनिक लोगे तो हँसना भूल जाओगे

निभाना है निभालो तुम अभी दस्तूर रोने का
हकीकत सामने आई कि रोना भूल जाओगे

चलो अब साफ़गोई की पहेली हल हुई प्यारे
वफ़ा के नाम पर कब तक गजल ये गुनगुनाओगे

किसी दिन फितरतें दिल की तुम्हें ऐसा रुलाएंगी
कि अपनी ही निगाहों से निगाहें तुम चुराओगे

छलावे से तुम्हारे ही रहा ‘गजराज’ गफ़लत में
किसी पल उठ गया पर्दा तो कैसे मुंह दिखाओगे
~~डॉ गजादान चारण “शक्तिसुत”

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