आवड मां रो रेणकी छंद – कवि केसरजी खिडीया

Aavad Ma

॥दोहा॥
झबकै चुडी झरणीया, बेहद डंक बजाय।
त्रसगत घातै तैमडै रामत डुँगर राय॥1॥

॥छंद: रेणकी॥
गहकत तर बिम्मर दादर सुर सहकत,
सगत नजर भर अठ तसणी।
झळहऴ कुंडळ उज्जळ मिळ झूलर,
दूठ निजर दामण दमणी।
मिळिया दळ सबळ तैमडै माथै
शगत नवै लख हेक समै।
झबकत कर चूड झणणणणण झांझर
रामत डुँगरराय रमै॥ 1 ॥

कळहळ हुय किरण सगत कन कुंडळ
धर बहरै कर अरुण धुभै।
सुरियण हऴहळहळ मिळ जळथळमहियळ,
विधि सुर बळबळ प्रबळ विभै।
दळ मिळ सबळ दसहु दिस वळ वळ,
ठणणणण नेवर पाय ठमै।
झबकत कर चूड झणणणणण झांझर
रामत डुँगरराय रमै॥2॥

रंग चंग हुय रास कुरंग भृंग रीझत,
बजत मृदंग डफ चंग बळिया।
ओढंग अंग तास अनंग अंग उपर,
ओप दुरंग रंग उजळिया।
पाखां धर बहर पनंग सिर पंखी,
धरहर पुड ध्रुजत गयण धुमै।
झबकत कर चूड झणणणणण झांझर
रामत डुँगरराय रमै॥3॥

डहडह डमरुक डाक हुय डक डक,
ताक खुलत गयणाक तठै।
चढचढचढचढ चाक चकारुय चारणि,
आण मिळै नवलाख अठै।
हर फहरत बकर डकर मदछक हुय,
भाख फटै रवि विम्बर मै।
झबकत कर चूड झणणणणण झांझर
रामत डुँगरराय रमै॥4॥

गरजत मुख विमर धमक पद घुंघर,
थरहर नैवर थरहरियूं।
भाजत मुख तिमिर शगत रत शंकर,
दिनकर हुय अत दत दरियूं।
चीरुं पड फरर फरर बजि चोसर,
नत तिहि अवसर शेष नमै।
झबकत कर चूड झणणणणण झांझर
रामत डुँगरराय रमै॥5॥

॥छप्पय॥
रमतां डुंगरराय, अंग बाखळौ उबारै।
रमतां डुंगरराय, महख रातडियौ मारै।
रमतां डुंगरराय, सोख हाकडो शगत्ती।
रमतां डुंगरराय, लपच्ची डाळ लुळंती।
केहरो कहै खोटै कळू, देव सकळ भया दुबळा।
सकळही कळा आवड सगत, आप प्रवाडा उजळा॥1॥

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