वाह बीकाणा वाह!!

राव वीकै रै बसायै नीकै नगर रो नाम है बीकानेर। जूनो नाम जंगल़, जिणरी कदैई राजधानी होया करती जांगल़ू। जठै दइयां अर सांखलां राज कियो। इणी धरा माथै कदैई छोटा-छोटा दूजा जाट राज ई होया करता, वां सगल़ां नै आपरै बुद्धि अर आपाण रै पाण सर कर वीकै ओ सुदृढ राज थापियो अर नाम राखियो बीकानेर। जिणरी नींव करनीजी खुद आपरै हाथ सूं लगाय वीकै नै निरभै कियो अर रैयत सूं सदैव प्रेम निभावण रो सुभग संदेश दियो-

वीको बैठो पाट, करनादे श्रीमुख कैयो।
थारै रहसी थाट, म्हारां सूं बदल़ै मती।।

इण बीकाणै रो अंजसजोग इतियास, समृद्ध सांस्कृतिक परंपरावां सिरै साहित्यिक संपदा अर कमनीय कल़ा वैभव गीरबैजोग है। इणी कारण जंगल़ मंगल़ देश री आखै मुलक मांय न्यारी निकेवल़ी ओल़खाण है। बीकाणै रो इण खातर ई राजस्थान ई नीं समूल़ै देश मांय माण है। ऊजल़ी रेत, ऊजल़ो हेत अर ऊजल़ै मन रा मानवी जठै बसै, जिणां रो अंजसजोग मिनखाचार अर सिरै सदाचार सरावणजोग। मठोठ अर मरजाद रा कोट, स्वाभिमान अर साहस रा रूप अठै रा वासी पग सूं पताल़ फोड़ पाणी पीवै अर ठरकै सूं जीवै। कवि रंगरेला वीठू इणी खातर इण धर माथै बल़िहारी जावतां लिखियो-

जल़ ऊंडा थल़ ऊजल़ा, पातां मैंगल़ पेस।
बलिहारी उण देसड़ै, (जठै)रायासिंघ नरेस।।

इण थल़ रा वासी रामसिंहजी तंवरआपरी अंतस अभिव्यक्ति करतां इण भोम रा ऐनाण बतावता कितरी खरी लिखै-

नभ नेही नेही पवन, रण नेही जल़ रेस।
नर नेही नेही निखल़, नेही मुरधर देश।।

इण भोम रा पांच रतन आखै वतन में ओल़ख राखै। इण बात रो साखीधर डॉ शक्तिदानजी कविया रो ओ दूहो है-

संत सती अर सूरमा, सकवी साहूकार।
पांच रतन मरूप्रांत रा, सोभा सब संसार।।

हीमत रा हेड़ाव 
इण भोम रा संत, सुकवि, अर साहूकार आपरै अमामी कामां अर ऊजल़ै वानां रै पाण जगत में जाझो माण पायो। अठै रै ऊजल़ै इतियास मांय रातीघाटी रो नाम हल़दीघाटी री आगली पंगत मांय है। रातीघाटी वा ठौड़ है, जठै राज करणियो नाहर आपरी थाहर मांय जाय नीं लुकियो बल्कै जाहर आय पूरै भारत नै धूंसण वाल़ै मुगलां रो माण मर्दन कर सुजस खाटियो। राव जैतसी री पल़कती खागां रै पल़कै सूं काबूल रो धणी अर बाबर रो लोहड़ो बेटो कामरान डर र नाठियो। रणबंकै राठौड़ां री इण जीत माथै बीकानेर ई नीं आखो मुलक मोद करै। जद ई तो किणी कवि कैयो है-

जैतराव जाणै जगत, धजाबंध रणधीर।
कामरान भंजै कल़ह, काबल धणी कँठीर।।
करनादे रा कोटडा, कोटां काबल वट्ट।
राव हकारै जैतसी, भागा कमरा थट्ट।।

इणी राव जैतसी रो पोतरो अर राव कल्याणमल रो अबीह सपूत वीर अमरसिंह होयो। जिको एकर दिल्ली सूं बीकाणै आवै हो। मारग मांय हंसार अर भियाणी कनै एक गांम है ‘हारणी खेड़ो’ इण गांम रो ओ नाम इण सारू पड़्यो कै अठै कोई भी लड़ियो वो हारियो। सो ऐड़ै सरापलियै गांम में कोई राजपूत डेरो नीं करतो। इण बात रो जद इण अबीह अवनाड़ नै ठाह लागो तो इण आपरा तंबू उठै तणाया। अछूती राजपूती बतावण रो चाव राखणियै इण महाभड़ अठै आराम कियो। लारै सूं पतसाही लसकर लेय अकबर रो मेलियो पठाण आरबखां आयो। घोड़ां री पोड़ां सुण इण अडर नै डिंगल़ री महान कवयित्री पदमा सांदवण (सांदू) आपरी ओजस्वी वाणी सूं जगायो-

सहर लूटतो सदा करतो सरद,
कहर नर पड़ी थारी कमाई।
उजागर झाल खग जैत रा आभरण,
अमर अकबर तणी फौज आई।।

राटक बाजी। ओ रणबंको निसंको होय आपरो घोड़ो आरबखां माथै दबायो। हाथी री सूंड माथै घोड़ा रा आगला सुम आया अर आपरो वार करतो उणसूं पहलां ई किणी लारै सूं तरवार वाही। जिण सूं ओ वीर बीच सूं दो टूकड़ा होयो। ऊपरलो हिस्सो क्रोध मांय ऊफणियो अर हाथी रै होदै जाय कटार रै वार सूं आरबखां रो गारत कियो। कर्नल टॉड इणी खातर अमरसिंह नै
‘उडणियो शेर’ रै नाम सूं बखाणियो। इण बात नै प्रतख देखण वाल़ी पदमा सांदवण रो ओ दूहो इण बात रो साखीधर है-

आरब मार्यो अमरसी, वडहत्थै वरियांम।
हठ कर खेड़ै हारणी, कमधज आयो काम।।

अठै रा सूरमा एक सूं बधर एक होया। महाराणा प्रताप रो भाणेज अर महाराजा रायसिंह रो सपूत अनमी महाराजा दलपतसिंह आपरै दाटकपणै खातर चावो नाम। मुगलां रै मरट नै मेटण सारु इण वीर घोड़ां पाखर कस्सी ई ही कै इणां रा छोटा भाई बादशाह जांहगीर री मदण सूं इणांनै हराय अर धोखै सूं पकड़ाय अजमेर में कैद कराय दिया। महाराजा रा सिरदारां ई धोखो कियो। जणै किणी चारण कवि खरी अर खारी लिखी —

फिट वीदां फिट कांधलां, जंगल़धर लेडांह।
दलपत हुड ज्यूं पकड़ियो, भाज गई भेडांह।।

अजमेर कैद सूं दलपतसिंह नै ठाकुर हठीसिंह चांपावत आपरी करवाल़ रै बल़ छोडाया। उण ठौड़ ओ रणबंको राठौड़ जूझ र वीरगति वरण करग्यो। आपरै धणी खातर बीकां रै माठै मन अर हठीसिंह रै आगमनै नै अंगजेतां किणी चारण कवि लिखियो —

दलपत तो पकड़ीजियो, बढिया नीं बीकाह।
हाथी चढ हरवल हुवो, राखण जस नीकाह।।

जद पातसाह ओरंगजेब रजवट रो वट सूकोवण सारु सगल़ै नरेसां नै भेल़ा करर अटक रै पार उतार र अर धरम बदल़ावण री तेवड़ी। इण बात री ठाह लाग्यां महाराजा कर्णसिंह जेहड़ै बजराग रै अंतस आग ऊपड़ी। उण कंवाड़ो उठाय पातसाही जहाजां रा दुफाडा कर दिया। समकालीन कवि देदा वीठू लिखै-

करण प्रथी इकराह पतसाह आरंभ करै,
कूच कर हलै दर कूच काजा।
अटक असुराण रा कटक सोह ऊतरै,
रहै तट पार हिंदवाण राजा।।
कंवाड़ां फाड़ जाझ बटका करै,
धीर सारां धरै मेट धोखो।

कर्ण सिंह रै आंहस, धरम री सुदृढता अर स्वाभिमान देख बाकी सगल़ै नरेसां एक सुर में ‘जय जंगलधर पातसाह’ रो जयघोष कर र आघ कियो। इणी सारु तो कवि सुरताण वीठू कैयो है-

के राजा देवल़ कल़स, केइक राजा धज्ज।
धज ऊपर कमधां धणी, ओ करनाजल़ अज्ज।।

इणी महाभड़ रो मोभी अनोपसिंह होयो। जिण ओरंगजेब री मचाई तडी मांय आपांरै मंदिरां अर मूरतां री आबरू साबत राखी। जठै बाकी रां नरेसां इण राफारोल़ै में धन भेल़ो करण कै भोम दाबण में लागोड़ा हा उठै ई इण नरेस हिंदू धार्मिक ग्रंथां री खेवटा अर अंवेर में लागर सुरक्षित बीकानेर पूगता किया। ओ ईज कारण है कै बीकानेर मांय सांस्कृतिक अर साहित्यिक चेतना री जोत टिमटिमावै नीं बल्कै दीयायमान है। अनोपसिंह जी रो ई भाई हो पदमसिंह। उदारता अर उदात्तता में सिरमौड़ तो वीरता मांय बेजोड़। भारतीय इतियासकारां लिखियो है कै जे पदमसिंह ओरंगजेब कानी सूं नीं लड़र माराठां कानी सूं लड़तो ओ भारत रै इतियास रो उजास दूजो ई होवतो। इण महाभड़ रा समकालीन अमरसिंह (नागौर) महाराणा राजसिंह (उदयपुर) आपरी विशेषतावां रै पाण चावा है। ओ वीर पच्चीस सेर री तरवार राखतो –

कटारी अमरेस री, पदमा री तरवार।
सैल तिहारो राजसी, सरायो संसार।।

सिरजण रा साखीधर
बीकानेर ज्यूं वीरत मांय आगीवाण रैयो है ज्यूं ई साहित्य सिरजण मांय आगूंच रैयो है। अठै री साहित्य संपदा माथै गीरबो होवै। वीठू सूजा नगराजोत रो रचियो ‘राव जैतसी रो छंद’, आखै राजस्थान रो गौरवग्रंथ है। इण मांय मुगलां माथै जंगल़धर री जीत अंकित है। इण ग्रंथ मांय बीकानेर रै उण सूरां रै सुजस री सोरम संचरै जिणां बेकल़ू सूं हेत दरसाय रणखेत मांय खागां खणकाई अर कामरान माथै जीत री धजा फरकाई। इणी भांत महाकवि पृथ्वीराजजी राठौड़ प्रणीत ‘वेलि किसन रुकमणी री’ वीरता, सिंणगार अर प्रकृति रो त्रिवेणी बाजै जिणनै कवियां पांचवो वेद अर उगणीसवों पुराण कैय वांदियो। राष्ट्रकवि दुरसाजी आढा रै आखरां में-

रुकमणि गुण लखण गुण रचवण,
वेलि तास कुण करै बखाण।
पांचमो वेद भाखियो पीथल,
पुणियो उगणीसवो पुराण।।

मेहा गोदारा री ‘मेहा रामायण’ अठै रो सिरै लोककाव्य है। तुलसी रै रामचरित मानस सूं ई घणो पहलां रचीज्यो ओ ग्रंथ अठै रै निरमल़ मानखै री सहज अभिव्यक्ति है, जिण मांय इणां री भल़कती भगती अर खल़कती आस्था दीठगत होवै। सूर दातार रो संमादो (शंकर बारठ) गुण निरंजन पुराण, लक्ष्मणायण (आसाणद बारठ) पाबूजी रा छंद (पदमा वीठू) ग्रंथराज (गोपीनाथ गाडण) विरद प्रकाश (दानजी आसिया) रै साथै सैकड़ूं फुटकर रचनावां गिणाई जा सकै जिणां मांय अठै रा गौरव बिंदु अंकित है।

तपस्यां री तपोभोम
म्हारै लेख ‘वाह बीकाणा वाह’ रो अंक अंश

~~गिरधर दान रतनू “दासोड़ी”

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